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Explained: सड़कों, चौराहों, शहरों और अब यूनिवर्सिटी का नेम चेंज! बीजेपी को आखिर नाम बदलने से हासिल क्या होता है?

Barkatullah University: नाम बदलने की राजनीति को समझने के लिए इसे सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और सत्ता के बीच चलने वाले एक जटिल संघर्ष के रूप में देखना जरूरी है.

पिछले कुछ सालों में भारत में नाम बदलने का सिलसिला तेज हुआ है. सड़कों और चौराहों से शुरू होकर अब यह रेलवे स्टेशनों, शहरों, कानूनों और हाल ही में विश्वविद्यालयों तक जा पहुंचा है. यह सिर्फ बीजेपी शासित राज्यों तक सीमित नहीं रहा है. हैदराबाद को भाग्यनगर बनाने की मांग हो या इलाहाबाद का प्रयागराज बनना, मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलना हो या राजस्थान के कई गांवों के नाम बदलना, हर मामला चर्चा और विवाद दोनों लाता है. आइए एक्सप्लेनर में समझते हैं कि नाम बदलने के पीछे की सोच क्या है, इससे क्या हासिल होता है और इस प्रक्रिया के व्यावहारिक और राजनीतिक मायने क्या हैं...

नाम बदलने की प्रक्रिया कैसे और क्यों शुरू हुई?

नाम बदलना कोई नई बात नहीं है. बंबई का मुंबई, मद्रास का चेन्नई, कलकत्ता का कोलकाता बनना इसके पुराने उदाहरण हैं. लेकिन पिछले एक दशक में इस प्रक्रिया ने जो रफ्तार पकड़ी है, वह बहुत तेज है. बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 के बाद से नाम बदलने के मामलों में तेज बढ़ोतरी हुई है. बीजेपी का तर्क है कि ये सब 'गुलामी की मानसिकता' से मुक्ति के लिए जरूरी कदम हैं. पार्टी का मानना है कि मुगल और ब्रिटिश शासकों ने जानबूझकर भारतीय स्थानों, सड़कों और संस्थानों के नाम बदलकर अपने वर्चस्व के प्रतीक स्थापित किए थे. आजादी के बाद भी सत्ता में रही पार्टियों ने इन्हें नहीं बदला। अब इन नामों को बदलकर भारत अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित कर रहा है.

इसके विपरीत, आलोचक इसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति मानते हैं. द वायर की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह एक वैचारिक परियोजना है जो इतिहास का दिलचस्प किस्सा बताती है. इसके तहत भारत के जटिल अतीत को सिर्फ 'हिंदू बनाम विदेशी आक्रांता' की आसान कहानी में बदला जाता है, जिससे एक खास राजनीतिक आधार को मजबूत किया जा सके.

क्या नाम बदलने से कोई ठोस असर होता है?

यह सवाल कई स्तरों पर समझा जाना चाहिए. राजनीतिक स्तर पर इसका असर दिखता है, बीजेपी के समर्थकों के लिए यह गर्व और संस्कृति को दोबारा जिंदा करने का प्रतीक है. फर्स्ट इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि चुनावों के समय इस तरह के मुद्दे जोर पकड़ते हैं, क्योंकि ये पार्टी के कोर वोट बैंक को सीधे जोड़ने का काम करते हैं. नाम बदलने की घोषणाएं रैलियों में भीड़ को जोश दिलाने और यह संदेश देने के लिए की जाती हैं कि सरकार अपने मूल वैचारिक एजेंडे पर काम कर रही है.

प्रशासनिक और आर्थिक स्तर पर यह एक खर्चीली प्रक्रिया है. नाम बदलने के बाद सरकारी दस्तावेजों, साइनबोर्ड, नक्शों, वेबसाइटों और स्टेशनरी को बदलना पड़ता है. इस पर सार्वजनिक धन खर्च होता है. आम नागरिकों को भी अपने आधार कार्ड, वोटर आईडी, पासपोर्ट और प्रॉपर्टी के कागजात में पता बदलवाना पड़ता है, जिसमें समय और पैसा दोनों लगता है.

दूसरी ओर, इसका एक सांस्कृतिक आयाम भी है. जब कोई शहर या संस्था जिस नाम से सदियों से जानी जाती थी, उसे अचानक बदल दिया जाता है तो उससे जुड़ी सामूहिक स्मृति और पहचान प्रभावित होती है. कुछ लोगों के लिए यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण है तो कुछ के लिए अपनी पहचान से अलगाव का एहसास.

