'मुखौटा डांस देखने से नष्ट हो जाता है पाप', बोधगया में भूटान से आए तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं ने किया ये नृत्य
Mukhauta Dance: बोधगया में हर साल विश्व शांति के लिए विशेष पूजा के बाद इस तरह का नृत्य व संगीत का आयोजन किया जाता है. यह कार्यक्रम लगातार तीन दिनों तक चलता है.

Bhutan Temple Bodh Gaya: जीवों के कल्याण और बुरी आत्माओं के पराजय के लिए बोधगया के भूटान मंदिर में बुधवार को मुखौटा नृत्य किया गया. भूटान की संस्कृति में मुखौटा नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है. ऐसी मान्यता है कि इस नृत्य से सभी तरह के बाधाएं दूर होती हैं. नृत्य देखने मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं और निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है. बोधगया के जानपुर में स्थित ड्रुक थुवतेन छोलिंग शांडूंग बौद्धमठ में भूटान के बौद्ध लामाओं ने पारंपरिक वाद्ययंत्र के साथ पारंपरिक वेषभूषा में नृत्य पेश किया. बौद्ध धर्म गुरुओं के मौजूदगी में आध्यात्मिक नृत्य शुरू हुआ.
बौद्ध श्रद्धालुओं के समक्ष दी गई प्रस्तुति
विभिन्न पारंपरिक परिधानों में बौद्ध श्रद्धालुओं के समक्ष अपनी प्रस्तुति दी. यह आध्यात्मिक नृत्य तांत्रिक विधि से बनाए गए मंडाला के समक्ष हुआ. इसके बाद आध्यात्मिक धर्मगुरु ने मंडाला अभिषेक किया. पारंपरिक परिधान व मुखौटा धारण किए मोनास्ट्री के कई लामा मंडाला ने यह नृत्य किया, ताकि कोई विघ्न-बाधा न आए और इसके साक्षी धर्मगुरु बने थे. आध्यात्मिक नृत्य आह्वान किए गए देवी-देवताओं को समर्पित करने की परंपरा है, जिसका निर्वहन आज भी किया जा रहा है.
भूटान बौद्ध मॉनेस्ट्री के जेनरल सेक्रेटरी सोनम दोरजी ने बताया कि भूटान की परंपरा है. यह नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक रूप है. इस नृत्य और संगीत से शांति मिलती है. साथ ही बुरी आत्माओं से मुक्ति भी प्राप्त होती है. विशेषकर मास्क पहनकर यह नृत्य किया जाता है. विश्व शांति के लिए विशेष पूजा के बाद इस तरह का नृत्य व संगीत का आयोजन किया जाता है. यह कार्यक्रम लगातार तीन दिनों तक आयोजित होगा. ऐसा माना जाता है कि हमारे आस-पास बुरी आत्माएं भी रहती हैं, जो लोगों को अशांत करती हैं.
सेक्रेटरी सोनम दोरजी ने बताई क्या है परंपरा?
सोनम दोरजी ने कहा कि बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए और शत्रु को पराजय करने के उद्देश्य से यह मास्क नृत्य किया जाता है. भूटान देश में इस नृत्य का बहुत ही महत्व है. इस नृत्य में भूटान की संस्कृति देखने को मिलती है. यह परंपरा वर्षों पुरानी है, जिसका निर्वहन आज भी किया जा रहा है. भारत के सिर्फ इसी बौद्ध मॉनेस्ट्री में मुखौटा नृत्य किया जाता है, जो पिछले 15 वर्षों से आयोजित की जा रही है.
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