DUSU चुनाव में सुरक्षित PG बना मुद्दा, छात्र राजनीति की तस्वीर बदली
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 18 सितंबर को है. सत्य निकेतन हादसे के बाद छात्र राजनीति के मुद्दे बदलकर अब सुरक्षित आवास, हॉस्टल और पीजी बन गए हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव की वोटिंग में अब कुछ ही दिन बाकी हैं और इसी बीच सत्य निकेतन में इमारत ढहने की घटना ने छात्र राजनीति के मुद्दों को नया मोड़ दे दिया है. हादसे में छात्रों समेत लोगों की जान जाने के बाद अब सुरक्षित आवास, हॉस्टल की कमी और निजी पीजी की व्यवस्था चुनावी बहस के केंद्र में आती दिख रही है.
सत्य निकेतन हादसे ने बदल दिया चुनाव का मुद्दा
डीयू की छात्र राजनीति में हॉस्टल और सुरक्षित पीजी की मांग पहले भी उठती रही है, लेकिन सत्य निकेतन की घटना ने इन सवालों को सीधे छात्रों की सुरक्षा से जोड़ दिया है. देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आने वाले बड़ी संख्या में छात्र हॉस्टल नहीं मिलने के कारण निजी पीजी या किराए के कमरों में रहने को मजबूर होते हैं. ऐसे में इन जगहों की सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
हादसे के बाद डीयू प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने के साथ राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े छात्र संगठनों की भूमिका भी चर्चा में है. डीयू की छात्र राजनीति में सक्रिय लगभग हर संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़ा है. ऐसे में इस बार छात्रों के बीच यह सवाल अहम है कि चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर सुरक्षित आवास जैसे बुनियादी मुद्दों का स्थायी समाधान कौन सुनिश्चित करेगा.
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इस बार केवल मुद्दा उठाना काफी नहीं होगा
हॉस्टल और यू-स्पेशल बसें डीयू छात्रसंघ चुनाव के पुराने और प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे हैं. इन सवालों की गूंज दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भी सुनाई देती रही है और BJP, कांग्रेस तथा AAP समेत विभिन्न दलों ने इन्हें अपने घोषणा पत्रों में जगह दी है. इसके बावजूद छात्रों के सामने आज भी वही सवाल खड़े हैं. पिछले वर्षों में कितने नए हॉस्टल बनाए गए, उनमें कितने छात्रों को वास्तव में रहने की सुविधा मिली और निजी पीजी तथा हॉस्टलों की सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी आखिर किसकी जिम्मेदारी है. साथ ही यह सवाल भी है कि दूसरे राज्यों से दिल्ली आने वाले छात्रों को बड़ी संख्या में निजी आवास पर निर्भर क्यों रहना पड़ रहा है.
छात्र आंदोलन कई बार बड़े बदलावों की वजह बने हैं. ऐसे में डीयू की छात्र राजनीति के सामने अब चुनौती केवल हॉस्टल, पीजी या यू-स्पेशल बस जैसे मुद्दों को चुनाव के दौरान उठाने की नहीं, बल्कि उन्हें समाधान तक पहुंचाने की है. सत्य निकेतन की घटना ने छात्रों की सुरक्षा से जुड़े सवालों को जिस तरह सामने ला दिया है, उससे चुनावी संगठनों पर ठोस जवाब देने का दबाव बढ़ सकता है.
ABVP ने शुरू की सक्रियता, NSUI भी मैदान में
सत्य निकेतन हादसे के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रशासन की कथित लापरवाही का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया है. खास बात यह है कि केंद्र, दिल्ली और एमसीडी में BJP की सरकार होने के बावजूद ABVP इस मामले में प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल उठा रही है. संगठन छात्रों के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह इस मुद्दे पर उनके साथ खड़ा है और इसे पार्टी राजनीति से अलग रखकर देखता है.
दूसरी ओर कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI समेत अन्य छात्र संगठनों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. ऐसे में डीयू छात्रसंघ चुनाव की बहस अब केवल कैंपस की आंतरिक राजनीति तक सीमित रहने के बजाय छात्रों के आवास, सुरक्षा और कैंपस के बाहर की जिंदगी से जुड़े सवालों तक पहुंचती दिख रही है. आने वाले दिनों में ABVP और NSUI के बीच इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है.
डूसू की राजनीति से निकले कई बड़े नाम
डीयू की छात्र राजनीति का प्रभाव विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहा है. यहां से निकले कई छात्र नेता आगे चलकर राष्ट्रीय और दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण पहचान बना चुके हैं. BJP और कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत डीयू छात्र राजनीति से की. पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन और विजय गोयल, अलका लांबा तथा रागिनी नायक जैसे नेताओं की पहचान डूसू की राजनीति से भी जुड़ी रही है. दिल्ली की मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी डीयू की छात्र राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी.
डूसू से निकलकर नगर निगम, विधानसभा और संसद तक पहुंचे नेताओं के सामने अब छात्र राजनीति के पुराने मुद्दों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. जब हॉस्टल की कमी लंबे समय से चुनावी बहस का हिस्सा रही है, तो इतने वर्षों बाद भी छात्रों के लिए पर्याप्त आवास की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी, यह सवाल इस बार पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.
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