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IND vs AUS Pitch Controversy: ऑस्ट्रेलिया के लिए टर्निंग पिच और रणजी ट्रॉफी फाइनल में ग्रीन पिच, जानें भारत कैसे बनी दुनिया की इतनी सफल क्रिकेट टीम

IND vs AUS: रणजी ट्रॉफी के फाइनल मैच में ग्रीन पिच देकर भारत ने ऑस्ट्रेलिया को दिखाया है कि कैसे यहां के क्रिकेटर्स हरेक तरह की पिच के लिए तैयार होते हैं.

Pitch Variety in Cricket: अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की दुनिया में पिछले कुछ दिनों से क्रिकेट गेम से ज्यादा पिच की चर्चाएं हो रही हैं. इन चर्चाओं की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया ने की है, जो इस वक्त भारत के दौरे पर है. बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 4 मैचों की टेस्ट सीरीज चल रही है. इस सीरीज का पहला मैच नागपुर में हुआ था, जिसे भारत ने आसानी से जीत लिया था. नागपुर की पिच पर ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर्स, मीडिया और फैन्स ने कई सवाल उठाए हैं.

दरअसल, उनका कहना है कि भारत ने नागपुर में अपने अनुसार स्पिन फ्रेंडली पिच बनाई, जिसकी वजह से एक निष्पक्ष मैच नहीं हो पाया. हालांकि, यह बात अलग है कि जिस पिच पर ऑस्ट्रेलिया की टीम 2 घंटे से भी कम टाइम में सिर्फ 91 रनों पर ऑलआउट हो गई, उसी पिच पर भारतीय टीम ने 400 रन भी बनाए थे. नागुपर पिच के बारे में ऑस्ट्रेलियन मीडिया का कहना था कि भारत ने काफी ज्यादा टर्निंग ट्रैक बनाया है, जिसपर बाउंस भी बहुत कम है. यह एक अच्छी पिच नहीं है. ऑस्ट्रेलिया को अब भारत की रणजी पिच के जरिए करारा जवाब मिला है.

रणजी फाइनल के लिए बनी ग्रीन पिच

भारत में इस वक्त रणजी ट्रॉफी 2022-23 का फाइनल मैच चल रहा है, जिसमें बंगाल और सौराष्ट्र की टीम आमने-सामने है. रणजी ट्रॉफी का यह फाइनल मैच जिस पिच पर खेला जा रहा है, उस पर काफी घास छोड़े गए हैं, जैसे कि ऑस्ट्रेलियन पिचों पर छोड़े जाते हैं. ऐसे स्विंग और बाउंस वाली पिच पर भारत के घरेलू क्रिकेटर्स क्रिकेट इसलिए खेल रहे हैं ताकि वह ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड जैसी पिचों पर भी आसानी से खेल सके. 

भारतीय क्रिकेट ने काफी पहले इस बात को भांपा था कि भारतीय क्रिकेटर्स सेना (SENA) यानी साउथ अफ्रीका, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की पिचों पर अच्छी क्रिकेट नहीं खेल पा रहे हैं. इस वजह से भारतीय क्रिकेट टीम ने भारत में ही सेना देशों जैसी पिचों को तैयार करना शुरू कर दिया. इन्हीं पिचों पर प्रैक्टिस करके भारत के युवा क्रिकेटर्स अब इन सभी देशों में जाकर उनकी कंडीशन्स और उनके गेंदबाजों के सामने अच्छा प्रदर्शन करके आते हैं.

भारत ने कभी नहीं की पिच की चर्चा

विराट कोहली की टेस्ट टीम में ऐसा बदलाव दिखना शुरू हो गया था. यही कारण है कि इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया को उन्हीं की घरेलू पिचों और कंडीशन्स पर एक बार नहीं बल्कि लगाताक दो बार सीरीज हराई है. बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी 2020-21 का पहला मैच एडिलेड में खेला गया था, जिसकी दूसरी पारी में भारत की टीम सिर्फ 36 रन ही बना पाई थी, जो भारत के टेस्ट हिस्ट्री का सबसे कम स्कोर है, लेकिन तब तो किसी भारतीय खिलाड़ी और मीडिया ने ऐसा नहीं बोला था कि ऑस्ट्रेलिया ने निष्पक्ष पिच नहीं बनाई.

भारत ने मेलबर्न में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में दमदार वापसी की और मेज़बानों को एक-दो नहीं बल्कि 8 विकेट से हराया. उसके बाद ऑस्ट्रेलियन टीम न तो सिडनी में जीत पाई और ना ही ब्रिसबेन में. ब्रिसबेन में तो ऑस्ट्रेलिया पिछले 32 सालों में एक भी टेस्ट मैच नहीं हारी थी, उनके पास जॉस हेजलवुड, पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क, कैमरन ग्रीन और नैथन ल्यौन जैसे बेहतरीन गेंदबाज थे, और भारत के कई मुख्य खिलाड़ी चोटिल हो चुके थे, भारत का गेंदबाजी क्रम बिल्कुल अनुभवहीन था, लेकिन फिर भी भारत ने गाबा में ऑस्ट्रेलिया का घमंड थोड़ा और न सिर्फ वो मैच जीता बल्कि सीरीज भी अपने नाम की.

अलग-अलग पिचों पर खेलना ही है भारत की सफलता का मंत्र

भारत ने ऑस्ट्रेलिया जाकर लगातर दो बार बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी तुक्के से नहीं जीती है. इसका कारण भारतीय घरेलू किकेट में क्रिकेटर्स को मिलने वाली अलग-अलग वैराइटी वाली पिच है. भारत के घरेलू क्रिकेटर्स स्पिन ट्रैक के साथ-साथ स्विंग और बाउंसी पिच पर भी अभ्यास करते हैं. यही कारण है कि शुभमन गिल, पृथ्वी शॉ और ईशान किशन जैसे बल्लेबाज विदेशों में जाकर भी आसानी से क्रिकेट खेलते हैं. 

इसका एक नमूना ऑस्ट्रेलियन टीम को रणजी ट्रॉफी के फाइनल मैच में देखने को मिल रहा है. इस मैच में भी खिलाड़ियों को घास वाली पिच दी गई है, बंगाल की टीम सिर्फ 2 रनों पर 3 और 50 रनों पर अपने 6 विकेट गंवा चुकी थी. सौराष्ट्र के तेज गेंदबाज जयदेव उनादकट और चेतन साकरिया ने अपनी स्विंग गेंदबाजी से बंगाल की टीम को तहस-नहस कर दिया. हालांकि, फिर शहबाज अहमद और विकेटकीपर अभिषेक पोरेल के अर्धशतकों की मदद से बंगाल की टीम 174 रन तक पहुंच पाई.  इससे ऑस्ट्रेलिया को यह समझना चाहिए कि भारत में सिर्फ तरह की नहीं, कई तरह की पिच बनाई जाती और यही चीज इतने सालों से भारत की सफलता का मूलमंत्र है.

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