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नीतीश कुमार और ममता बनर्जी में खिचड़ी तो नहीं पक रही है?

हाल ही में नीतीश कुमार के करीबी प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार के तौर पर ममता बनर्जी से जुड़े हैं. जिसके बाद से कई तरह की अटकलें लगाई जा रही है.

नई दिल्ली: ममता बनर्जी और नीतीश कुमार के बीच कहीं कोई खिचड़ी तो नहीं पक रही है ? सवाल थोड़ा अटपटा ज़रूर है. लेकिन पटना से लेकर दिल्ली तक इस बात की बड़ी चर्चा है. वैसे भी बिना आग के धुंआ तो नहीं उठता है. जेडीयू के प्रवक्ता डॉक्टर अजय आलोक के इस्तीफ़े से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं. उन्होंने बीती रात इस्तीफ़ा दे दिया. वैसे जेडीयू में वे अभी बने रहेंगे. वैसे तो पार्टी में कई प्रवक्ता हैं, लेकिन टीवी न्यूज़ चैनलों के वे पॉपुलर चेहरे थे.

अंदर की ख़बर ये है कि अजय आलोक को प्रवक्ता पद से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा गया. ये फ़ैसला किसी और का नहीं, नीतीश कुमार का था. नीतीश को ममता बनर्जी पर अजय आलोक की टिप्पणी पसंद नहीं आई. अजय ने ममता सरकार पर बंगाल को मिनी पाकिस्तान बनाने का आरोप लगाया था. केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उन्होंने इस मामले में कार्रवाई करने को कहा था. अजय ने बताया कि बंगाल के कुछ जिलों से जान बचा कर बिहार लौटे परिवार से मिलने के बाद उन्होंने ये बात कही थी. पिछले कुछ दिनों में कई परिवारों को घर लौटना पड़ा है. टीएमसी के कार्यकर्ता उनसे ज़ोर ज़बरदस्ती करते हैं.

जेडीयू का प्रवक्ता होने के कारण अजय आलोक का ये बयान पटना के अख़बारों में प्रमुखता से छपा. जिसके बाद नीतीश कुमार ने पार्टी के महासचिव केसी त्यागी और प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह को फ़ोन किया. नीतीश ने दोनों को अजय से बात कर इस्तीफ़ा लेने को कहा. पार्टी के कुछ बड़े नेताओं को जब नीतीश के इस फ़ैसले के बारे में पता चला तो अजय को बयान वापस लेने की सलाह दी. कुछ ने खंडन जारी करने को कहा. लेकिन अजय नहीं माने. उन्होंने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को प्रवक्ता पद से इस्तीफ़े की चिट्ठी सौंप दी. अभी वे जेडीयू के प्रदेश महासचिव भी हैं.

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अजय आलोक के इस्तीफ़े का कनेक्शन प्रशांत किशोर से भी है. हाल में ही पीके और ममता बनर्जी की कोलकाता में मुलाक़ात हुई थी. जेडीयू के एक बड़े नेता बताते हैं कि इस मुलाक़ात से पहले ममता और नीतीश कुमार की फ़ोन पर बातचीत हुई थी. प्रशांत किशोर की संस्था I-PAC विधानसभा चुनाव में ममता के लिए काम करेगी. पीके के इस फ़ैसले के बाद जेडीयू में भी अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया. पीके के भविष्य को लेकर तरह तरह की बातें होने लगीं. प्रशांत किशोर जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. लेकिन न तो पीके की तरफ़ से कोई जवाब आया न ही नीतीश की तरफ़ से.

बीते रविवार को पटना में हुई जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तस्वीर साफ हो गई. पार्टी में प्रशांत किशोर का द एंड बताने वालों को नीतीश ने करारा जवाब दे दिया. मंच पर नीतीश ने पीके को ठीक बग़ल में बिठाया. पत्रकारों ने जब पीके के डबल रोल पर सवाल किया तो नीतीश ने उनका बचाव किया. वे बोले “ व्यक्ति और उसकी कंपनी को एक दूसरे से जोड़ कर देखना ग़लत है. वह ( पीके) जब पार्टी में रहते हैं तो पार्टी के लिए काम करते हैं. बाक़ी वह अपना काम करने के लिए स्वतंत्र हैं”

सच तो यही है कि प्रशांत किशोर के ज़रिए नीतीश कुमार अपना माहौल बनाए रखते हैं. इसी बहाने वे बीजेपी पर मनोवैज्ञानिक दवाब भी बनाते हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर और उद्धव ठाकरे की मुलाक़ात इसी रणनीति की एक कड़ी थी. पूरे चुनाव के दौरान पीके बिहार से ग़ायब रहे. प्रशस्त किशोर और उनकी कंपनी जगन मोहन रेड्डी के लिए काम करती रही. आँध्र प्रदेश में अब रेड्डी की सरकार है.

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मोदी के मंत्रिमंडल में इस बार जेडीयू का कोई नेता शामिल नहीं हुआ. पार्टी के लोकसभा में 16 सांसद हैं. लेकिन बीजेपी ने कैबिनेट मंत्री की एक ही सीट ऑफ़र की, नीतीश नहीं माने. आर पी सिंह को मंत्री पद की शपथ लेनी थी लेकिन वे पटना लौट गए. नीतीश नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल तो हुए लेकिन उसी दिन उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के विस्तार का फ़ैसला कर लिया. बीजेपी को एक मंत्री का प्रस्ताव देकर अपना बदला पूरा कर लिया. नीतीश चाहते थे कि मोदी सरकार में जेडीयू के कम से कम तीन लोगों को मंत्री बनाया जाए. वैसे खुले मन से उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा.

सच तो ये है कि नीतीश कुमार कब क्या फ़ैसला कर लें, किसी को नहीं पता. उनकी राजनीति को बड़े बड़े नेता नहीं समझ पाए. लेकिन इन दिनों वे बीजेपी से अलग अपनी पार्टी को मज़बूत करने में जुटे हैं. जेडीयू पहले ही फ़ैसला कर चुकी है कि चार राज्यों में विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी. ज़रूरत पड़ने पर जेडीयू बिहार में चुनाव अकेले ही लड़ने की तैयारी में है. नीतीश कुमार अपनी पार्टी की कोर कमेटी में ऐसा इशारा भी कर चुके हैं. बिहार में बीजेपी के पास नीतीश के टक्कर का कोई सीएम चेहरा नहीं है.

नीतीश कुमार को लगता है कि बीजेपी के साथ होने के बाद भी मुसलमान उनसे दूर नहीं गए है. इसीलिए पटना में उन्होंने रोज़ा इफ़्तार पार्टी रखी. अजय आलोक का बयान नीतीश को मुस्लिम विरोधी लगा, इसीलिए उन्होंने प्रवक्ता पद से उनकी छुट्टी कर दी. आख़िर में सबसे बड़ी बात- बिहार में नीतीश को लेकर कहावत है कि उनकी आंत में दांत है. मतलब उनके मन की बात कोई नहीं जानता है. नीतीश कब किसके साथ हो जायें और कब किसका हाथ झटक दें, ब्रह्मा भी नहीं जानते.

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