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जिसकी सरकार, उधर रहे अजित पर बीजेपी के साथ जाने से क्यों हिचक रहे जयंत चौधरी?

चौधरी अजित सिंह केंद्र में वीपी सिंह, अटल बिहारी, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री रहे. कई बार इनकी आलोचना भी हुई, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की.

जयंत चौधरी क्या मोदी कैबिनेट में शामिल होंगे... पश्चिमी यूपी के गली-नुक्कड़ से लेकर लखनऊ के सियासी गलियारों तक यह सवाल सुर्खियों में बना हुआ है. जयंत भी सस्पेंस को खुलकर खारिज नहीं कर रहे हैं. हालांकि, उनके करीबियों का कहना है कि वे बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे.

यह पहली बार नहीं है, जब जयंत पर बीजेपी की ओर से समझौते का महाजाल फेंका गया हो. साल 2022 चुनाव से पहले जाट नेताओं से मुलाकात के दौरान अमित शाह ने जयंत को साथ आने का ऑफर दिया था, लेकिन जयंत अखिलेश के साथ चले गए. 

चर्चा इस बात की है कि पार्टी को बढ़ाने के लिए अजित चौधरी किसी भी सरकार में शामिल नहीं होने से हिचकते थे, उनके बेटे जयंत बीजेपी से लगातार दूरी क्यों बनाए हुए हैं? बीजेपी से गठबंधन का प्रस्ताव मिलने के बावजूद जयंत खुलकर इसे स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

इस स्टोरी में जयंत और जाटलैंड की सियासत और बीजेपी से दूरी की वजह को विस्तार से जानते हैं...

बात पहले अजित चौधरी के पॉलिटिक्स की...
पिता के सहारे राजनीति में आए अजित ने राज्यसभा से अपनी करियर की शुरुआत की थी. 1988 में राजीव गांधी के खिलाफ संयुक्त मोर्चा के मूवमेंट में शामिल हो गए. उन्होंने अपनी पार्टी का जनता दल में विलय कर लिया. वीपी सिंह ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया. 

1989 में यूपी में जनता दल की सरकार बनी तो मुलायम सिंह के मुकाबले अजित सिंह मुख्यमंत्री की रेस में आगे थे, लेकिन जनता दल के वोटिंग कराने के फैसले ने उन्हें पीछे कर दिया. विधायक की गणना में मुलायम अजित से आगे निकल गए. 


जिसकी सरकार, उधर रहे अजित पर बीजेपी के साथ जाने से क्यों हिचक रहे जयंत चौधरी?

अजित को वीपी सिंह ने केंद्र की राजनीति में रोक लिया. उन्हें वीपी सिंह सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया. वीपी सिंह की सरकार गिरी तो अजित की कुर्सी भी चली गई. 1995 में वीपी सिंह पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री बने और कुछ महीनों के लिए कांग्रेस में भी रहे.

इसके बाद उन्होंने खुद की पार्टी बनाई और लोकसभा के लिए चुने गए. साल 1998 में वे लोकसभा का चुनाव हार गए. हालांकि, 13 महीने बाद ही देश में मध्यावधि चुनाव हुआ. अजित 1999 के चुनाव में जीतने में सफल रहे. इस बार वे खुद की पार्टी से चुनाव जीत कर संसद पहुंचे थे.

सिंह ने पश्चिमी यूपी को उत्तर प्रदेश से अलग कर हरित प्रदेश बनाने की मांग छेड़ दी. सिंह की लोकप्रियता को देखते हुए बीजेपी ने उन्हें केंद्र में कृषि मंत्री बनने का ऑफर दे दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. अजित सिंह 2001-03 तक अटल कैबिनेट में मंत्री रहे.

2004 के चुनाव में अजित सिंह ने 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन 3 पर ही जीत हासिल कर पाए. 2009 में सिंह की पार्टी ने रिकॉर्ड तोड़ते हुए यूपी की 5 सीटों पर जीत दर्ज की. 2011 में उन्हें मनमोहन कैबिनेट में शामिल किया गया.

2014 के चुनाव में अजित सिंह और उनके बेटे समेत सभी नेता चुनाव हार गए. 2019 से पहले अजित सिंह ने सपा से गठबंधन कर लिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली. 2021 में अजित सिंह का निधन हो गया, जिसके बाद पार्टी की कमान जयंत के पास आ गई.

अखिलेश संग मिलकर लड़े विधानसभा का चुनाव
साल 2022 में जयंत अखिलेश यादव के साथ गठबंधन कर जयंत चौधरी चुनाव मैदान में उतरे. आरएलएडी को गठबंधन के तहत सपा ने 35 सीटें दी. जयंत की पार्टी 8 सीटों पर जीतने में कामयाब रही. इसके बाद हुए राज्यसभा चुनाव में सपा ने अपने कोटे से जयंत को राज्यसभा भेजा.

इसी बीच चुनाव आयोग से जयंत की पार्टी को बड़ा झटका लगा. आयोग ने आरएलडी से राज्य पार्टी का दर्जा छीन लिया. वहीं निकाय चुनाव में सपा से भी बात नहीं बनी. कई सीटों पर आरएलडी और सपा के उम्मीदवार आमने-सामने रहे.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीजेपी को लेकर जारी सस्पेंस को खारिज नहीं करने के पीछे जयंत की प्रेशर पॉलिटिक्स है. जयंत अखिलेश पर अधिक सीट को लेकर दबाव बनाना चाह रहे हैं. 2022 में भी सीटों को लेकर पेंच फंसा तो जयंत और प्रियंका के साथ जाने की खबरें फ्लैश होने लगी.

