बिहार के जूनियर डॉक्टर्स का हड़ताल दूसरे दिन भी जारी, मरीजों को हो रही परेशानी
ओपीडी और इमरजेंसी सेवा पर जूनियर डॉक्टर्स के हड़ताल का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. हड़ताल गुरुवार तो दूरे दिन भी जारी है लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से बातचीत की कोई पहल नहीं की गई है.

पटना: स्टाइपेंड में वृद्धि की मांग को लेकर पीएमसीएच समेत बिहार के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल के जूनियर डॉक्टर और इंटर्न बुधवार से बेमियादी हड़ताल पर हैं. 24 घंटे बाद भी जूनियर डॉक्टरों और सरकार के बीच वार्ता को लेकर कोई पहल नहीं हुई है. जूनियर डॉक्टरों की बुधवार को हड़ताल के बाद सरकार की तरफ से अब तक वार्ता के लिए कोई संपर्क नहीं साधा गया है. इसका बुरा असर राज्य की चिकित्सा व्यवस्था पर पड़ रहा है. ओपीडी और इमरजेंसी सेवा पर इसका प्रतिकूल असर देखने को मिल रहा है. जूनियर डॉक्टर की हड़ताल पर जाने से मरीजों का हल बेहाल है. हड़ताल पर जाने से डॉक्टर सही ढंग से इलाज नहीं कर पा रहे हैं. वहीं मरीजों को बिना इलाज के घर लौटना पड़ता है.
बता दें कि जूनियर डॉक्टर के हड़ताल पर जाने से इलाज के अभाव में एक महिला ने अंत में दम तोड़ दिया. मृत महिला के बेटे का कहना है कि उनकी अम्मी के पेट में पथरी था. कोरोना को लेकर हॉस्पिटल बंद चल रहे हैं, ऐसे में अम्मी की हालात दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गयी. टेस्ट कराया तो पता चला कि खून की कमी है. बेटे ने कहा, “हमलोगों ने निजी अस्पताल में ब्लड चढ़वाने का काम किया. लेकिन जूनियर डॉक्टर के हड़ताल के कारण सभी हॉस्पिटल बंद हैं. फिर इलाज के हमलोग उन्हें एनएमसीएच लेकर आए. लेकिन डॉक्टर ने इन्हें मृत बताया है और हम यहां से निराश घर लौट रहे हैं.”
वहीं एनएमसीएच के जूनियर डॉक्टर रामचंद्र प्रसाद का कहना है कि हमलोग का स्टाइपेंड एक साल से पेंडिंग है. इन्क्रीमेंट 1 जनवरी 2020 को ही होना था लेकिन अब तक नहीं हुआ है. इसके लिए हमलोगों ने लगातार सचिवालय का दौरा किया. पहले तो हमें आश्वासन भी मिलता था लेकिन अब वो भी नहीं मिल रहा है. इसलिए हम विवश होकर काम का बहिष्कार कर रहे हैं. हमलोग किसी को बाधित किये बिना बस अपने काम को बंद कर दिया है.
जुनियर डॉक्टर का कहना है कि हमलोग के साथ साथ इंटर्न वालों का भी स्टाइपन नहीं बढ़ा है. वो भी हमारे साथ हैं. देश के अन्य राज्यों में और यहां भी एम्स और आइजीआइएमएस में स्टाइपन बढ़े हैं. रिम्स में भी जो स्टाइपन मिल रहा है, उशकी अपेक्षा हमें बहुत कम स्टाइपन मिल रहे हैं. उन लोगों को एक लाख तक मिलता है और हमें 50 से 60 हजार ही मिलते हैं. हम चाहते हैं कि हमारा स्टाइपन भी बढ़े. अगर हमारी मांग मान ली जाती है तो हम काम पर लौटना चाहते हैं. लेकिन बिहार सरकार इसमे रूचि नहीं दिखा रही है.
इसके साथ ही जूनियर डॉक्टर ने कहा कि हड़ताल पर चले जाने से मरीजों पर फर्क पड़ रहा है क्योंकि हमलोग ही काम करते हैं. जो भी सीनियर डॉक्टर हैं उनसे कुछ नहीं होता. यहां तक कि कोरोना में भी ट्रीटमेंट का काम जूनियर डॉक्टर करते हैं. लेकिन सरकार हमे अनदेखा कर रही है.
जूनियर डॉक्टर दिव्यांशु ने कहा कि हमलोग को स्टाइपन का अंतिम निर्धारित 2017 में हुआ था. बिहार सरकार के ही संकल्प पत्र में ये कहा गया है कि इसे हर तीन साल पर रिवीजन किया जाए. उस हिसाब से 1 जनवरी 2020 को हमारा इंक्रीमेंट होना था और पिछले 12 माह से हम सचिवालय का चक्कर लगा रहे हैं. स्वास्थ्य मंत्री से लेकर स्वास्थ्य सचिव, ज्वाइंट सेक्रेटरी सबसे मिल चुके हैं. यहां के प्राचार्य के माध्यम से कई बार पत्र भी भेजा गया लेकिन उनके कानों पर जू तक नही रेंग रहा है. हमारे हड़ताल का मरीजों पर प्रभाव पड़ रहा है. अगर एक मरीज भी परेशान होता है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है. लेकिन सरकार को किसी की चिंता ही नहीं है. अगर चिंता होती तो स्ट्राइक के 24 घंटे बीत चुके हैं, कोई प्रतिनिधि हमसे बात करने जरूर आता. यहां तो ऐसे मरीज भी आते हैं जिनके पास गाड़ी भाड़े तक का पैसे नहीं होते हैं, वो किसी तरह से अस्पताल आते हैं और वो निराश लौट जा रहे हैं.
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