उद्धव ठाकरे गुट ने फिर की अमित शाह के इस्तीफे की मांग, इस बार कुलगाम का जिक्र
Kulgam Terror Attack: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मुखपत्र 'सामना' ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. इसमें गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की गई है.

जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में गैर-स्थानीय मजदूरों पर हुए आतंकी हमले को लेकर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मुखपत्र 'सामना' ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. सोमवार (3 अगस्त) को प्रकाशित अपने संपादकीय में 'सामना' ने इस हमले को देश की आंतरिक सुरक्षा में गंभीर चूक करार देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है.
संपादकीय में कहा गया है कि कुलगाम में हुए आतंकी हमले में दो गैर-स्थानीय मजदूरों की जान गई. 'सामना' का आरोप है कि जम्मू-कश्मीर में लगातार आतंकी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन केंद्र सरकार आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण के अपने दावों पर खरी नहीं उतर पाई है.
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सरकार की सुरक्षा नीति पर सवाल
लेख में पुलवामा, पहलगाम और अब कुलगाम की घटनाओं का हवाला देते हुए केंद्र सरकार की सुरक्षा नीति पर सवाल उठाए गए हैं. साथ ही कहा गया है कि धारा 370 हटाने और नोटबंदी के बाद आतंकवाद पर लगाम लगने के जो दावे किए गए थे, वे अब सवालों के घेरे में हैं.
'सामना' ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. संपादकीय में कहा गया है कि देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन लोगों के कंधों पर है, उन्हें इन घटनाओं की जवाबदेही लेनी चाहिए.
संपादकीय में यह भी आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार विपक्षी दलों की राजनीति में ज्यादा व्यस्त है, जबकि आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई दे रही है. इसी आधार पर 'सामना' ने गृह मंत्री अमित शाह से इस्तीफे की मांग दोहराई है.
कुलगाम आतंकी हमले में दो की मौत
'सामना' में कहा गया है कि भारत की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी जिनकी है, वे गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पुणे में ‘पुरस्कार-पुरस्कार’ खेल रहे थे और उसी समय जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर आतंकवादी हमले ने हड़कंप मचा दिया.
दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के इलाके में आतंकवादियों ने गैर-कश्मीरी मजदूरों पर हमला कर दिया. इसमें दो मजदूरों की जान चली गई. ये दोनों मजदूर छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे और ईंट-भट्टे पर काम करते थे.
लश्कर-ए-तैयबा ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है. देश के गृह मंत्री अगर ‘पुरस्कार-पुरस्कार’ खेलने से बाहर आ गए हों, तो क्या वे इस आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे को लेकर संसद में भारी हंगामा हुआ है. पूरे देश से उनके इस्तीफे की मांग उठ रही है.
जंतर-मंतर प्रदर्शन पर क्या कहा गया?
जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन को लेकर 'सामना' में कहा गया, ‘जंतर-मंतर’ पर पेपर लीक के खिलाफ चल रहे आंदोलन से वे बिल्कुल नहीं निपट सके. इसके विपरीत, आंदोलन को कुचलने के लिए उन्होंने पुलिस से बर्बर ताकत का इस्तेमाल करवाया, पेलेट गन्स चलवाईं, मानों अपने जायज हकों के लिए लड़ने वाले ये बच्चे ही आतंकवादी हों और अब असली आतंकवादी सीधे कश्मीर में घुसकर बेगुनाहों को मौत के घाट उतारकर गायब हो गए."
लेख में कहा गया, "यह सीधे तौर पर गृह मंत्री अमित शाह की नाकामी है. इन मजदूरों को उनका नाम और धर्म पूछकर मारा गया, यह बात सामने आई है. इसलिए यह हमला हिंदुत्व पर भी हमला है. अजीत डोभाल देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं. इन महाशय को प्रतिष्ठित तिलक पुरस्कार दिया गया और वह भी गृह मंत्री शाह के हाथों.
आगे कहा गया कि इन दोनों पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी है इसलिए कश्मीर में हुए इस हमले ने दोनों की कार्यशैली की पोल खोलकर रख दी है. नोटबंदी से कश्मीर में आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, नकली नोट नहीं छापे जा सकेंगे, ऐसा दावा मोदी-शाह और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल ने किया था, लेकिन कश्मीर में अशांति और असंतोष ज्यों का त्यों बना हुआ है और भूमिगत उग्रवादी अचानक बाहर आकर हमले करके फरार हो जाते हैं.
धारा 370 को लेकर अमित शाह पर निशाना
धारा 370 को लेकर अमित शाह पर 'सामना' में निशाना साधा गया है. 'सामना' में कहा गया, "धारा 370 हटाने से कश्मीर में हिंसक और अलगाववादी ताकतों का खात्मा हो जाएगा, ऐसा भाषण गृह मंत्री शाह ने तब संसद में सीना ठोककर दिया था. हकीकत में हिंसा रह-रहकर भड़क उठती है और खून-खराबे का विस्फोट होता है. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? या फिर ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलनकारियों से बिना मांगे ‘माफी’ मांगनेवाले मोदी ने आतंकवादियों को भी माफ कर दिया है?"
