बस्ती RTO का कारनामा, दलालों के साथ मिलकर बांटे 4500 फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस, मचा हड़ंकप
Basti News: यूपी के बस्ती में आरटीओ ऑफिस में दलालों के सिंडिकेट ने साठ-गांठ कर बड़ा फर्जीवाड़ा कर दिया. इस गिरोह ने 4500 से अधिक फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाएं और 4.75 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की.

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ दलालों के एक सिंडिकेट ने अधिकारियों से साठ-गांठ करके बड़ा फर्जीवाडा कर दिया. आरोप है इस गिरोह ने 4500 से अधिक फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस हेराफेरी करके बना बनवाकर जारी कर दिए. इसके जरिए करीब 4.75 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की.
यह पूरा खेल बेहद संगठित तरीके से अंजाम दिया गया. अभी तक की जांच के अनुसार दलालों ने आवेदकों की बैकलॉग एंट्री अरुणाचल प्रदेश से करवाई और फिर बस्ती में लाइसेंस जारी करवा दिए गए. मिर्जापुर, संत कबीर नगर, पडरौना, गोरखपुर और आसपास के जिलों के आवेदकों के लाइसेंस इसी तरीके से बनवाए गए. जिसके बाद विभाग पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
फर्जी लाइसेंस बनाकर 4.75 करोड़ की अवैध वसूली
हैरानी की बात यह है कि इसकी भनक परिवहन विभाग के किसी भी अधिकारी को नहीं लगी और धड़ाधड़ फर्जी लाइसेंस बनते रहे. इस प्रकरण को लेकर बस्ती मंडल के आरटीओ फरीदुद्दीन ने बताया कि मामले की जाँच चल रही है. अभी तक आठ लाइसेंस निरस्त किए जा चुके हैं. जैसे-जैसे फर्जी लाइसेंस मिलेंगे उनको लॉक किया जाएगा.
आरटीओ अधिकारी ने कहा कि पिछले छह महीनों की डिटेल्स चेक की जा रही है. जिन जिन आवेदकों ने चेंज ऑफ एड्रेस या रिन्यूएबल के लिए अप्लाई किया था उनकी भी जांच हम लोग करवा रहे हैं.
बस्ती से अरुणाचल तक कनेक्शन
परिवहन विभाग में दलालों के सिंडिकेट ने तकनीक और नियमों की खामियों का फायदा उठाकर एक बड़े लाइसेंस रैकेट को अंजाम दिया. इसकी स्क्रिप्ट अरुणाचल प्रदेश के सेप्पा और सियांग जिलों में लिखी गई और पूरा खेल बस्ती आरटीओ ऑफ़िस में हुआ. बैकलॉग एंट्री के नाम पर बिना किसी पूर्व रिकॉर्ड और बिना लर्नर लाइसेंस के धड़ल्ले से पक्के ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए.
अधिकारियों ने ऐसे किया पूरा खेल
2013 से पहले जब लाइसेंस मैन्युअल (रजिस्टर पर) बनते थे, उन्हें डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए बैकलॉग एंट्री की सुविधा दी गई थी. दलालों ने इसी का फायदा उठाया. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के जिलों से फर्जी मैनुअल रिकॉर्ड तैयार करवाए और फिर बस्ती आरटीओ में उसे एड्रेस चेंज या रिन्यूअल के लिए डाल दिया.
इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी धांधली यह है कि आवेदकों के पास पुराना लाइसेंस होने का कोई वास्तविक प्रमाण नहीं था. परिवहन विभाग के मानक कहते हैं कि पक्का लाइसेंस बनने से पहले लर्नर लाइसेंस अनिवार्य है, जिसकी अवधि 1 से 6 महीने की होती है. लेकिन, इस सिंडिकेट ने हजारों आवेदकों के बिना लर्नर लाइसेंस बनवाए सीधे परमानेंट डीएल जारी कर दिए.
UP51 और UP63 सीरीज के दर्जनों ऐसे लाइसेंस हैं जिनका रिकॉर्ड संदेह के घेरे में है. इस खुलासे के बाद अब सवाल यह है कि जब 2013 के बाद सारा रिकॉर्ड ऑनलाइन है तो दलालों को बैकलॉग की अनुमति कैसे मिली? क्या अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर का दुरुपयोग हुआ या यह सब उनकी मौन सहमति से हुआ?
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