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'इतिहास इसलिए याद दिला रहा हूं...', मराठी-हिंदी विवाद पर राज ठाकरे के नेता ने RSS को लिखा पत्र

Maharashtra News: महाराष्ट्र में हिंदी को अनिवार्य करने पर MNS नेता संदीप देशपांडे ने मोहन भागवत को पत्र लिखा. उन्होंने भाषा थोपने की नीति पर चिंता जताते हुए इसे हिंदू समाज की एकता के लिए खतरा बताया.

Mohan Bhagwat News: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक शब्द बहुत गूंज रहा है, वो है ‘भाषा’. खासकर सरकार के एक फैसले के बाद से बहस तेज हो गई है कि क्या भाषा पर जोर देना जरूरी है या जोर जबरदस्ती से नुकसान ज्याजा होगा? दरअसल, महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में राज्य के सभी स्कूलों में 5वीं कक्षा तक हिंदी भाषा को अनिवार्य कर दिया है. इस कदम पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज हो गई है.

इसी मुद्दे को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता संदीप देशपांडे (Sandeep Deshpande) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखा है.

देशपांडे ने पत्र में क्या लिखा?

देशपांडे ने पत्र की शुरुआत भावुक अंदाज़ में करते हुए लिखा, “वास्तव में हमारी यह इच्छा थी कि आपसे सामने मिलकर हमारे विचार रखें. लेकिन मेरे जैसे एक सामान्य कार्यकर्ता को भेंट का अवसर मिलेगा या नहीं, इसलिए यह पत्र लिख रहा हूं.” उन्होंने पत्र में भारतीय इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि मराठों ने कभी भी अपनी भाषा को दूसरों पर नहीं थोपा, चाहे उनका शासन देशभर में फैला रहा हो.

पत्र में लिखा-  होलकरों का इंदौर में, शिंदों का ग्वालियर में, गायकवाड़ों का बड़ौदा में शासन था. दक्षिण भारत में भी तंजावुर तक मराठों का प्रभुत्व था. लगभग 200 वर्षों तक मराठों का भारत के बड़े हिस्से पर अधिपत्य रहा. इसके बावजूद, मराठों ने कभी भी अपनी भाषा—मराठी—को अन्य क्षेत्रों पर थोपा नहीं. यहां तक कि गूगल जैसी सुविधा न होते हुए भी, उन्होंने मराठी को संपर्क भाषा बनाने की जरूरत नहीं समझी. शिंदे जब ग्वालियर गए तो वे ‘सिंधिया’ बन गए—यही हमारे इतिहास की विशेषता है.

उन्होंने कहा शिंदे जब ग्वालियर गए तो वे ‘सिंधिया’ बन गए, ऐसे ही इंदौर में होलकर और बड़ौदा में गायकवाड़ों के शासन का उदाहरण देते हुए कहा कि भाषा थोपना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा है.

विविधता हमारी पहचान, एक भाषा को अनिवार्य बनाना कमजोरी- देशपांडे

देशपांडे का मानना है कि हिंदी को शिक्षा में अनिवार्य बनाना मराठी लोगों की सहन करने की क्षमता का अनुचित लाभ उठाना है. उन्होंने लिखा, “हमारा राष्ट्र विविधताओं में एकता के सिद्धांत पर खड़ा है. पंजाबी, गुजराती, मराठी, द्रविड़—ये सभी हमारी पहचान हैं. एक भाषा को अनिवार्य बनाना, इस एकता को कमजोर कर सकता है.”

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जैसे ईसाई धर्म के अनुयायी अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं, वैसे ही हिंदू धर्म को भी सभी भाषाओं को साथ लेकर चलना चाहिए. भाषा के जरिए धर्म और संस्कृति का विस्तार होता है, न कि जबरदस्ती थोपने से.

देशपांडे ने पाकिस्तान का किया जिक्र

देशपांडे ने पत्र में पाकिस्तान के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि वहां उर्दू थोपे जाने के कारण बंगाली मुसलमानों ने अलग रास्ता चुना. उन्होंने चेतावनी दी कि भारत में भी ऐसी भाषा-नीति से विभाजन की आशंका को नकारा नहीं जा सकता.

अपने पत्र के अंत में उन्होंने लिखा, “हमें विश्वास है कि आप इस भाषा की जबरदस्ती पर रोक लगाएंगे. यदि संभव हो तो सामने से भेंट कर अपनी भावना आपके समक्ष रखने की भी इच्छा है.”

देशपांडे का यह पत्र ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में भाषा की राजनीति फिर से केंद्र में आ गई है. अब देखना यह होगा कि मोहन भागवत या संघ की तरफ से इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है.

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