Xप्लेन: दतिया में हार की वजह नरोत्तम मिश्रा हुए तो क्या बीजेपी देगी राजेंद्र भारती जैसी सजा?
Datia Bypoll Election Result: बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने साफ कहा है, 'हम परिणामों का अध्ययन करेंगे. पार्टी उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेगी जिन्होंने अनुशासन बनाए नहीं रखा.'

दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह 'कुंवर साहब' ने बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से शिकस्त दी. हार के तुरंत बाद से ही सियासी गलियारों में सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा है- नरोत्तम मिश्रा. आरोप है कि नरोत्तम मिश्रा ने टिकट कटने की नाराजगी में जानबूझकर दतिया में 'कमल नहीं खिलने दिया', लेकिन क्या वाकई यह हार किसी एक शख्स की 'नाराजगी' का नतीजा है, या फिर बीजेपी की अपनी रणनीतिक भूल और संगठनात्मक कमजोरी इसके लिए जिम्मेदार है. आखिर सच क्या है और ऐसा है तो क्या बीजेपी नरोत्तम मिश्रा को वैसी ही सजा देगी, जैसी कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को दी थी...
टिकट कटने का वह दर्द जो सड़क पर उतर आया
इस पूरे विवाद की शुरुआत उसी दिन हो गई थी, जब बीजेपी ने तीन बार के विधायक और पार्टी के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार घोषित किया. मिश्रा के समर्थकों का गुस्सा इस कदर फूटा कि उन्होंने ग्वालियर-झांसी हाईवे को करीब 18 घंटे तक जाम कर दिया.
प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ झड़पें हुईं, पथराव हुआ और स्थिति को काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े. कई बीजेपी पदाधिकारियों और स्थानीय नेताओं ने खुलकर पार्टी के फैसले का विरोध किया और इस्तीफे की धमकियां दीं. इस घटना ने यह साफ कर दिया कि संगठन के भीतर मिश्रा की पकड़ कितनी मजबूत है और टिकट कटने का दंश कितना गहरा है.
नामांकन के दौरान बहे आंसू जिसने पूरा खेल बदल दिया
इस चुनाव का सबसे निर्णायक पल वह था जब आशुतोष तिवारी अपना नामांकन दाखिल करने पहुंचे. मीडिया कैमरों के सामने नरोत्तम मिश्रा भावुक होकर रो पड़े. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वह पल था जिसने तिवारी की उम्मीदवारी को एक सामान्य चुनावी मुकाबले से निकालकर 'नरोत्तम मिश्रा के अपमान' के जनमत संग्रह में बदल दिया.
मिश्रा ने बाद में मीडिया से बातचीत में अपने आंसुओं की वजह बताते हुए कहा, 'अफसोस तो नहीं, लेकिन मेरे कार्यकर्ताओं के साथ जो बर्ताव हुआ था, उसके आंसू थे. मेरा जो दतिया से जुड़ाव था, ये उस बात के लिए आंखें छलक आई थी.' यह तस्वीर मतदाताओं के दिलो-दिमाग पर गहरा असर छोड़ गया.
'गद्दारी' का आरोप: संकेत और सबूतों की कसौटी
हार के बाद बीजेपी के भीतर ही यह आवाजें उठने लगीं कि नरोत्तम मिश्रा ने जानबूझकर पार्टी की हार का सामना करा दिया. लेकिन मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शरमन नगेले दो संकेत बताते हैं...
1. 'गद्दारी' के आरोप को मजबूत करने के संकेत:
- नरोत्तम मिश्रा के करीबी समर्थकों और लंबे समय से उनके साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं का एक बड़ा हिस्सा चुनाव प्रचार के दौरान पूरी तरह से ठंडा रहा. लगभग 18 सालों तक, नरोत्तम मिश्रा के करीबी नेताओं का ही संगठन पर कब्जा था. जब उन्हें टिकट नहीं मिला, तो इन कार्यकर्ताओं का एक बड़ा हिस्सा सक्रिय अभियान से दूर रहा.
