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Maharashtra Politics: 6 महीने पहले शुरु हुई मुलाकातों ने बदल दी महाराष्ट्र की राजनीति! उद्धव-राज आए साथ, BJP की बढ़ेगी मुश्किल?

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी वोटों का एकजुट होना बीजेपी के लिए मुश्किलों का सबब बन सकता है. अब यह देखना होगा कि राज और उद्धव की जोड़ी बीएमसी चुनाव में क्या कमाल करती है?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर ठाकरे परिवार चर्चा के केंद्र में है. करीब दो दशकों तक राजनीतिक और निजी दूरी के बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ आने के गहरे राजनीतिक मायने भी हैं. हाल के महीनों में जिस तरह दोनों भाइयों की लगातार मुलाकातें हुई  जिसके परिणाम स्वरूप बीएमसी चुनाव के लिए दोनों दल और उसके नेता साथ आए.

ठाकरे भाइयों के बीच बढ़ती नजदीकियों की शुरुआत 5 जुलाई 2025 को मराठी भाषा के मेळावे से हुई. जहां दोनों एक ही मंच पर नजर आए. इसके बाद 27 जुलाई को राज ठाकरे सीधे उद्धव ठाकरे के जन्मदिन पर ‘मातोश्री’ पहुंचे. अगस्त में गणेशोत्सव के दौरान लगभग 20 साल बाद उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे के ‘शिवतीर्थ’ निवास जाकर परिवार सहित गणराय के दर्शन किए. सितंबर और अक्टूबर में स्नेह-भोज, दीपोत्सव, पारिवारिक समारोह और यहां तक कि चुनाव आयोग से जुड़ी बैठकों में भी दोनों की साझा मौजूदगी देखने को मिली.

1 नवंबर 2025 को मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और चुनाव आयोग के खिलाफ 'सत्य का मोर्चा' निकालने का निर्णय हो या फिर 10 नवंबर को अभिनेता सुबोध भावे के जन्मदिन पर साथ दिखना-इन तमाम घटनाओं ने यह संकेत दिया कि यह मेल-मिलाप सिर्फ निजी दायरे तक सीमित नहीं है. 10 दिसंबर को अमित ठाकरे के बहनोई की शादी में पूरे ठाकरे परिवार की मौजूदगी ने इस संदेश को और मजबूत किया.

 MNS के उतार चढ़ाव की कहानी

राज ठाकरे का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा. वर्ष 2005 में शिवसेना से इस्तीफा और साल 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) की स्थापना के साथ उन्होंने अलग राह चुनी. साल 2009 के विधानसभा चुनाव में MNS ने 13 सीटें जीतकर 5.71% वोट शेयर हासिल किया. 2012 के बीएमसी चुनावों में 27 सीटें जीतना पार्टी का स्वर्णिम दौर माना गया.

हालांकि इसके बाद गिरावट शुरू हुई. साल 2014 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई और वोट शेयर घटकर 3.15% रह गया. साल 2017 के बीएमसी चुनावों में सीटें 7 पर आ गईं. साल 2024 के विधानसभा चुनाव में MNS का खाता तक नहीं खुला और राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे को भी हार का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद राज ठाकरे की करिश्माई छवि और मुद्दों को उठाने की उनकी शैली ने पार्टी को राजनीतिक विमर्श में प्रासंगिक बनाए रखा. विरोधी दल अक्सर MNS को 'वोट-कटवा' के तौर पर देखते रहे हैं.

 मुंबई का वोट गणित और बीजेपी की चिंता

मुंबई की राजनीति में वोटों का गणित बेहद अहम है. शहर की आबादी में लगभग 26% मराठी भाषी हैं, जिन्हें ठाकरे परिवार का पारंपरिक समर्थक माना जाता है. इसके अलावा करीब 11% मुस्लिम वोटर हैं, जो आमतौर पर बीजेपी विरोधी खेमे के साथ जाते दिखते हैं. लगभग 11% दलित आबादी का एक हिस्सा भी बीजेपी का कोर वोट बैंक नहीं माना जाता.
 
मुंबई के 227 बीएमसी वार्डों में से 67 वार्ड ऐसे हैं जहां MNS को मिले वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे. इनमें 39 वार्डों में महाविकास आघाड़ी (कांग्रेस, एनसीपी-एसपी और शिवसेना-यूबीटी) आगे रही, जबकि 28 वार्डों में महायुति को बढ़त मिली. कुल मिलाकर 123 वार्ड ऐसे रहे जहां MNS का प्रभाव साफ दिखाई दिया. यह आंकड़े बताते हैं कि भले ही वोट शेयर कम हो, लेकिन MNS का असर पूरे मुंबई के सियासी भूगोल में  है.

 ठाकरे बंधुओं की एकजुटता के मायने क्या?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की MNS किसी साझा मंच या तालमेल की ओर बढ़ती हैं, तो मराठी वोटों का बड़ा हिस्सा एकजुट हो सकता है. इसका सीधा असर खासकर मुंबई और महानगर क्षेत्रों में बीजेपी और महायुति पर पड़ सकता है.

मराठी अस्मिता, भाषा और स्थानीय मुद्दों पर ठाकरे भाइयों की संयुक्त राजनीति बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है. मुस्लिम वोटों का गैर-बीजेपी खेमे के साथ जाना और दलित वोटों का एक हिस्सा भी यदि विपक्ष की ओर झुकता है, तो समीकरण और जटिल हो सकते हैं.

 ठाकरे बंधुओं की आगे की राजनीति 

ठाकरे बंधुओं ने 24 दिसंबर 2025 को औपचारिक गठबंधन की घोषणा कर दी पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर दोनों साथ दिखे और अब एक साथ चुनाव लड़ने जा रहे हैं ऐसे में यह संभव है कि आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में इसका असर देखने को मिल सकता है.

एक तरफ उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को बीजेपी के खिलाफ मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, तो दूसरी ओर राज ठाकरे अपनी घटती राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने के अवसर तलाश रहे हैं. ऐसे में दोनों का साथ आना राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के लिए फायदेमंद हो सकता है.

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