UP Politics: यूपी में UGC पर फिर गर्म हो सकती है सियासत, सपा सांसद के बयान से हलचल, बीजेपी भी मुश्किल में!
UP Politics: ..यूजीसी पर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सियासत तेज हो सकती है. सपा सांसद के बयानों ने हलचल मचा दी है. बीजेपी इस मुद्दे पर फिलहाल चुप है.

- सपा सांसद का दावा, यूजीसी विधेयक केवल वोट के लिए था.
- विश्वविद्यालय जातिवाद के अड्डे बने, छात्र हो रहे पीड़ित.
- आईआईएम में ओबीसी, एससी, एसटी प्रतिनिधित्व शून्य.
- सरकार विधेयक का बचाव करने में असमर्थ.
समाजवादी पार्टी के एक सांसद ने बृहस्पतिवार को लोकसभा में दावा किया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) विधेयक, 2026 को केवल वोट हासिल करने के उद्देश्य से लाया गया था और सरकार अब इसे ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी में है.
अनुदान की अनुपूरक मांगों के दूसरे बैच पर चर्चा में भाग लेते हुए सपा के शिवपाल सिंह पटेल ने बीजेपी के शासनकाल में जातिगत भेदभाव बढ़ने का भी दावा करते हुए कहा, 'देश के विश्वविद्यालय जातिवाद के अड्डे बन गये हैं. वर्तमान में विश्वविद्यालयों में खुलेआम जातिवाद हो रहा है. आजकल के द्रोणाचार्य, एकलव्य (छात्रों) से अंगूठा नहीं मांगते बल्कि वे ‘वाइवा’ में नंबर काटते हैं. फाइल में ‘उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला’ लिख देते हैं.'
'सरकार सिर्फ वोट के लिए यह विधेयक...'
उत्तर प्रदेश स्थित प्रतापगढ़ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद ने कहा कि सरकार यूजीसी विधेयक लेकर आई थी जिसका वह न्यायालय में बचाव नहीं कर पा रही है और उसके वकील भी न्यायालय में विधेयक के समर्थन में बहस नहीं कर पा रहे हैं.
उन्होंने दावा किया, 'इसे बीजेपी सरकार ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी में है. इसका मतलब है कि सरकार सिर्फ वोट के लिए यह विधेयक लाई थी जिसे आज तक संसद से पारित नहीं कराया गया.'
सपा सांसद ने यह भी कहा कि भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद, आईआईएम कोलकाता, आईआईएम इंदौर, आईआईएम शिलांग के संकाय सदस्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व शून्य प्रतिशत है, जबकि सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व 100 प्रतिशत है.
विश्वविद्यालयों में भी खुलेआम जातिवाद चल रहा- प्रतापगढ़ सांसद
सांसद ने कहा कि प्रधानमंत्री बोलते हैं कि वह पिछड़ी जाति में पैदा हुए हैं लेकिन पिछड़ी जातियों से यह सरकार लगातार भेदभाव कर रही है. वर्तमान सरकार एक यूजीसी बिल लेकर आई है जिसको यह सरकार बचा नहीं पा रही. ऐसा ही प्रकरण 2015 में हुआ था. जब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के आरक्षण पर रोक लगा दी थी. जिससे चार वर्ष तक आईआईएम, आईआईटी जैसे बहुत से संस्थानों में ओबीसी के छात्रों को प्रवेश नहीं मिला था और लाखों बच्चों को इस आरक्षण के उससे वंचित रह गए थे.
उन्होंने कहा कि 2019 में जब चुनाव आ गया तब बीजेपी बीजेपी सरकार फिर से उस बिल को ले आई कि आरक्षण की आवश्यकता है. बीजेपी के शासन काल में जातिगत भेदभाव में बहुत वृद्धि हुई है. आजादी के इतने सालों में यह आज भी चिंता का विषय है. हम सब जानते हैं भारत के विश्वविद्यालय जातिवाद के अड्डे बन गए हैं. आजकल विश्वविद्यालयों में भी खुलेआम जातिवाद चल रहा है.
सपा सासंद के इस बयान से यूपी में यूजीसी पर सियासत एक बार फिर गर्म हो सकती है. वहीं भारतीय जनता पार्टी की भी मुश्किलें बढ़ने के आसार हैं.
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Source: IOCL


























