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Afghanistan News: मुल्ला बरादर को मिलेगी अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार की कमान- रॉयटर्स

तालिबानी सूत्रों के मुताबिक तालिबान के संस्थापक सदस्य मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को तालिबान सरकार की कमान मिल सकती है. सूत्रों के मुताबिक शेर मोहम्मद अब्बास और मुल्ला याकूब को भी अहम ज़िम्मेदारी मिलेगी.

Afghanistan News: अमेरिका के अफगानिस्तान से पूरी तरह वापस लौटने के बाद अब नई तालिबानी सरकार के गठन की तैयारियां शुरू हो गई हैं. तालिबानी सूत्रों के मुताबिक तालिबान के संस्थापक सदस्य मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को तालिबान सरकार की कमान मिल सकती है. सूत्रों के मुताबिक शेर मोहम्मद अब्बास और मुल्ला याकूब को भी अहम ज़िम्मेदारी मिलेगी और सरकार का गठन दो से तीन दिनों के अंदर कर दिया जाएगा.

मुल्ला मोहम्मद याकूब बन सकते हैं मंत्री

सूत्रों ने बताया कि तालिबान के दिवंगत संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला मोहम्मद याकूब और शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई सरकार में बड़ा पद संभालेंगे. सूत्रों ने ये भी बताया कि तालिबान अफगानिस्तान के मौजूदा संविधान को रद्द कर 1964-65 के पुराने संविधान को हीं फिर से लागू कर सकता है क्योंकि तालिबान का मानना है कि नया संविधान विदेशी मुल्कों के आधीन बनाया गया था.

4 दिनों से कांधार में बैठक जारी

सरकार गठन को लेकर पिछले 4 दिनों से तालिबानी नेता कांधार में आपसी चर्चा कर रहे हैं. हालांकि सूत्रों ने बताया है कि तालिबान का हार्डलाइनर गुट सत्ता में किसी और को शामिल नहीं करना चाहता. लेकिन दोहा आफिस के तालिबानी नेता दूसरे पक्षों को भी शामिल करना चाहते हैं.

सूत्रों के मुताबिक तालिबानी सरकार में गैर तालिबानी पक्षों को सुप्रीम काउंसिल और मंत्रालयों दोनों में हीं जगह दी जा सकती है. हालांकि देखना ये दिलचस्प होगा कि नार्दन एलायंस और तालिबान के बीच बातचीत में कोई समझौता हो पाता है या नहीं, क्योंकि नार्दन एलायंस सरकार में बराबर की हिस्सेदारी चाहता है और तालिबान इसके लिए फिलहाल राज़ी है.

मुल्ला बरादर को जानिए

बीते दिनों सत्ता परिवर्तन की आहट के बीच बीजिंग जाकर चीन के नेताओं से मुलाकात करने वाला भी बरादर ही था. साल 1978 में जब सोवियत के खिलाफ तालिबानियों ने गोरिल्ला वार छेड़ा था, तब बरादर उसमें सक्रिय था. सोवियत सेना की वापसी के बाद बरादर का कद बढ़ता गया. उसने मुल्ला उमर के साथ मिलकर कई मदरसे बनाए जहां तालिबान लड़ाके तैयार किए.

साल 1996 में अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनी, तब भी बरादर की अहम भूमिका थी. साल 2001 में अमेरिकी हमले के बाद बरादर को भागना पड़ा. 2010 में बरादर की कराची से गिरफ्तारी हुई. लेकिन शांति वार्ता के लिए 2018 में बरादर को रिहा करना पड़ा. इसके अलावा तालिबान को आर्थिक रूप से मजबूत करने के पीछे भी बरादर की बड़ी भूमिका मानी जाती है.

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