बीजेपी के तर्क और रणनीति क्या है?

बीजेपी नाम बदलने को अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा का हिस्सा मानती है. पार्टी का तर्क है कि जब पूर्व की सरकारों ने सैकड़ों नाम बदले तब कोई सवाल नहीं उठा, लेकिन जब वह ऐसा करती है तो विवाद खड़ा किया जाता है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी नेता मानते हैं कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है. जब सड़कों और संस्थानों के नाम भारतीय परंपरा और राष्ट्रवादी नेताओं पर रखे जाते हैं, तो इससे एक नई चेतना पैदा होती है.

पार्टी यह भी मानती है कि नाम बदलना स्थानीय जनता की भावनाओं का सम्मान है. हैदराबाद को भाग्यनगर कहने की मांग इसलिए उठती है क्योंकि कई स्थानीय लोग इसे अपना प्राचीन नाम मानते हैं. निजामाबाद को इंदूर बनाने के पीछे भी यही तर्क दिया जाता है कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से इसी नाम से जाना जाता था.

आलोचकों की चिंताएं: बीजेपी का राजनीतिक अभियान

आलोचक कहते हैं कि यह एक जानबूझकर चलाया जा रहा राजनीतिक अभियान है. द वायर की रिपोर्ट इसे 'रीब्रांडिंग' की कोशिश बताती है, जिसमें सत्ता का इस्तेमाल करके इतिहास की रोशनी को एक खास दिशा दी जा रही है. विपक्ष का कहना है कि यह देश के बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक अतीत को नकारने जैसा है. वे सवाल उठाते हैं कि क्या नाम बदलने से वास्तव में गुलामी की मानसिकता खत्म होती है, या यह सिर्फ सतही बदलाव है जबकि असली सामाजिक और आर्थिक समस्याएं वैसी की वैसी रहती हैं.

विपक्षी दल भी आरोप लगाते रहे हैं कि यह सरकार का ध्यान भटकाने का तरीका है. जब रोजगार, महंगाई या विकास जैसे मुद्दे उठते हैं, तो सरकार नाम बदलने जैसे सांस्कृतिक मुद्दों को आगे कर देती है. इससे मीडिया और जनता का ध्यान असली मुद्दों से हट जाता है.

व्यावहारिक असर: सिर्फ भावना नहीं, लागत भी है

नाम बदलने का असर सिर्फ राजनीतिक और सांस्कृतिक नहीं होता, बल्कि इसकी एक ठोस आर्थिक लागत भी है. सरकारी विभागों को नए साइनबोर्ड लगाने, रिकॉर्ड अपडेट करने और नई स्टेशनरी छपवाने पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं. यह खर्च आम जनता के करों से जाता है. आम नागरिकों को भी अपने दस्तावेज अपडेट कराने के लिए अलग से समय और पैसा खर्च करना पड़ता है. डिजिटल मैप्स, कूरियर सेवाओं और ई-कॉमर्स कंपनियों को भी अपना डेटाबेस अपडेट करना पड़ता है, जिसकी लागत आखिरकार उपभोक्ताओं पर ही डाली जाती है.

हालांकि, बीजेपी के समर्थकों का तर्क है कि यह एक बार का खर्च है, जबकि सांस्कृतिक गौरव की प्राप्ति पीढ़ियों तक रहेगी. उनका कहना है कि अगर यह खर्च राष्ट्रीय गौरव के लिए है तो इसे बोझ नहीं माना जाना चाहिए.

नाम बदलने की राजनीति का कल क्या होगा?

जिस रफ्तार से नाम बदले जा रहे हैं, उससे साफ है कि यह सिलसिला थमने वाला नहीं है. अभी तक सड़कों, शहरों और रेलवे स्टेशनों के नाम बदले गए थे, लेकिन अब विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों तक भी यह प्रक्रिया पहुंच गई है. हाल ही में भोपाल की बरकतुल्ला यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर मां वाग्देवी भोजपाल यूनिवर्सिटी कर दिया गया है. बीजेपी के लिए यह सिर्फ एक चुनावी मुद्दा ही नहीं, बल्कि उसके मूल वैचारिक एजेंडे का हिस्सा है. इसके साथ ही, विपक्ष और लोगों के एक बड़े हिस्से की असहमति भी जारी रहेगी, जो इसे इतिहास के साथ खिलवाड़ और सार्वजनिक धन की बर्बादी मानते हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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