US Dollar: रुपया से लेकर पाउंड तक... डॉलर से पुरानी हैं ये मुद्राएं, फिर USD कैसे बना करेंसी का बादशाह?
US Dollar: अमेरिकी डॉलर एक ग्लोबल करेंसी है और दुनिया भर में अपना दबदबा बनाए हुए है. आइए जानते हैं कि जब कुछ करेंसी डॉलर से पुरानी हैं उसके बावजूद भी वे वैश्विक मुद्रा क्यों नहीं बन पाई.

US Dollar: जब भी लोग किसी करेंसी की ताकत की बात करते हैं तो अक्सर उम्र को एक फायदा माना जाता है. इस लॉजिक से अमेरिकी डॉलर को कभी भी टॉप पर होना ही नहीं चाहिए था. दरअसल कई करेंसी डॉलर से काफी ज्यादा पुरानी हैं लेकिन इसके बावजूद भी अमेरिकी डॉलर ग्लोबल ट्रेड, रिजर्व और फाइनेंस पर हावी है. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.
अमेरिकी डॉलर से पुरानी करेंसी
अमेरिकी डॉलर अधिकारी तौर पर 1785 और 1792 के बीच अस्तित्व में आया था. उससे काफी पहले कई जगहों ने पहले ही एक स्थिर मॉनेटरी सिस्टम को डेवलप कर लिया था. ब्रिटिश पाउंड जिसका इस्तेमाल पहली बार 775 ऐडी में एंग्लो सैक्सन इंग्लैंड में हुआ था, दुनिया की सबसे पुरानी करेंसी है जो अभी भी इस्तेमाल में है. यह डॉलर से लगभग 1000 साल पुरानी है. इसी के साथ भारतीय रुपया 16वीं सदी में शेर शाह सूरी के शासनकाल के दौरान औपचारिक रूप से स्टैंडर्डाइज किया गया था. लेकिन इसकी जड़े छठवीं सदी ईसा पूर्व के प्राचीन चांदी के सिक्कों तक फैली हुई है.
इसी तरह 1214 में पेश किया गया सर्बियाई दिनार और रूसी रूबल जो 13वीं सदी का है, सदियों से राजनीतिक बदलावों से बचे रहे हैं. यहां तक कि स्विस फ्रैंक जिसे आधिकारिक तौर पर 1850 में देशभर में अपनाया गया था, अमेरिकी डॉलर के विश्व स्तर पर प्रासंगिक होने से काफी पहले स्विस कैंटन में अलग-अलग रूपों में मौजूद था.
अगर ये करेंसी पुरानी हैं तो उन्होंने दबदबा क्यों नहीं बनाया
सिर्फ उम्र से ही दबदबे की गारंटी नहीं होती. इनमें से ज्यादातर करेंसी क्षेत्रीय साम्राज्य या फिर लोकल ट्रेड सिस्टम से जुड़ी हुई थीं. उनका प्रभाव उन राज्यों की शक्ति के साथ बढ़ता और घटता था जिन्होंने उन्हें जारी किया था. जब वे साम्राज्य कमजोर हुए तो उनकी करेंसी ने ग्लोबल अपील खो दी.
ब्रेटन वुड्स का टर्निंग प्वाइंट
अमेरिकी डॉलर के लिए सबसे बड़ा लम्हा 1944 में ब्रिटेन वुड्स समझौते के साथ आया. 44 देशों ने एक ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम पर सहमति व्यक्ति की. इसमें प्रमुख करेंसी को अमेरिकी डॉलर के साथ जोड़ा गया और डॉलर खुद एक निश्चित दर पर सोने से समर्थित रखा गया. इसे तुरंत यूएसडी ग्लोबल मॉनेटरी सिस्टम का एंकर बन गया.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप और एशिया के बड़े हिस्से बर्बाद हो गए थे. वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका आर्थिक रूप से शक्तिशाली, औद्योगिक रूप से उन्नत और आर्थिक रूप से स्थिर बनकर उभरा. उस समय अमेरिका के पास दुनिया के लगभग दो तिहाई सोने का भंडार था. बस यही वजह थी कि डॉलर को वैल्यू का सबसे सुरक्षित जरिया माना गया.
पेट्रोडॉलर का फायदा
1970 के दशक में अमेरिका ने सऊदी अरब और दूसरे ओपीईसी देशों के साथ एक रणनीतिक डील की. इस डील के मुताबिक तेल का व्यापार सिर्फ अमेरिकी डॉलर में होगा. इस पेट्रोडॉलर सिस्टम ने हर तेल आयात करने वाले देश को डॉलर रखने के लिए मजबूर कर दिया. जिस वजह से अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मांग हमेशा के लिए बढ़ गई.
ये भी पढ़ें: क्या ED के ऑफिस में छापा मार सकती है राज्य पुलिस, रांची में रेड के बाद उठे सवाल
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL



























