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Madrasa Board: क्या‌ मदरसा चलाने के लिए भी लेना‌ होता है लाइसेंस, जानें कहां से मिलती है इसकी परमिशन?

Madrasa Board: देश में शिक्षा के क्षेत्र में मदरसों की भी एक बड़ी भूमिका है. आइए जानते हैं कि क्या इन्हें चलाने के लिए किसी खास लाइसेंस की जरूरत होती है.

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  • आवेदन जमा करने पर भौतिक सत्यापन आवश्यक होता है।

Madrasa Board: पूरे भारत में छात्रों को धार्मिक और शैक्षिक शिक्षा देने में मदरसों की भी एक बड़ी भूमिका है. हालांकि काफी लोग मदरसा शुरू करने और उसे चलाने से जुड़ी कानूनी जरूरतों के बारे में नहीं जानते. एक आम सवाल यह है कि क्या इसे चलाने के लिए किसी खास लाइसेंस की जरूरत होती है?  हालांकि किसी कमर्शियल या फिर बिजनेस लाइसेंस की जरूरत नहीं होती लेकिन अगर संस्थान चाहता है कि उसके सर्टिफिकेट को मान्यता मिले और उसके छात्रों को सरकारी योजनाओं का फायदा हो तो संबंधित राज्य अधिकारियों से आधिकारिक मान्यता लेनी जरूरी है.

मदरसा चलाने के लिए लाइसेंस 

मदरसा चलाने के लिए उस तरह के बिजनेस लाइसेंस की जरूरत नहीं होती जो कमर्शियल संस्थानों के लिए चाहिए होता है. हालांकि अगर संस्थान मान्यता प्राप्त योग्यताएं देना चाहता है, सरकारी मदद पाना चाहता है या फिर छात्रों को स्कॉलरशिप और शैक्षिक फायदे दिलाना चाहता है तो उसे संबंधित राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता या फिर रजिस्ट्रेशन लेना होगा. ऐसी मान्यता के बिना संस्थान को गैर मान्यता प्राप्त मदरसा माना जाता है और वह बिना आधिकारिक शैक्षिक दर्जे के स्वतंत्र रूप से काम करता है.

कौन से अधिकारी मंजूरी देते हैं? 

मान्यता की प्रक्रिया राज्य स्तर पर तय सरकारी निकायों द्वारा की जाती है. मुख्य अधिकारी राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड होता है. जैसे उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड या फिर बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड. जिला स्तर पर जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी का कार्यालय आवेदन प्रोसेस करने, निरीक्षण करने और बोर्ड के साथ तालमेल बिठाने के लिए मुख्य नोडल एजेंसी के तौर पर काम करता है.

ट्रस्ट या फिर समिति बनाना पहला कदम

मदरसा खोलने से पहले संस्थापकों को एक कानूनी प्रबंधन निकाय बनाना होगा. यह आमतौर पर लागू कानून के तहत समिति, ट्रस्ट या फिर गैर सरकारी संगठन को रजिस्टर करके किया जाता है. रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आमतौर पर जिला कलेक्ट्रेट या फिर सब रजिस्ट्रार के कार्यालय के जरिए पूरी की जाती है. 

बुनियादी ढांचा और वित्तीय जरूरत

मान्यता के लिए योग्य होने के लिए मदरसे के पास पर्याप्त बुनियादी ढांचा होना चाहिए. इसमें क्लासरूम, जमीन या फिर इमारत और बुनियादी शैक्षिक सुविधा शामिल है. कई राज्यों में नियमों के तहत संस्थान को बैंक खाते में रिजर्व फंड या फिर सिक्योरिटी डिपाजिट भी रखना होता है. यह फंड वित्तीय सुरक्षा के तौर पर काम करता है और अक्सर मदरसा बोर्ड और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा तय नियमों के मुताबिक ही रखा जाता है. 

आवेदन और वेरिफिकेशन की प्रक्रिया 

कई राज्यों में मान्यता के लिए आवेदन की प्रक्रिया अब काफी हद तक डिजिटल हो गई है. आवेदक आधिकारिक मदरसा बोर्ड पोर्टल के जरिए फॉर्म जमा कर सकते हैं. हालांकि कुछ इलाकों में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के ऑफिस के जरिए ऑफलाइन आवेदन भी स्वीकार किए जाते हैं. 

आवेदन जमा होने के बाद एक वेरिफिकेशन टीम संस्थान का फिजिकल इंस्पेक्शन करती है. टीम क्लासरूम की सुविधा, छात्रों की व्यवस्था, आग से सुरक्षा के इंतजाम, शिक्षकों की योग्यता और बाकी जरूरी मानकों की जांच करती है.

यह भी पढ़ेंः इस देश में तेजी से घट रही जन्म दर, जानें बीते 5 सालों में जनसंख्या पर कितना पड़ा असर?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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