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'सामना' में कहा गया, "कुलगाम हमले में दो मजदूर मारे गए इसलिए सरकार इस मामले को गंभीरता से लेती नजर नहीं आ रही. इंसानी जानें कितनी जाती हैं, क्या इसी से सरकार की गंभीरता तय होगी? पुलवामा में जब 40 जवानों की आरडीएक्स बम धमाके में हत्या कर दी गई थी, तब भी सरकार गंभीर नहीं थी. प्रधानमंत्री जिम कॉर्बेट के जंगलों में सफारी का आनंद ले रहे थे."
पहलगाम हमले का भी किया गया जिक्र
'सामना' में पहलगाम हमले का भी जिक्र किया गया है. पहलगाम में तो 26 हिंदू पर्यटकों की नृशंस हत्या कर दी गई थी. उग्रवादी एके-47 बंदूकें लेकर आए, पर्यटकों को मारा और चले गए. इन दोनों हत्याकांडों की जिम्मेदारी स्वीकार करके गृह मंत्री अमित शाह और अजीत डोभाल को तभी इस्तीफा दे देना चाहिए था. अगर वे इस्तीफा देने को तैयार नहीं थे तो प्रधानमंत्री मोदी को उन्हें बर्खास्त कर देना चाहिए था.
संपादकीय में कहा गया, "शाह के कार्यकाल में सैकड़ों लोगों को अकारण अपनी जान गंवानी पड़ी है. शाह खुद पचास सुरक्षा गाड़ियों के काफिले में घूमते हैं. वे दिल्ली में जिस इलाके में रहते हैं, वहां के कृष्ण मेनन मार्ग, सुनहरी बाग लेन, संसद मार्ग जैसे चार-पांच रास्ते जनता के लिए एक-दो किलोमीटर तक बंद कर दिए गए हैं. हजारों सशस्त्र बलों के जवान उनकी सुरक्षा में तैनात हैं, फिर भी वे डरे हुए हैं और संसद में भी नहीं आते. ऐसे इंसान से देश की सुरक्षा कैसे होगी?
'सामना' में मणिपुर को लेकर साधा निशाना
'सामना' में मणिपुर को लेकर कहा गया, "मणिपुर जल रहा है, वहां की हिंसा को रोका नहीं जा पा रहा. बीच सड़क पर महिलाओं को नग्न घुमाया जाता है और अमित शाह बेफिक्र होकर विधायक-सांसद खरीदने में व्यस्त रहते हैं. फिर सरदार पटेल की तस्वीर के नीचे बैठकर लोगों को धमकियां देते हैं. यह सब अब ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा. शिक्षा मंत्री की नाकामी के खिलाफ जिस तरह युवा सड़कों पर उतरे, ठीक उसी तरह एक दिन गृह मंत्री के निकम्मेपन के खिलाफ भी सड़क पर उतरकर उनके इस्तीफे की मांग करेंगे."
मुखपत्र में कहा गया, "जातीय नफरत की आग लगाना, हिंदू-मुसलमानों में तनाव पैदा करके चुनाव जीतना ही फिलहाल गृह मंत्री का मुख्य काम बन गया है. वे विपक्षी पार्टियों को तो तोड़ सकते हैं, लेकिन अगर देश के आतंकवादियों का सफाया नहीं कर सकते, तो उनका देश के लिए कोई उपयोग नहीं है. कुलगाम के आतंकवादी हमले ने गृह मंत्री शाह की राष्ट्रभक्ति और कार्यकुशलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है."
'तो फिर गृह मंत्री के रूप में सीना फुलाकर क्यों घूमते हैं'
'सामना' में यह भी कहा गया है कि अमित शाह पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर को वापस भारत में लाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन भारत के कश्मीर की जनता की रक्षा वे नहीं कर सकते. तो फिर गृह मंत्री के रूप में सीना फुलाकर क्यों घूमते हैं? कश्मीर के हिंदू पंडितों की घर-वापसी आज तक नहीं हो पाई, फिर भी ये खुद को हिंदू-हितरक्षक मानते हैं.
ऊपर से राम मंदिर की दान पेटियां लूटी जा रही हैं, वह अलग. यह सब गृह मंत्री शाह की नाकामी की वजह से हो रहा है. केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके गुंडागर्दी करने को ही अगर वे शासन करना समझते हैं तो उनके पैरों तले से कालीन खींचने के लिए जनता-जनार्दन अब तैयार बैठी है.
‘जंतर-मंतर’ पर जनता के मन का नरसिंह बाहर निकल आया है. अमित शाह कोई बहुत बड़े धुरंधर नहीं हैं. विरोधी दलों को तोड़ने की उनकी ‘धुरंधरगीरी’ जब चल रही थी, तभी कश्मीर में आतंकवादी हमला हो गया. कश्मीर में आरडीएक्स, बंदूकें, पैसा और उग्रवादी कहां से आते हैं? अमित शाह, इस्तीफा दो! अब बहुत हो चुका.
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