UPSC से भी कठिन होती है नागा साधू बनने की ये परीक्षा, करनी पड़ती है कठिन तपस्या
Mahakumbh 2025: कहते हैं कि ये प्रक्रिया इतनी कठिन होती है देशभर में 10-12 को ही तंगतोड़ा बनने का मौका मिल पाता है. उन्हें कई दिनों तक खुले आसमान में लंगोटी और धुनी के साथ समय बिताना पड़ता है

Mahakumbh 2025 Prayagraj: उत्तर प्रदेश की संगम नगरी प्रयागराज में 13 जनवरी से महाकुंभ शुरू होने जा रहा है. जिसके लिए अभी से देशभर से तमाम साधु-संतों और अखाड़ों का पहुंचना शुरू हो गया है. ऐसे ही श्रीपंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन में नागा संन्यासी होते हैं जिन्हें 'तंगतोड़ा' कहा जाता है. उदासीन अखाड़े में तंगतोड़ा नागा संन्यासी बनना इतना आसान नहीं है. कहते हैं कि इसके लिए यूपीएससी में के इंटरव्यू से भी ज्यादा कठिन परीक्षा से होकर गुजरना पड़ता है.
नागा साधु बनने के लिए पहले अपने परिवार और माता-पाता का त्याग करना पड़ता है और अपने हाथों खुद का पिंडदान कर अध्यात्म की राह चुनी जाती है. इनमें जो शैव अखाड़ों में होते हैं उन्हें नागा साधु कहा जाता है और जो उदासीन अखाड़े में होते हैं उन्हें तंगतोड़ा कहा जाता है. इन्हें बनाने के लिए श्रीपंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के देशभर में स्थित 5 हजार से ज्यादा आश्रम और मठ और मंदिरों के महंत अपने सबसे योग्य चेलों का नाम आगे करते हैं.
बेहद कठिन परीक्षा से होकर गुजरना पड़ता है
कौन तंगतोड़ा साधु बनेगा और कौन नहीं इसका फैसला रमता पंच के द्वारा लिया जाता हैं, रमता पंच एक तरह से इंटरव्यू बोर्ड की तरह होता है. रमता पंच देशभर से चुने गए चेलों का इंटरव्यू लेते है जिसे पार करना आसान नहीं होता है. इस इंटरव्यू को कठिन इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये रमता पंच जो सवाल पूछते हैं उनका जवाब किसी किसी किताब में नहीं होता है. यही नहीं आईएएस और आईपीएस की तरह इनका कोई मॉक टेस्ट भी नहीं होता है.
रमता पंच के सवालों का जवाब वहीं चेला दे सकता है जो किसी बड़े साधु महंत के सानिध्य में रहा हो और जिनकी जानकारी ये साधु संत अपने ख़ास चेलों को ही देते हैं. इसमें साधुओं के टकसाल से लेकर चिपटा, धुंधा , गुरु मंत्र और रसोई से संबंधित तमाम गोपनीय सवाल पूछे जाते हैं. जब रमता पंच पूरी तरह इस बात के लिए आश्वस्त हो जाते हैं. चिले तंगतोड़ा बनने के क़ाबिल है तभी उन्हें इसमें शामिल किया जाता है.
कई दिनों तक खुले आसमान में रखा जाता है
कहते हैं कि ये प्रक्रिया इतनी कठिन होती है देशभर से आए चेलों में से 10-12 को ही तंगतोड़ा बनने का मौका मिल पाता है. इसके बाद उन्हें महाकुंभ में स्नान कराया जाता है और संन्यास व अखाड़े की परंपरानुसार शपथ दिलाई जाती हैं. साक्षात्कार की प्रक्रिया के बाद इनकी अखाड़े में ईष्ट देवता के सामने विधि विधान से पूजा पाठ किया जाता है. इस दौरान कई दिनों तक खुले आसमान के लिए सिर्फ लंगोट और धुनी के सामने रहते हैं. अखाड़े की सारी परंपरा को आत्मसात करने के बाद ही उन्हें तंगतोड़ा की उपाधि मिल पाती है.
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