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बिहार: बीजेपी में सुशील मोदी का अस्तित्व,पार्टी ने जब-जब साइडलाइन किया मोदी ने मेन लाइन के लिए चुनी ये राहें

बिहार में एनडीए की जीत के बाद सरकार गठन के दिन से अब तक जिस नाम की चर्चा राजनीतिक गलियारे में सबसे ज्यादा हुई है वो नाम है पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा के उम्मीदवार बने सुशील कुमार मोदी का.

पटना: बिहार में एनडीए की जीत के बाद सरकार गठन के दिन से अब तक जिस नाम की चर्चा राजनीतिक गलियारे में सबसे ज्यादा हुई है वो नाम है पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा के उम्मीदवार बने सुशील कुमार मोदी का. 15 नवंबर को जब एनडीए सरकार की दावेदारी पेश करने से पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह आने वाले थे,तो मुख्यमंत्री के साथ उपमुख्यमंत्री के नाम की रेस में सुशील मोदी पर अटकलें लगनी शुरु हो गई थीं और फिर जब नई सरकार का प्रस्ताव राज्यपाल के पेश किए जाने की बारी आई तो ठीक पहले रक्षा मंत्री के साथ सुशील मोदी का स्टेट गेस्ट हाउस रवाना होना चर्चाओं को नया आयाम दे गया और उपमुख्यमंत्री पद से मोदी की विदाई तय मानी जाने लगी. पिछले 5 साल में यह दूसरा मौका था,जब सुशील मोदी को साइडलाइन किया गया था.

पांच सालों में दो बार किए गए साइडलाइन, लालू पर वार कर मिली मेन लाइन

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को पिछले सालों में पार्टी ने दो बार साइडलाइन किया लेकिन इनकी मेहनत रंग लाई और दोनो बार राजद सुप्रीमों लालू यादव और उनके परिवार पर अटैक कर मोदी फिर से मेन लाइन में आकर खड़े हो गए.पिछली बार लालू प्रसाद के खिलाफ माहौल बनाकर दोबारा डिप्टी सीएम बने और इस बार जब यह कुर्सी छीनी गई तो फिर अपने पुराने मित्र लालू यादव के फोन षडयंत्र का खुलासा कर ऐसा रिकवर किए की पार्टी के आलाकमान ने इन्हे राज्य सभा भेजने तक का मन बना लिया.बताते चलें कि विधान सभा अध्यक्ष पद के चुनाव से पूर्व लालू यादव की ओर से एनडीए विधायकों को फोन पर मिल रहे ऑफर का भंडाफोड सोशल मिडिया पर कर पार्टी से साइड लाइन किए गए सुशील मोदी ने पार्टी के वरिष्ठों को इस बात का एहसास दिलाने में वक्त नही गवाते हुए यह प्रूव कर दिया कि बिहार बीजेपी में सुशील मोदी का कोई विकल्प नहीं है और फिर मोदी को इस खुलासे के लिए पुरस्कृत करते हुए राज्यसभा भेजने का मन बना लिया.

नीतीश प्रेम में 12 साल पहले उपमुख्यमंत्री रहते दिल्ली में अलाकमान को देनी पड़ी थी सफाई

बताते चलें कि साल 2008 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया और इस बदलाव में बीजेपी के वरिष्ठ नेता चंद्रमोहन राय को स्वास्थ्य मंत्री का पद छोड़ पीएचईडी विभाग का जिम्मा दिया गया तो इसका सारा दोष सुशील मोदी पर आया और बिहार भाजपा का एक बड़ा खेमा सुशील मोदी हटाओ अभियान में जुट गई और तब उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को दिल्ली जा कर पार्टी के अलाकमानों के आगे सफाई देनी पड़ी थी. बिहार बीजेपी में सुशील मोदी को किनारे करने की मुहिम लंबे समय से चली आ रही थी मोदी विरोधी खेमें को इस बार इस बात की तसल्ली भी होने लगी थी कि शायद इस कोशिशें कामयाब हो गईं लेकिन लालू के नए खुलासे ने मोदी को जैसे संजीवनी बूटी दे दी और एक बार फिर इनका कद पहले से बेहतर हीं रहा.

