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ग्राउंड रिपोर्ट: यूपी के सियासी दंगल में घर में घिरा डॉन!

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर असर रखने वाला डॉन मुख्तार अंसारी का परिवार अपने घर में ही घिर गया है. यूपी के सियासी अखाड़े में बाहुबली मुख्तार अंसारी को जीताने के लिए मायावती वोट मांग चुकी हैं तो वहीं इस चुनावी दंगल में मुख्तार अंसारी को पटखनी देने के लिए पीएम मोदी ने कटप्पा को लगा दिया है. ये लड़ाई तो कैमरे पर दिख रही है लेकिन पर्दे के पीछे भी राजनीति है. जिसमें दुश्मन का दुश्मन दोस्त नजर आ रहा है.

अंसारी परिवार का कड़ा इम्तिहान आपको बता दें कि इन दिनों डॉन मुख्तार अंसारी जेल में हैं इसलिए उनके बिना ही परिवार के लोग मऊ की गलियों में वोट मांगते नजर आ रहे है. मऊ के साथ ही पूर्वांचल के चार जिलों की अट्ठाइस सीटों पर अंसारी ब्रदर्स का दबदबा है. इनमें आजमगढ़ की दस, मऊ की चार और बलिया और गाजीपुर की सात-सात सीटें हैं. मुख्तार जेल के अंदर हैं तो बाहर प्रचार की कमान भाई अफजाल अंसारी ने संभाल रखी हैं. अफजाल खुद मैदान में नहीं हैं लेकिन परिवार के तीन लोग इस बार हाथी पर सवार होकर ताल ठोंक रहे हैं.

मुख्तार के खिलाफ बीजेपी ने दिया था अशोक सिंह को टिकट

मुख्तार के खिलाफ बीजेपी ने अशोक सिंह को टिकट दिया था लेकिन अब वो चुनाव मैदान में इसलिए नहीं हैं क्यों कि उनका पर्चा खारिज हो चुका है. लेकिन ऐसा क्यों हुआ वो बताने को तैयार नहीं हैं.  अब मुख्तार के खिलाफ बीजेपी की सहयोगी भारतीय समाज पार्टी के महेंद्र राजभर चुनाव लड़ रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महेंद्र राजभर के लिए रैली कर चुके हैं लेकिन इलाके में लोग राजभर को डमी उम्मीदवार मानते है. इसपर भारतीय समाज पार्टी के उम्मीदवार महेंद्र राजभर का कहना है कि 4 मार्च को जनता बता देगी कि डमी कैंडिडेट हैं कि नहीं. पूरी जनता हमारे साथ है.

''मिले हुए हैं बीजेपी और समाजवादी पार्टी'' पिछले दिनों वोटों की भीख मांगते दिखे अल्ताफ असारी को समाजवादी पार्टी ने फिर मौका दिया है. अल्ताफ पिछली बार 6 हजार वोटों से हारे थे. मऊ में चर्चा है कि बीजेपी के कमल के मैदान में ना होने से मुस्लिम के साथ-साथ अल्ताफ को बाकी बिरादरी के भी वोट मिल जाएंगे. अब इस घेरेबंदी पर मुख्तार की पार्टी कह रही है कि बीजेपी और समाजवादी पार्टी मिले हुए हैं. पूर्वांचल के इस इलाके में पिछले पच्चीस सालों से अंसारी बनाम बाकी की लड़ाई होती रही है. दल बदले, अपना दल बनाया, निर्दलीय भी लड़ा लेकिन जीत मुख्तार की ही होती रही. इसीलिए मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल का मुलायम सिंह और शिवपाल यादव ने समाजवादी पार्टी में विलय करा दिया था. फिर विलय रद्द हो गया. जिसके बाद मजबूरी में अंसारी बंधुओं को हाथी की सवारी करनी पड़ी.

कृष्णानंद राय की हत्या के आरोप में जेल में है मुख्तार मऊ में मुख्तार की सीट पर बीजेपी नहीं है तो उसके बड़े भाई सिबगतुल्लाह की सीट मोहम्मदाबाद में समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार नहीं है. यहां समाजवादी पार्टी के हैदर अली का पर्चा खारिज हो गया था. बातें हो रही हैं कि सिबगतुल्लाह को हराने के लिए ऐसा जानबूझ कर किया गया ताकि बीजेपी जीत जाए. मुख्तार के भाई के खिलाफ बीजेपी की अलका राय चुनाव लड़ रही हैं.

आपको बता दें कि अलका राय के पति और विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के आरोप में मुख्तार जेल में है. जेल में रहते हुए मुख्तार दो बार चुनाव जीत चुका है. मऊ जिले की ही घोसी सीट जिससे चुनाव लड़कर पिछली बार मुख्तार अंसारी बुरी तरह से हारे थे. उस सीट से इस बार मुख्तार का बेटा अब्बास अंसारी मैदान में है.

''...दुश्मन का दुश्मन तो दोस्त ही होता है'' दौर-ए-इलेक्शन कहां कोई इंसान नजर आता है. कोई हिंदू, मसुलमान, दलित नजर आता है. विकास की बातें बेमानी हो गई है. वोट डलवाने की तैयारी हो चुकी है. बड़ी तस्वीर ये है कि परिवार तीन सीटों से चुनाव लड़ रहा है. दो सीटों पर विरोधियों का पर्चा ही रद्द हो गया जिसे राजनीति में महज संयोग नहीं मानना चाहिए. अखिलेश यादव और अंसारी बंधुओं के छत्तीस का रिश्ता तो जग जाहिर है. इन्हें हराने के लिए टीपू किसी हद तक जा सकते है. बीजेपी भी अभी नहीं तो फिर कभी नहीं के मूड में है. अंसारी ब्रदर्स के रहते दोनों पार्टियों का इस इलाके में भला नहीं हो सकता है. तो फिर दुश्मन का दुश्मन तो दोस्त ही होता है.

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