- हाईवे जाम और हिंसक प्रदर्शन ने पार्टी के लिए नकारात्मक माहौल बनाया.
- मिश्रा के आंसुओं ने भावनात्मक रूप से इस चुनाव को उनके समर्थकों के लिए 'सम्मान की लड़ाई' बना दिया.
2. 'गद्दारी' के आरोप को झूठा साबित करने वाले संकेत:
- नरोत्तम मिश्रा ने खुद सार्वजनिक रूप से आशुतोष तिवारी के लिए प्रचार किया. वे दर-दर गए और उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी के लिए वोट मांगे. उन्होंने मतगणना से पहले तक बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी भी की.
- खुद हारे हुए प्रत्याशी आशुतोष तिवारी ने अपने बयान में नरोत्तम मिश्रा का नाम तक नहीं लिया. उन्होंने कहा, 'जो बीजेपी को अपनी मां कहते हैं, उन्होंने धोखा दिया.' यह निशाना साफ तौर पर मिश्रा के उन समर्थकों पर था जो सक्रिय नहीं हुए, न कि खुद नरोत्तम मिश्रा पर.
हार की असली वजह: सिर्फ एक चेहरा या कई कारणों का मेल?
दतिया में बीजेपी की हार को सिर्फ नरोत्तम मिश्रा के मत्थे मढ़ देना एक सतही विश्लेषण होगा. भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर मौजूद डेटा इस पूरे घटनाक्रम पर एक अलग ही रोशनी डालता है:
- आजाद समाज पार्टी (ASP) का प्रदर्शन: ASP उम्मीदवार को इस चुनाव में 22,527 वोट मिले. इसने मुकाबले को सीधे तौर पर त्रिकोणीय बना दिया और बीजेपी के पारंपरिक वोट गणित को पूरी तरह से बिगाड़ दिया. ये वोट अगर इधर-उधर बंटते, तो नतीजा कुछ और भी हो सकता था.
- स्थानीय और जातीय समीकरण: दतिया की राजनीति में ब्राह्मण और ठाकुर मतदाताओं की भूमिका हमेशा से अहम रही है. आशुतोष तिवारी और घनश्याम सिंह, दोनों का इन जातीय समूहों पर प्रभाव है, जिससे बीजेपी का कोर वोट बैंक बंट गया.
- स्थानीय मुद्दे: सड़क, पीने का पानी, बिजली, रोजगार और स्थानीय व्यापार से जुड़ी समस्याएं 2023 से ही जस की तस थीं, जिनके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी काम कर रही थी.
क्या बीजेपी को वाकई इतना बड़ा झटका लगा?
बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने चुनावी नतीजों पर X पर डेटा रिपोर्ट पेश की, जो इस हार को एक अलग ही नजरिए से देखने पर मजबूर करते हैं:
| पैरामीटर | 2023 विधानसभा चुनाव (कांग्रेस जीती) | 2026 उपचुनाव (कांग्रेस जीती) | बदलाव |
| कांग्रेस का वोट शेयर | 50.8% | 42.39% | 8.41% की गिरावट |
| जीत का अंतर | 7,155 वोट | 6,016 वोट | 1,139 वोट कम हुआ |
| जीत का प्रतिशत अंतर | 4.5% | 3.82% | 0.68% की गिरावट |
| बीजेपी को मिले वोट | 2023 के आंकड़े | 2023 से 1,700 ज्यादा | 1,700 की बढ़ोतरी |
हार के बाद अलग-अलग नेताओं ने अलग-अलग तरह से अपनी राय रखी. मुख्यमंत्री मोहन यादव के स्टार प्रचारक होने और उनके रोड शो के बावजूद बीजेपी जमीनी स्तर पर अपेक्षित माहौल नहीं बना सकी. हार के बाद आशुतोष तिवारी का दर्द उनके शब्दों में साफ झलका जब उन्होंने पार्टी के अंदर ही 'धोखे' की बात कही.