इसके बाद अखिलेश ने उन्हें 35 सीटें दे दी. उन्हें अधिकांश मनमुताबिक सीट ही मिले.


जिसकी सरकार, उधर रहे अजित पर बीजेपी के साथ जाने से क्यों हिचक रहे जयंत चौधरी?

बीजेपी से गठबंधन करने में क्यों हिचक रहे जयंत?

1. ज्यादा सीट देने को तैयार नहीं, सहयोगी दलों की हालत देख चुके हैं
जयंत चौधरी को अजित से सियासी विरासत में आरएलडी मिली है, जिसका राज्य स्तर का दर्जा खत्म हो चुका है. जयंत के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को फिर से राज्य स्तर का दर्जा दिलाने की है. 

सूत्रों के मुताबिक जयंत ने गठबंधन की पहली शर्त सीटों का ही रखा है. जयंत कम से कम आरएलडी के लिए 8 सीटें चाह रहे हैं, जिससे वोट प्रतिशत में इजाफा हो और उसका दर्जा वापस आ सके. रिपोर्ट्स के मुताबिक बीजेपी जयंत को 2 सीटें (बागपत, बिजनौर/सहारनपुर) देने को राजी है.

बागपत सीट पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि सहारनपुर और बिजनौर में बीएसपी को जीत मिली थी. बीजेपी जयंत को केंद्र में मंत्री बनाने के साथ-साथ उनके एक विधायक को कैबिनेट में भी शामिल करने का प्रस्ताव दिया, जिसे जयंत ने ठुकरा दिया.

सीट पर पेंच फंसने के साथ ही बीजेपी के साथ नहीं जाने के पीछे एनडीए के घटक दलों की स्थिति है. बीजेपी से गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना, जेडीयू और आरपीआई (अठावले) पहले की तुलना में अधिक कमजोर हो गई.

आरपीआई को तो 2019 के चुनाव में लोकसभा का सीट भी नहीं मिला. वहीं बिहार चुनाव में जेडीयू ने पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाया.

2.जाट से इतर जातियों में भी पैठ, साथ आने पर खत्म हो जाएगा
राजनीतिक जानकारों का मानें तो मुजफ्फरनगर दंगे के बाद आरएलडी के पाले से जाट भी छिटक गया. 2014 और 2017 के चुनाव में बीजेपी ने जाटलैंड में बड़ी जीत दर्ज की. 2019 में भी आरएलडी बागपत और मुजफ्फरनगर में जीत नहीं दर्ज कर पाई.

इसके बाद जयंत ने भाईचारा अभियान की शुरुआत की. किसान आंदोलन 2020 के बाद जयंत की किस्मत पलटी और जाट उनके खेमे में आ गया. इधर, भाईचारा अभियान के जरिए जयंत ने दलितों और मुसलमानों को भी एक साथ साध लिया. 

2022 के चुनाव में जयंत और सपा गठबंधन ने पश्चिमी यूपी के कई जिलों में बड़ी सेंध लगाई. वर्तमान में आरएलडी के 2 विधायक मुस्लिम हैं. हाल में ही खतौली उपचुनाव में मुस्लिम, जाट और दलित समीकरण के सहारे जयंत ने बीजेपी को मात दी थी.

ऐसे में जयंत को डर है कि बीजेपी के साथ जाने से वे सिर्फ जाट के नेता रह जाएंगे और सभी कौम को साथ ले जाने का उनकी रणनीति पर पानी फिर जाएगा. जयंत को अपने दादा की तरह इस समीकरण से बड़े उलटफेर की उम्मीद है.

चौधरी चरण सिंह 'अजगर' (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) और 'मजगर' (मुस्लिम, जाट, गुर्जर और राजपूत) फॉर्मूले से न केवल यूपी बल्कि पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया.

भाईचारा पॉलिटिक्स में सेंध के साथ-साथ जाट युवाओं के भी अलग होने का डर जयंत को है. सीएसडीएस-लोकनीति के मुताबिक 2022 के चुनाव में सपा गठबंधन को पश्चिमी यूपी में 33 प्रतिशत जाटों के वोट मिले थे. जानकारों के मुताबिक किसान आंदोलन के बाद से ही जाट में युवा वर्ग जयंत के साथ चले गए थे. 

 जाटलैंड क्यों महत्वपूर्ण है?
पश्चिमी यूपी में जाट करीब 18 प्रतिशत है, जो 10-12 सीटों पर सीधा असर डालते हैं. आंकड़ों की बात की जाए तो मथुरा में 40%, बागपत में 30%, मेरठ में 26% और सहारनपुर में 20% जाट हैं, जो किसी भी समीकरण को उलट-पलट सकते हैं.

वर्तमान में पश्चिमी यूपी से बीजेपी के 4 सांसद जाट समुदाय के ही हैं. जाट नेता संजीव बालियान केंद्र में मंत्री भी हैं. पिछले चुनाव में बीजेपी जाटलैंड की 7 सीटें बुरी तरह हार गई, इसमें सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा शामिल हैं. 


जिसकी सरकार, उधर रहे अजित पर बीजेपी के साथ जाने से क्यों हिचक रहे जयंत चौधरी?

वहीं 3 सीटों पर काफी करीबी मुकाबले में बीजेपी को जीत मिली थी. मेरठ से बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल सिर्फ 4729 वोट से चुनाव जीते थे. मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान के जीत का मार्जिन भी 7 हजार से नीचे था.

ऐसे में बीजेपी इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाह रही है. जाट अगर इस बार विपक्ष के पक्ष में गया, तो यहां खेल हो सकता है.

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