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Jharkhand: बिजली कड़कते ही कांप जाती है इस गांव के लोगों की रूह, यहां हर साल 500 से ज्यादा बार टूटती है आसमानी आफत 

Ranchi News: झारखंड में एक ऐसा गांव है जहां पूरे साल में 500 से भी ज्यादा बार आसमानी बिजली गिरती है. इस गांव में शायद ही कोई ऐसा परिवार है, जिसने वज्रपात की वजह से जान-माल का नुकसान ना उठाया हो.

Lightning Deaths In Jharkhand: आसमान में जब भी बिजली कड़कती है तो रांची (Ranchi) के नामकुम प्रखंड स्थित वज्रमरा गांव (Vajramara Village) के लोगों की रूह किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठती है. आसमानी बिजली ने इस गांव में इतनी तबाही मचाई है कि इसका नाम ही वज्रमरा पड़ गया. संभव है कि ये पूरे देश का अकेला ऐसा गांव है, जहां पूरे साल में 500 से भी ज्यादा बार आसमानी बिजली गिरती है. इस गांव का शायद ही कोई ऐसा परिवार है, जिसने वज्रपात की वजह से जान-माल का नुकसान ना उठाया हो. इसी तरह रांची के ही पिठौरिया गांव में स्थित एक प्राचीन किले पर भी हर साल कई बार आसमानी बिजली गिरती है. ये किला लगभग 200 साल पहले इस इलाके के राजा रहे जगतपाल सिंह का था, जो ढहकर खंडहर में तब्दील हो चुका है. 

ये 6 राज्य हैं संवेदनशील
भारतीय मौसम विभाग ने थंडरिंग और लाइटनिंग के खतरों को लेकर देश के जिन 6 राज्यों को सबसे संवेदनशील के तौर पर चिन्हित किया है, झारखंड भी उनमें एक है. आसमानी बिजली का कहर झारखंड के लिए एक बड़ी आपदा है. मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बीते वर्ष यानी 2021-22 में झारखंड में वज्रपात की 4 लाख 39 हजार 828 घटनाएं हुई हैं. इसके पहले 2020-21 में राज्य में लगभग साढ़े चार लाख बार वज्रपात हुआ था. आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में सबसे अधिक बिजली मध्य प्रदेश में गिरती है. बीते वर्ष वहां साढ़े छह लाख से अधिक बार बिजली गिरी थी, जबकि छत्तीसगढ़ में करीब 5.7 लाख, महाराष्ट्र में 5.4 लाख, ओडिशा में 5.3 तथा पश्चिम बंगाल में 5.1 लाख से अधिक बार वज्रपात की घटनाएं रिकॉर्ड की गईं.


Jharkhand: बिजली कड़कते ही कांप जाती है इस गांव के लोगों की रूह, यहां हर साल 500 से ज्यादा बार टूटती है आसमानी आफत 

प्री मॉनसून के दौरान होती हैं घटनाएं 
ये पाया गया है कि वज्रपात की सबसे ज्यादा घटनाएं मई-जून में प्री मॉनसून के दौरान होती हैं. इसी वर्ष की बात करें तो प्री-मॉनसून और मॉनसून के बीते दिनों में ही वज्रपात की घटनाओं में झारखंड में अब तक 28 लोगों की मौत हो चुकी है. पिछले 10 वर्षो में यहां वज्रपात की घटनाओं में 1700 से भी ज्यादा मौतें हुई हैं. वर्ष 2011 से लेकर अब तक किसी भी वर्ष वज्रपात से होने वाली मौतों की संख्या 150 से कम नहीं रही. 2017 में तो वज्रपात से मौतों का आंकड़ा 300 दर्ज किया था. इसी तरह 2016 में 270 और 2018 में 277 मौतें हुई थीं.

