Xप्लेन: क्या बांकीपुर के बाद सम्राट-तेजस्वी की जगह के लिए जंग लड़ेंगे प्रशांत किशोर?
Prashant Kishor Victory: बांकीपुर की जीत ने प्रशांत किशोर को 'नॉकआउट' होने से बचाया है. वे अब बिहार की सियासत में 'खिलाड़ी' बन गए हैं. लेकिन 'किंग' बनने के लिए 2027 तक बहुत लंबा रास्ता तय करना है.

बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने 63,169 वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. उन्होंने बीजेपी के प्रत्याशी नीरज कुमार को 18,953 वोटों से हरा दिया. नीरज को 44,25 वोट मिले. प्रशांत किशोर ने इस जीत के साथ बीजेपी के अभेद्य किले को ढहा दिया, जिसे 30 साल से कोई फतह नहीं कर पाया था. इसके बावजूद नजरें प्रशांत की राजनीति पर टिकी हैं, क्योंकि बिहार पॉलिटिक्स में तीन ध्रुव हैं- सम्राट, तेजस्वी और अब प्रशांत. तो सवाल यह है कि क्या सम्राट चौधरी और तेजस्वी यादव की जगह लेने की जंग लड़ेंगे प्रशांत किशोर...
प्रशांत किशोर के पास बिहार की राजनीति में क्या है और क्या नहीं?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई प्रशांत किशोर की स्थिति की दो हकीकत बयान करते हैं:
1. प्रशांत किशोर के पास यह है...
- राजनीतिक हवा: बांकीपुर में बीजेपी के सबसे मजबूत किले को तोड़कर उन्होंने 'विपक्ष का नया चेहरा' बनने का दावा मजबूत किया है.
- राष्ट्रीय पहचान: वे भारत के सबसे बड़े चुनावी रणनीतिकार रहे हैं, जिन्होंने बीजेपी, JD(U), तृणमूल, AAP और DMK जैसी पार्टियों के साथ काम किया है.
- संगठनात्मक अनुभव: जन सुराज पार्टी ने 2025 के चुनाव में 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, जो एक बड़ा संगठनात्मक अनुभव है, भले ही वह हार के साथ खत्म हुआ.
2. प्रशांत किशोर के पास यह नहीं है...
- एक भी विधायक नहीं: बिहार विधानसभा में जन सुराज पार्टी की एक भी सीट नहीं है. बिना विधायकों के वे न तो मुख्यमंत्री बन सकते हैं और न ही विपक्ष के नेता (जिसके लिए कम से कम 10% सीटें चाहिए).
- कोई संगठनात्मक जड़ नहीं: 2025 के चुनाव में ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. यानी, पार्टी का कोई मजबूत जमीनी संगठन नहीं है.
- विपक्षी दलों का साथ नहीं: जन सुराज पार्टी को विपक्षी दलों का साथ नहीं मिला है. RJD और कांग्रेस ने उन्हें समर्थन नहीं दिया.
- सिर्फ एक सीट: बांकीपुर में जीत सिर्फ एक सीट है. बिहार में सरकार बनाने के लिए 122 सीटों की जरूरत होती है.
क्या सम्राट चौधरी की जगह ले पाएंगे प्रशांत किशोर?
सम्राट चौधरी अप्रैल 2026 में बिहार के पहले बीजेप मुख्यमंत्री बने. 2025 के विधानसभा चुनाव में NDA को प्रचंड बहुमत मिला. बीजेपी के पास विधानसभा में बहुमत है, इसलिए सरकार नहीं गिर सकती, चाहे बांकीपुर में कुछ भी हो. हालांकि, बांकीपुर की हार सम्राट चौधरी के लिए राजनीतिक रूप से खतरा है, लेकिन सरकारी रूप से नहीं.
बांकीपुर पहला उपचुनाव है जो सम्राट चौधरी के CM बनने के बाद लड़ा गया. यह सीट बीजेपी का सबसे सुरक्षित किला माना जाता था. 2025 में नितिन नवीन को यहां 62.66% वोट मिले थे. अगर बीजेपी यहां हारती है, तो यह सम्राट चौधरी की सरकार पर जनता के अविश्वास का संकेत होगा.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि एक उपचुनाव से सरकार नहीं गिरती. बीजेपी के पास अभी भी बहुमत है. लेकिन बीजेपी के भीतर सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर सवाल उठ सकते हैं. सम्राट की जगह किशोर नहीं ले सकते, इसकी 3 बड़ी वजहें हैं:
1. बीजेपी के पास बहुमत है और 2027 तक चुनाव नहीं है.
2. प्रशांत किशोर के पास एक भी विधायक नहीं है.
3. सम्राट चौधरी बीजेपी की मशीनरी के साथ खड़े हैं, जबकि प्रशांत किशोर अकेले हैं.