नीतीश के लक्ष्मण बनने से टारगेट पर थे मोदी

लोक सभा चुनाव में एनडीए सरकार में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाए जाने के बाद जून 2013 को बिहार में एनडीए में टूट हो गई और इसमें 17 साल पुरानी दोस्ती टूट गई और राज्य में बीजेपी को विपक्ष में जाना पड़ा. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जाने के पहले सुशील मोदी ने कई बार अपने राम यानि नीतीश कुमार को पीएम मटिरियल भी कह चुके थे, इसलिए जैसे ही नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा हुई तो नीतीश कुमार ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया और इसके साथ हीं कहीं न कहीं सुशील मोदी के खिलाफ भी बिहार बीजेपी में भी माहौल बन गया.इधर जेडीयू ने आरजेडी को साथ लेकर अपनी सरकार बना ली. इधर 2014 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत के तुरंत बाद हीं 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की जबरदस्त हार से बीजेपी पूरी तरह हिल गई. जब पार्टी ने बिहार में महागठबंधन की सरकार को हराने की आस छोडने लगी तभी ऐसे मौके पर सुशील मोदी ने अकेले दम पर 2017 में लालू परिवार के खिलाफ 44 प्रेस की. विपक्ष में रहकर लालू परिवार पर आय से अधिक संपत्ति के मामलों का खुलासा किया और कागजी प्रमाण भी मिडिया के सामने लेकर आए और मोदी के हर प्रेस कांफ्रेंस के साथ आरजेडी और जेडीयू के फासले बढ़ते गए. सरकार असहज होती गई और नीतीश कुमार गठबंधन तोड़ने को मजबूर हो गए.

नीतीश ने फिर थामा एनडीए का हाथ और सुशील मोदी को गिफ्ट में मिला डिप्टी सीएम का पद

नीतीश कुमार के गठबंधन के साथ छोड़ते हीं 2015 में विधानसभा चुनाव में महज 53 सीटें लेकर विपक्ष में बैठी बीजेपी को सुशील मोदी के खुलासे ने नई उम्मीद दिखाई देने लगी. और 26 जुलाई 2017 को बीजेपी -जेडीयू फिर से एक बार साथ सरकार की बागडोर संभालने लगें. 4 साल बाद हुए इस गठजोड़ में सुशील मोदी ने सबसे अहम भूमिका निभाई थी , बावजूद इसके पार्टी के अंदरखाने में उनका विरोध अभी खत्म नहीं हुआ था.पर इस बार नीतीश कुमार फ्रंट पर आए और उनकी मांग पर सुशील मोदी को बिहार का उप-मुख्यमंत्री बनाया गया.

नीतीश प्रेम ने राज्य छीना , लालू पर खुलासे से केंद्र की मिली राह

राम और लक्ष्मण की जोड़ी से सराहे जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी का अगाध प्रेम वर्षों से राजनीतिक गलियारे में चर्चा में रहा है. लेकिन इस बार बिहार हमेशा से सेकेंड लाइनर रही बीजेपी को मेन लाइन की तलाश में लगने लगा कि इस प्रेम को कम करना हीं एक मात्र विकल्प है तो फिर इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए सुशील कुमार मोदी को दरकिनार करने की आवाज बुलंद होने लगी. इसके लिए पार्टी आलाकमान ने बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को माध्यम बनाया कि ये विधायकों से राय मशवरा कर मोदी के नाम पर विचार करेंगे लेकिन जब राजनाथ सिंह 15 नवंबर को आए तो प्रदेश कार्यालय में बीजेपी विधायकों से मिले बिना हीं सीधे सुशील मोदी के साथ एनडीए की बैठक में ही गए.एक और खाश बात इस दौरान रही कि राजनाथ सिंह ने इस बीच सुशील मोदी को एक बार भी नहीं छोड़ा.इन बातों से आहत मोदी ने सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ी भी जाहिर की और लिखा कि कार्यकर्ता का पद तो कोई नहीं छीन सकता. मगर पद से दरकिनार किए गए सुशील मोदी इस बार भी शांत नहीं बैठे और विधानसभा अध्यक्ष चुनाव से एक दिन पहले 24 नवंबर को एनडीए विधायकों को आरजेडी सुप्रीमों के द्वारा मिल रहे ऑफर जिनमें सरकार के खिलाफ जाने का प्रलोभन दिया जा रहा था का सोशल मिडिया पर खुलासा कर मोदी एक बार फिर मेन स्ट्रीम में आ गए. मोदी ने अपने ट्वीटर अकांउट से ट्वीट कर एक कॉल के इन्फॉर्मेशन की भी पुष्टि किए जिसमें लालू यादव को कॉल-बैक करने की जानकारी दी. मोदी ये लिए यह फोन कॉल तुरुप का पत्ता साबित हुआ और लालू को गेस्ट हाउस से रिम्स का सफर तय करना पड़ा तो मोदी के लिए राज्य सभा की राह खुल गई और बीजेपी के आलाकमान ने सुशील मोदी को राज्यसभा का टिकट सौंप दिया जिसपर कल मोदी अपना नामांकन दाखिल करेंगें.

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