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यूपी विधानसभा में मार्शलों पर मारपीट का आरोप: पुलिस से कितना अलग होता है इनका काम?

मार्शल का काम प्रश्नकाल के दौरान जो सांसद सवाल पूछने वाले हैं उनका नाम चेयरमैन/स्पीकर को बताना है. इसके अलावा कौन से सांसद उपस्थित रहे कौन से नहीं इसकी जानकारी भी मार्शल ही स्पीकर को देते हैं.

यूपी में विधानसभा सत्र शुरू होने के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो जमकर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में कुछ मार्शल पत्रकारों के साथ धक्का मुक्की करते नजर आ रहे हैं. आरोप है कि उन्होंने पत्रकारों के साथ मारपीट भी की है. समाजावादी पार्टी ने भी इस वीडियो को अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी शेयर करते हुए दोषी सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की है. 

समाजवादी पार्टी ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कहा, 'लखनऊ विधानसभा में आज से प्रारंभ हो रहे यूपी बजट सत्र की कवरेज करने आए मीडिया कर्मियों के साथ सुरक्षा कर्मियों द्वारा अभद्रता और मारपीट की घटना, निंदनीय एवं शर्मनाक. यह घटना लोकतंत्र पर एक बदनुमा दाग है. दोषी सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की है होनी चाहिए.' ऐसे में जानते हैं कि आखिर पूरा मामला क्या है, मार्शल कौन होते हैं और पुलिस से कितना अलग होता है इनका काम?

क्या है पूरा मामला 

सोमवार यानी 20 फरवरी से उत्तर प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र शुरू हो गया है. इस सत्र के शुरुआत के साथ ही विपक्षी सदस्य 'राज्यपाल वापस जाओ' और 'तानाशाही की यह सरकार नहीं चलेगी, नहीं चलेगी' के नारे लगा रहे थे. जिसके बाद शिवपाल यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी के लगभग सौ विधायकों ने सदन के बाहर प्रदर्शन शुरू कर दिया. 

इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर फोटोग्राफर विशाल श्रीवास्तव ने इस घटना पर कहा, " वहां मौजूद पत्रकारों पर बिना किसी वजह के मार्शलों द्वारा बदसलूकी किया गया. मार्शलों ने न सिर्फ पत्रकारों को रोका, बल्कि उनके साथ मारपीट कर उन्हें बाहर कर दिया गया. ”

घटना के बाद सदन के बाहर खूब हंगामा मच गया. विरोध को शांत करने के लिए यूपी के सूचना निदेशक को खुद कमान संभालनी पड़ी. 

अब जानते हैं कि आखिर ये मार्शल होते कौन हैं

राज्यसभा और लोकसभा में स्पीकर की बाई तरफ जो व्यक्ति खड़ा होता है उन्हें मार्शल कहते हैं और दूसरा व्यक्ति डिप्टी मार्शल होता है. मार्शल्स यानी वो लोग जो राज्यसभा में चेयरमैन और लोकसभा में स्पीकर के अगल-बगल में खड़े होते हैं. ये मार्शल सदन चलाने में स्पीकर की मदद करते हैं. 

राज्यसभा में सभापति के आने और कार्यवाही के शुरू होने की घोषणा की जिम्मेदारी मार्शल को ही दी गई है. इसके अलावा मार्शल सदन में मौजूद जरूरी कागजात को ठीक से अरेंज करने, गैरजरूरी डॉक्‍यूमेंट्स को हटाने और ऑफिसर्स को उनके काम में मदद करने के लिए भी मौजूद रहते हैं. मार्शल्स की मौजूदगी चेयरमैन या स्पीकर की बैठक में जरूरी होती है. 

क्या है इनका काम 

संसद भवन के मुख्य द्वार से लेकर चेंबर तक सभापति के साथ रहना मार्शल का प्रमुख काम है. चेंबर के अलावा भी सभापति जहां जाते हैं मार्शल को उनके साथ जाना है. संसद भवन में आने से लेकर सदन खत्म होने और प्रस्थान तक सभापति के साथ हर वक्त रहना मार्शल का प्रमुख काम है.

मार्शल का काम प्रश्नकाल के दौरान जो सांसद सवाल पूछने वाले हैं उनका नाम चेयरमैन/स्पीकर को बताना है. इसके अलावा कौन से सांसद उपस्थित रहे कौन से नहीं इसकी जानकारी भी मार्शल ही स्पीकर को देते हैं.  

इसके अलावा मार्शल का काम चेयरमैन या स्पीकर को किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित रखना भी है. ये उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है. अगर सदन में कोई वॉच एंड वार्ड असिस्टेंट को चकमा देकर आगे बढ़ आए तो ऐसे में स्पीकर या चेयरमैन की सुरक्षा का जिम्मा मार्शल का होता है. सदन में हंगामा बढ़ने पर भी उनकी रक्षा करना मार्शल्स की ही ज़िम्मेदारी है. 

