महाराष्ट्र: 4 साल में 13,928 किसानों की आत्महत्या, जिलावार आंकड़े देने से भी इनकार
महाराष्ट्र में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 13,928 किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं. हालांकि आरोप है कि राज्य सरकार ने पहली बार जिलावार आंकड़े देने से इनकार किया है.

महाराष्ट्र में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 13,928 किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं. यानी हर दिन औसतन आठ से अधिक किसानों ने आत्महत्या की. राज्य सरकार के ये आंकड़े सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए हैं. हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे का आरोप है कि राज्य सरकार ने पहली बार जिलावार आंकड़े देने से इनकार किया है. उन्हें अपील के बाद केवल पूरे राज्य के आंकड़े उपलब्ध कराए गए.
सरकार के राहत एवं पुनर्वास विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, आत्महत्या के कुल 13,928 मामलों में से 8,945 मामले सरकारी आर्थिक सहायता के लिए पात्र पाए गए, जबकि 4,042 मामलों को अपात्र बताकर खारिज कर दिया गया. वहीं, 941 मामलों की जांच अब भी जारी है.
पात्र पाए गए 8,945 मामलों में से 8,650 परिवारों को एक-एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई है. बाकी 295 परिवार अब भी सहायता मिलने का इंतजार कर रहे हैं. इस तरह करीब 29 प्रतिशत मामलों में सरकारी सहायता के दावे खारिज कर दिए गए.
RTI में जिलावार आंकड़े देने से किया इनकार
‘यंग व्हिसलब्लोअर्स फाउंडेशन’ से जुड़े कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे ने जनवरी 2022 से जून 2026 तक के जिलावार और महीनेवार आंकड़े मांगे थे. 24 जुलाई को विभाग की जन सूचना अधिकारी स्नेहल सावंत ने जवाब दिया कि यह जानकारी संबंधित जिलाधिकारी कार्यालयों के पास उपलब्ध है और वहीं से प्राप्त की जानी चाहिए. घाडगे का कहना है कि इससे पहले यही विभाग कई वर्षों तक जिलावार आंकड़े उपलब्ध कराता रहा है.
इसके बाद घाडगे ने 18 अगस्त को प्रथम अपील दायर की. 8 सितंबर को हुई सुनवाई के बाद प्रथम अपीलीय प्राधिकरण ने पूरे महाराष्ट्र के आंकड़ों का एक संयुक्त विवरण दिया, लेकिन जिलावार जानकारी उपलब्ध नहीं कराई. घाडगे का दावा है कि पिछले 10 वर्षों में यह पहली बार है, जब विभाग ने किसानों की आत्महत्या के जिलावार आंकड़े देने से इनकार किया है. उन्होंने आरोप लगाया कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के दबाव में ऐसा किया गया.
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जिलावार आंकड़े क्यों हैं जरूरी?
जिलावार आंकड़ों से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किसानों की आत्महत्या के मामले किन इलाकों में अधिक हैं और सरकारी योजनाएं कहां प्रभावी नहीं हो पा रही हैं. इनके अभाव में शोधकर्ताओं, पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों के लिए यह आकलन करना मुश्किल हो जाता है कि सरकारी सहायता सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच रही है या नहीं. घाडगे ने कहा, 'मैं पिछले एक दशक से इस मुद्दे को उठा रहा हूं. इसके लिए पत्र लिखे, RTI दाखिल की और अधिकारियों से अपील की कि वे आंकड़ों के पीछे छिपे इंसानों की जिंदगी को भी समझें.'
उन्होंने कहा कि आत्महत्या करने वाला हर किसान अपने पीछे एक ऐसा परिवार छोड़ जाता है, जिसकी जिंदगी अचानक बिखर जाती है. परिवार पर कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी आ जाती है, विधवा के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है और माता-पिता को कभी न खत्म होने वाले दुख के साथ जीना पड़ता है. किसी भी तरह का मुआवजा उनके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता. घाडगे के मुताबिक, इतने वर्षों बाद भी बुनियादी पारदर्शिता और जरूरतमंद परिवारों को सार्थक सहायता दिलाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
उन्होंने कहा, 'अगर सरकार हर आत्महत्या को रोक नहीं सकती, तो कम से कम यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संकट से जूझ रहे किसी भी परिवार को बेसहारा न छोड़ा जाए. किसानों की आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े निराशाजनक हैं. मैं चाहता था कि कम से कम परिवारों को इस स्थिति तक पहुंचने से बचाया जा सके, लेकिन अब तो आंकड़े भी छिपाए जा रहे हैं.'
2023 में भी मुख्यमंत्री को लिखा था पत्र
किसानों की आत्महत्या और मुआवजे से जुड़े मुद्दे पर घाडगे ने 21 जून 2023 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को भी पत्र लिखा था. उन्होंने उन परिवारों का मुद्दा उठाया था, जिनके एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता के दावे खारिज कर दिए गए थे.
उन्होंने गोपीनाथ मुंडे शेतकरी अपघात विमा योजना के तहत आत्महत्या के मामलों को भी शामिल करने का प्रस्ताव दिया था, ताकि प्रभावित परिवारों को कारण की परवाह किए बिना दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता मिल सके. घाडगे ने तर्क दिया था कि पिछले दो दशकों में किसानों के लिए बनाई गई योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई हैं, क्योंकि सहायता को संकटग्रस्त किसानों तक सीमित रखने के बजाय सभी किसानों में बांट दिया गया.
उन्होंने तालुका स्तर पर समितियां बनाने का सुझाव भी दिया था. इन समितियों में सामाजिक सेवा से जुड़े लोगों की भागीदारी अधिक रखने और संकटग्रस्त परिवारों की पहचान कर उन्हें ग्रीन राशन कार्ड देने का प्रस्ताव रखा गया था, ताकि ऐसे परिवारों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके. घाडगे के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय ने उनका ई-मेल मिलने की पुष्टि की थी और उसे कृषि विभाग को भेज दिया था. हालांकि, उन्हें इस मामले में कोई जवाब नहीं मिला.
तीन साल बाद भी सवाल बरकरार
मुख्यमंत्री को पत्र लिखे जाने के करीब तीन साल बाद भी राज्य में किसानों की आत्महत्या का संकट बना हुआ है. सरकार के अपने आंकड़ों में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 13,928 मामले दर्ज होने की बात सामने आई है.
हालांकि, जिलावार आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि किन जिलों में स्थिति सबसे गंभीर है और सरकारी सहायता का लाभ सबसे अधिक प्रभावित परिवारों तक किस हद तक पहुंच रहा है.






