तो क्या फिर तेजस्वी यादव की जगह लेंगे प्रशांत किशोर?
तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं. 2025 के चुनाव में RJD 40 सीटें भी नहीं जीत पाई, यानी तीसरे स्थान पर रही. यहां पीके के हक में संभावना ज्यादा हैं, लेकिन रास्ता आसान नहीं है...
प्रशांत के पक्ष में तर्क:
- RJD कमजोर: 2025 में RJD की करारी हार के बाद तेजस्वी कमजोर स्थिति में हैं. कांग्रेस ने पहले ही RJD पर बीजेपी से सांठगांठ के आरोप लगाए हैं.
- विपक्ष का नया चेहरा: बांकीपुर की जीत ने उन्हें विपक्ष का वैकल्पिक चेहरा बना दिया है.
- 'बदलाव' का नैरेटिव: पीके ने इस चुनाव को जातिगत राजनीति के खिलाफ जनमत संग्रह बनाया, जो शहरी मतदाताओं के बीच चला.
प्रशांत के विपक्ष में तर्क:
- जन सुराज के पास कोई विधायक नहीं: विपक्ष के नेता बनने के लिए कम से कम 10% सीटें (24 सीटें) चाहिए. जन सुराज के पास 0 थीं और अब 1 है.
- RJD का जातिगत समीकरण: RJD का यादव-मुस्लिम वोट बैंक अभी भी मजबूत है. प्रशांत किशोर सवर्ण हैं, जो RJD के कोर वोटरों को आकर्षित नहीं कर सकते.
- विपक्षी दलों का साथ नहीं: सबसे बड़ी अड़चन तो यही है कि पीके को विपक्षी दलों का साथ नहीं मिला है.
प्रशांत किशोर की यह जीत क्यों खास है?
प्रशांत किशोर की यह जीत 5 वजहों से खास है...
- बीजेपी का 30 साल पुराना किला ढहा: बांकीपुर पर 1995 से बीजेपी का कब्जा है. पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और फिर उनके बेटे नितिन नवीन ने यहां से 5 बार जीत दर्ज की. 2025 में नितिन नवीन को 62.66% वोट मिले थे. प्रशांत किशोर ने इसी गढ़ को तोड़ा. उन्होंने जानबूझकर 'सुरक्षित सीट' से नहीं, बल्कि सबसे मुश्किल सीट से चुनाव लड़ा.
- 50% वोट शेयर: बिहार में 50% से ज्यादा वोट पाना बहुत मुश्किल है. 2025 में सिर्फ 8 उम्मीदवारों को 50% से ज्यादा वोट मिले. प्रशांत किशोर NDA के खिलाफ यह कर रहे हैं, जो और भी बड़ी बात है.
- 'बदलाव' का नैरेटिव चला: किशोर ने इस चुनाव को जातिगत राजनीति के खिलाफ जनमत संग्रह बनाया. उन्होंने कहा, 'बिहार को बदलना है तो जाति और धर्म से ऊपर उठकर वोट देना होगा.'
- कम मतदान का फायदा: इस उपचुनाव में 34.30% मतदान हुआ, जो 2025 (41.39%) से 7% कम है. जन सुराज का दावा है कि यह 'बदलाव के पक्ष में साइलेंट वोटिंग' थी.
- सवर्ण वोट बैंक में सेंध: बांकीपुर में सवर्ण मतदाताओं की संख्या अच्छी है, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी को वोट देते थे. किशोर ने इन वोटरों के एक हिस्से को अपनी तरफ किया.
प्रशांत किशोर ने शुरू से ही इस उपचुनाव को सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं बताया. पीके ने इसे सम्राट चौधरी की सरकार पर जनमत संग्रह करार देते हुए कहा, 'अगर बीजेपी बांकीपुर जीतती है तो मैं मान लूंगा कि बिहार की जनता उनकी नीतियों से खुश है. अगर बीजेपी हारती है तो सरकार को मानना होगा कि उसका कामकाज, उसका चरित्र और उसकी व्यवस्था जनता को मंजूर नहीं है.'
पीके ने यह भी कहा, 'सम्राट चौधरी बिना जनादेश के मुख्यमंत्री बने हैं. जनता ने नीतीश कुमार को CM चुना था.' यानी प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को सीधे सम्राट चौधरी की सरकार के खिलाफ लड़ा है.
2027 के चुनाव की तैयारी
प्रशांत किशोर ने खुद कहा, 'यह चुनाव सरकार नहीं बदलेगा, लेकिन बिहार की राजनीति की दिशा जरूर बदल सकता है.' पीके ने आश्रम में रहकर 2027 के चुनाव की तैयारी करने का फैसला किया है. यानी, उनकी नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है. जब वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में उभर सकते हैं.



