यहां होता है अधिक खतरा 
रांची के पर्यावरणविद और भूगर्भशास्त्री नीतीश प्रियदर्शी बताते हैं कि समतली इलाकों की तुलना पहाड़ी और जंगलों में अधिक खतरा होता है. छोटी पहाड़ियां, लंबे पेड़, जंगल, दलदली क्षेत्र, ऊंचे-ऊंचे टावर और बड़ी इमारतें वज्रपात के लिहाज से अधिक संवेदनशील मानी जाती हैं. यहां पर वज्रपात समतली इलाकों की तुलना में अधिक होता है. समुद्र तट से अधिक ऊंचाई पर होने व पठारी और जंगली क्षेत्रों में विशेषकर जहां जमीन की ऊंचाई में अचानक परिवर्तन आ जाता है. वहां वाष्प कण आपस में टकरा कर अत्यधिक ऊर्जा का सृजन करते हैं, जो कि खनिज भूमि की ओर आकर्षित होकर वज्रपात का रूप धारण कर लेता है.


Jharkhand: बिजली कड़कते ही कांप जाती है इस गांव के लोगों की रूह, यहां हर साल 500 से ज्यादा बार टूटती है आसमानी आफत 

विकसित किया गया है एप 
रांची के नामकुम स्थित भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान के कृषि मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक डॉ राजन चौधरी, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार ज्योतिर्मय घोष और डॉ निर्मल कुमार की टीम ने वज्रपात से सावधान करने के लिए दामिनी नाम का मोबाइल एप विकसित किया है. वैज्ञानिक ज्योतिर्मय घोष कहते हैं कि अगर लोगों तक वज्रपात की घटनाओं को लेकर पहले से अलर्ट कर दिया जाये तो जानमाल को होने वाले नुकसान में कमी लाई जा सकती है.

ये भी जानें
वज्रपात को झारखंड सरकार ने विशिष्ट आपदा (स्पेसिफिक डिजास्टर) घोषित कर रखा है. इससे होने वाले नुकसान में कमी लाने के लिए राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने पहले कई कदम उठाए हैं. मसलन, विभाग ने 2019 में एसएमएस सिस्टम के जरिए लोगों को सचेत करने की व्यवस्था की थी, लेकिन ये सिस्टम फिलहाल फेल है. नेटवर्क का सही लोकेशन नहीं होने और लोगों के द्वारा अपने स्मार्टफोन में लोकेशन एक्टीवेट नहीं करने के कारण एसएमएस पहुंचने में दिक्कत हो रही है.


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लगाए गए हैं लाइटनिंग अरेस्टर
विभाग ने राज्य में वज्रपात को लेकर संवेदनशील माने जाने वाली जगहों पर लाइटनिंग अरेस्टर नामक यंत्र भी लगाए हैं. चार साल पहले रांची के नामकुम प्रखंड क्षेत्र में करीब दो दर्जन स्थानों पर लाइटनिंग अरेस्टर लगाए गए हैं. लाइटनिंग अरेस्टर आसमान से गिरने वाली बिजली को खींचकर जमीन में डाल देता है.

ऐसे रह सकते हैं सुरक्षित 
वैज्ञानिक संतोष कुमार बताते हैं कि वज्रपात के दौरान पेड़ों के नीचे शरण लेना सबसे खतरनाक है. इससे बचाव के लिए कई तरीके अपनाए जा सकते हैं. यदि, आसमान में बिजली कड़क रही हो और सुरक्षित स्थान पर नहीं जा पा रहे हैं, तो पैरों के नीचे सूखी चीजें जैसे लकड़ी, प्लास्टिक और बोरा में से कोई एक अपने पैरों के नीचे रख लेना चाहिए. साथ ही दोनों पैरों को आपस में सटा लेना चाहिए. दोनों हाथों को घुटने पर रखकर अपने सिर को जमीन की ओर यथासंभव झुका लें, लेकिन सिर को जमीन से ना छुआएं ना ही जमीन पर लेटें. ऐसा कर खुद को सुरक्षित कर सकते हैं.

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