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हवा की नमी से बनेगी बिजली! वैज्ञानिकों ने तैयार किया ऐसा डिवाइस जो बदल सकता है पूरी दुनिया

Electricity from Air Humidity: इस तकनीक को Moisture-Electric Generator यानी MEG कहा जाता है.जहां आम इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस नमी से खराब हो जाते हैं, वहीं यह नया सिस्टम नमी को ही अपनी ताकत बनाता है.

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  • यह पर्यावरण के अनुकूल, मिट्टी में घुलनशील तकनीक भविष्य के इलेक्ट्रॉनिक्स को बदलेगी।

Electricity from Air Humidity: दुनियाभर में बढ़ते ई-वेस्ट और प्रदूषण के बीच वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है जो हवा में मौजूद नमी से बिजली बना सकती है. खास बात यह है कि यह डिवाइस पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है और इसे बनाने में ऐसे सामान्य पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है जो खाने-पीने में भी उपयोग होते हैं.

यह रिसर्च Queen Mary University of London, University of Warwick, Imperial College London और Universitas Mercatorum के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है. इस शोध को Nano Energy जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

क्या है यह नई तकनीक?

इस तकनीक को Moisture-Electric Generator यानी MEG कहा जाता है. जहां आम इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस नमी से खराब हो जाते हैं, वहीं यह नया सिस्टम नमी को ही अपनी ताकत बनाता है. डिवाइस को जिलेटिन, साधारण नमक और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे सस्ते और सुरक्षित पदार्थों से तैयार किया गया है. इसे बनाने की प्रोसेस भी बेहद आसान और पानी आधारित है जिससे उत्पादन लागत काफी कम हो सकती है.

कैसे बनती है बिजली?

यह डिवाइस हवा या त्वचा में मौजूद नमी को सोखता है. जब जिलेटिन और नमक का मिश्रण सूखता है तो इसके अंदर तीन परतों वाली खास संरचना बन जाती है. इसके बाद जैसे ही यह दोबारा नमी के संपर्क में आता है, अंदर मौजूद आयन सक्रिय होकर मूवमेंट शुरू कर देते हैं. इसी प्रोसेस से लगातार बिजली पैदा होती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसका एक छोटा यूनिट करीब 1 वोल्ट बिजली लगातार 30 दिनों से ज्यादा समय तक बना सकता है.

छोटे उपकरण भी चला सकता है

शोधकर्ताओं ने कई यूनिट्स को जोड़कर इसका बड़ा सिस्टम तैयार किया. इस सेटअप ने करीब 90 वोल्ट तक बिजली पैदा की जो छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और LED लाइट स्ट्रिंग्स को चलाने के लिए पर्याप्त थी. इससे साफ है कि भविष्य में यह तकनीक छोटे गैजेट्स और सेंसर डिवाइस के लिए बैटरी का विकल्प बन सकती है.

सांस और शरीर की नमी भी पहचान सकता है

यह तकनीक केवल बिजली बनाने तक सीमित नहीं है. वैज्ञानिकों ने पाया कि यह डिवाइस सेंसर की तरह भी काम कर सकता है. क्योंकि इसकी बिजली उत्पादन क्षमता नमी के स्तर के अनुसार बदलती है इसलिए यह इंसानी शरीर से निकलने वाली बेहद हल्की नमी को भी पहचान सकता है. रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने इसे सांसों की निगरानी और बोलते समय निकलने वाली नमी को मापने में इस्तेमाल किया. भविष्य में इसका उपयोग हेल्थ मॉनिटरिंग डिवाइस, वियरेबल टेक्नोलॉजी और टचलेस सेंसर सिस्टम में किया जा सकता है.

पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित

इस डिवाइस की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरण अनुकूल होना है. सामान्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में प्लास्टिक, जहरीले केमिकल और भारी धातुएं होती हैं लेकिन MEG को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इस्तेमाल के बाद यह आसानी से मिट्टी में घुल सके. यह कुछ ही हफ्तों में प्राकृतिक रूप से खत्म हो सकता है या पानी में घोलकर इसके पदार्थों को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे सर्कुलर इलेक्ट्रॉनिक्स की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं.

भविष्य की इलेक्ट्रॉनिक्स बदल सकती है यह खोज

शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बनाने के लिए दुर्लभ और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों पर निर्भरता कम हो सकती है. यह नई खोज दिखाती है कि साधारण, सस्ते और टिकाऊ पदार्थों से भी हाई-परफॉर्मेंस तकनीक तैयार की जा सकती है जो प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर काम करे.

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इसके अलावा मुझे नई टेक्नोलॉजी एक्सप्लोर करना, स्मार्टफोन फीचर्स को समझना और डिजिटल ट्रेंड्स पर रिसर्च करना पसंद है. मैं आसान भाषा और आकर्षक अंदाज में लिखने के लिए जाना जाता हूं, जिससे कठिन टेक्निकल बातें भी पाठकों के लिए समझना आसान हो जाती हैं. मैंने परास्नातक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की है.

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