वहीं, अमित मालवीय ने आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि यह हार कोई 'प्रचंड जनादेश' नहीं है, बल्कि एक कड़े मुकाबले का नतीजा है. नरोत्तम मिश्रा ने खुद जीत के लिए पार्टी की पूरी कोशिश की बात कही और इसे कार्यकर्ताओं की भावनाओं से जोड़कर देखा.

अगर आरोप साबित हुए तो क्या बीजेपी नरोत्तम मिश्रा को सजा देगी?
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने साफ कहा है, 'हम परिणामों का अध्ययन करेंगे. पार्टी उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेगी जिन्होंने अनुशासन बनाए नहीं रखा.' यह बयान सीधे तौर पर नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के कारनामों की ओर इशारा करता है. लेकिन क्या बीजेपी सच में नरोत्तम मिश्रा जैसे कद्दावर नेता के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करेगी? इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है. पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के मुताबिक,
- कार्रवाई के पक्ष में तर्क: पार्टी के भीतर समर्थकों का खुला विद्रोह, हाईवे जाम जैसा प्रदर्शन, इस्तीफों की धमकी और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता अनुशासनहीनता की कैटेगरी में आते हैं. बीजेपी इस मामले में सख्त रही है.
- कार्रवाई न होने के पक्ष में तर्क: खुद नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी के फैसले का सार्वजनिक रूप से पालन किया और आशुतोष तिवारी के लिए प्रचार किया. अमित मालवीय का डेटा बताता है कि बीजेपी के वोट बढ़े हैं, जो यह साबित करता है कि मिश्रा ने व्यक्तिगत स्तर पर कोई नुकसान नहीं पहुंचाया. बीजेपी नरोत्तम मिश्रा जैसे प्रभावशाली और जमीन से जुड़े नेता को खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी, खासकर तब जब 2028 के विधानसभा चुनाव में अभी कुछ ही वक्त बाकी है.
रशीद किदवई कहते हैं, 'कांग्रेस ने 3 अगस्त को ही राजेंद्र भारती को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निष्कासित कर दिया. लेकिन नरोत्तम मिश्रा का मामला उससे बिल्कुल अलग है. राजेंद्र भारती पर सीधे तौर पर पार्टी के खिलाफ काम करने के ठोस आरोप थे और उन्होंने खुला मोर्चा ले रखा था, जबकि नरोत्तम मिश्रा ने कभी भी पार्टी लाइन से बाहर जाकर कोई बयान नहीं दिया. उनका 'अपराध' अगर कुछ है, तो वह है उनके समर्थकों का गुस्सा और उनकी निष्क्रियता, जिस पर उनका पूर्ण नियंत्रण हो, यह जरूरी नहीं.'
वहीं शरमन नगेले ने कहा, 'नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देना बीजेपी की रणनीति भी हो सकती है. मुमकिन है कि नरोत्तम को समझाया गया हो कि 2028 के विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट दोबारा मिल जाएगी, जिस वजह से मिश्रा ने अभी सब्र कर लिया. हालांकि, चुनावी नतीजों ने बिसात पलट दी है.'
'गद्दारी' नहीं, बल्कि सामूहिक विफलता
यह हार एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कई वजहों का सामूहिक नतीजा थी. टिकट बदलने से उपजा असंतोष, स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी, आजाद समाज पार्टी में वोटों का बंटवारा, जमीनी स्तर पर अनसुलझे मुद्दे और कांग्रेस का मजबूत स्थानीय चेहरा. खुद नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी के लिए वोट मांगे और आंकड़े भी बताते हैं कि बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है.
बीजेपी के लिए नरोत्तम मिश्रा को कठोर सजा देना आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे पार्टी को राजनीतिक रूप से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. फिलहाल, मध्य प्रदेश की सियासत में यह कहानी 'अपनों की गद्दारी' और 'रणनीतिक भूल' के बीच झूलती रहेगी, और इसके असली सियासी नतीजे आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएंगे.





















