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क्या क्षेत्रीय संवाद शैली से नेता जीत पाएंगे मतदाताओं का दिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं को रैलियों, जनसभाओं में क्षेत्रीय भाषा से लोगों से संवाद स्थापित करते देखा गया है। नेता समझ चुके हैं कि लोगों पर लोकभाषा का गहरा असर होता है।

लखनऊ, एबीपी गंगा। सियासत के महासंग्राम में मतदाताओं की पसंद और नापंसद का ध्यान सभी राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में रहता है। क्षेत्रीय संवाद शैली भी इसी श्रेणी का एक हिस्सा है। लोकभाषा ने वोटरों से संवाद को सशक्त बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं को रैलियों, जनसभाओं में क्षेत्रीय भाषा से लोगों से संवाद स्थापित करते देखा गया है। नेता समझ चुके हैं कि लोगों पर लोकभाषा का गहरा असर होता है।

संवाद शैली और लोकभाषा

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर वर्तमान में नरेंद्र मोदी तक...बखूबी समझते हैं कि लोगों के बीच लोकभाषा की छाप अमिट होती है। अभी की बात करें तो, 2019 के रण को जीतने के लिए नरेंद्र मोदी को पूर्व से लेकर उत्तर और दक्षिण से लेकर पश्चिम तक की जनसभाओं की शुरुआत क्षेत्रीय भाषा में करते देखा गया। ऐसा भी कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय भाषा का संवाद प्रभावशाली होता है।

लोकभाषा को फिर दी जाने लगी तरजीह

चुनाव प्रचार के दौरान लोकभाषाओं को फिर से तरजीह दी जाने लगी है, जबकि 2010 तक ऐसा देखने को नहीं मिलता था। जिसकी प्रमुख वजह थी- बाहरी नेताओं की सक्रियता और हाईटेक प्रचार। हालांकि समय के साथ फिर से बदलाव दिखा और नेताओं को लोकभाषा को तरजीह दोबारा देनी शुरू करनी पड़ी। दरअसल, लोकभाषाओं की लोकप्रियता ऐसी रही कि आमजन रैलियों व जनसभाओं की तक खींचा चला आया। फिर क्या नेताओं ने भी क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव को देखते हुए इसे तरजीह देना ही उचित समझा। अब तो स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी संवाद के लिए क्षेत्रीय भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं।

अपनी भाषा में बात रखना और सुनना पसंद

ग्रामीण मतदाताओं की बात की जाए, तो वो अपनी बात रखना और सुनना दोनों क्षेत्रीय भाषा में करना पसंद करते हैं। ऐसे में यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी से लेकर बीजेपी और कांग्रेस के नेतागण भी उनसे उन्हीं की भाषा में संवाद कर रहे हैं। लोगों का अभिवादन क्षेत्रीय भाषा जैसे अवधी, बुंदेलखंडी आदि से कर रहे हैं, ताकि मतदाता के बीच वो खुद को भी स्थापित कर सकें।

कुछ यूं पसंद आया अवधी का संवाद

जैसे प्रदेश के अवध इलाकों में बोली जाने वाली अवधी भाषा का इस्तेमाल कर प्रत्याशी मतदाताओं के बीच अपनत्व जताते देखे गए। एक पार्टी के प्रत्याशी को लोगों के बीच संवाद में बोलते देखा गया... "ई देश बनावय का चुनाव हय। यहिकै बदै जरूरी हई कि लोकतंत्र के परव मा अइसे जन का मत करइ, जो तुमरी फिकर करति होय। जो तुमरे ले काम करई।" प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं से की जा रही ये संवाद शैली भी लोगों को खूब भा रही है।

दुनिया का अकेला गांव, जहां बोली जाती है संस्कृत

यूपी से इतर जाए, तो हिंदुस्तान में एक ऐसा गांव भी है, जो पूरी दुनिया का अकेला ऐसा गांव है जहां संस्कृत बोली जाती है। आईटी इंजीनियरों के इस गांव में नेतागण भी संस्कृत में ही प्रचार-प्रसार करते हैं। ये गांव कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरु से तकरीबन 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसका नाम है मत्तूर गांव।  यहां रोजमर्रा की जिंदगी में संस्कृत बोली जाती है। यहां हिंदू-मुस्लिम हर कोई संस्कृत में ही बात करता है। इस गांव में जाकर एक बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी प्रचार कर चुकी हैं। उन्होंने संस्कृत में अपना भाषण दिया और इसको लेकर उन्होंने एक ट्वीट भी किया था।

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