संसद का निचले सदन यानी लोकसभा के मार्शलों के पास यह भी अधिकार है कि सत्र के दौरान शोर मचाने वाले सांसदों को वह बाहर कर दें, राज्यसभा में मार्शल सिर्फ नाममात्र के लिए होते हैं. 

मार्शल्स की चयन प्रक्रिया?

इस पद पर डायरेक्ट भर्ती नहीं होती है. मार्शल का ये पद समय के साथ प्रमोशन के बाद मिलता है. सबसे पहले संसद के लिए सिक्योरिटी असिस्टेंट्स की भर्ती होती है. कुछ सालों बाद वह ग्रेड 2 से प्रोमोट होकर ग्रेड 1 में पहुंचते हैं. उसके बाद सीनियर सिक्योरिटी असिस्टेंट बनते हैं. सीनियर सिक्योरिटी चयन की भी एक कठिन प्रक्रिया होती है. जिसमें संसद के नियमों और प्रक्रियाओं पर टेस्ट देना होता है. 

पुलिस और मार्शल के काम में क्या अंतर है

पुलिस का काम कानून-व्यवस्था को बनाए रखना है. पुलिस आमतौर पर ऐसे मामलों को देखती है, जिनका सरोकार आम लोगों से होता है. हर तरह के अपराध से निपटना और इसे होने से रोकने की पूरी तरह से जिम्मेदारी पुलिस महकमे पर होती है. पुलिस अपराधियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलवाने का काम करती है. इसके अलावा ऐसे विरोध प्रदर्शन में पुलिस भीड़ को इकट्ठा होने से रोक सकती है. जरूरत पड़ने पर एफआईआर भी कर सकती है.

दूसरी ओर अगर हम मार्शल की बात करें, तो इनका काम सदन तक ही सीमित होता है. इनकी मुख्य जिम्मेदारी की बात की जाए, तो वह सभापति या कहें चेयरमैन को सुरक्षित रखना है. कई दफा ये देखने को मिलता है कि सदन में माहौल इतना गर्मा जाता है कि सदस्य गण सभापति या स्पीकर के करीब आ जाते हैं. 

ऐसे हालातों में मार्शल का काम होता है कि वह उन्हें स्पीकर से दूर रखे. इसके अलावा कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के दौरान माहौल गरमा जाता है. ऐसे में कई सारे सदस्य हल्ला मचाने लगते हैं, कई मामलों में माइकों को तोड़ने जैसी घटनाएं भी देखने को मिली हैं. इन परिस्थितियों में स्पीकर के आदेश पर सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखाने का काम भी मार्शल का ही होता है.

मार्शल्स का धक्का मुक्का करना नियम के दायरे के बाहर 

उत्तर प्रदेश में बजट सत्र शुरु होने के बाद से ही समाजवादी पार्टी के लगभग सौ विधायक शिवपाल यादव के साथ चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा के पास विरोध कर रहे थे. यह क्षेत्र आमतौर पर विरोध प्रदर्शन के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है और मीडिया इस जगह पर होने वाले प्रदर्शनों को कवर करती रही है. 

जहां तक मार्शल की बात है तो उन्हें सदन के भीतर आदेश सुनिश्चित करने के लिए बाध्य किया जाता है, न कि इसके बाहर के क्षेत्र में. उस क्षेत्र का जिम्मेदारी पुलिस की होनी चाहिए. हालांकि, आरोप है कि मार्शल प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ मारपीट करने के लिए ही इमारत से बाहर आए. 

किसने क्या कहा

सोशल मीडिया पर पत्रकारों के साथ हुई मारपीट का वीडियो वायरल हो रहा है. एक तरफ जहां आम जनता भी इस तरह की कार्रवाई की निंदा कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस घटना पर ट्वीट कर अपना विरोध जताया है. उन्होंने कहा, 'मीडियाकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार सत्ताधारियों की हताशा का प्रतीक है. जब सत्ता पत्रकारों पर प्रहार करने लगे तो समझ लो वो सच से डर गयी है.' 

वहीं दूसरी तरफ इंडियन एक्सप्रेस के फोटो जर्नलिस्ट विशाल श्रीवास्तव का एक वीडियो भी सामने आया है. उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के विधायकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान विधानसभा के मार्शल आए और उन्होंने मीडिया को हटाना शुरू कर दिया. इसी दौरान वह पत्रकारों के साथ मारपीट करने लगे.

एबीपी गंगा के पत्रकार वीरेश पांडेय ने भी मार्शल पर पत्रकारों के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया है. एक और पत्रकार ने ट्वीट करते हुए कहा कि संयम मार्शल की ट्रेनिंग का हिस्सा होता है. पहली बार सुना कि यूपी विधानसभा में मार्शल ने कवरेज कर रहे पत्रकारों को पीटा. इंडियन एक्सप्रेस के विशाल श्रीवास्तव, एबीपी गंगा के वीरेश पांडेय सहित दसियों को धक्का दिया, पीटा. भला हो सूचना निदेशक का, जिन्होंने स्थिति संभाली.

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