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Explained: बंगाल में 92% तो तमिलनाडु में 85% मतदान! बंपर वोटिंग के मायने क्या, चुनावी नतीजों पर कितना पड़ेगा असर?

Election 2026: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुई बंपर वोटिंग ने चुनावी इतिहास के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए. बल्कि सभी 5 राज्यों में वोटिंग के नए फसाने लिखे गए, लेकिन रिकॉर्ड तोड़ मतदान के मायने क्या हैं?

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में गुरुवार (23 अप्रैल) को बंपर वोटिंग हुई. बंगाल की 294 सीटों में से 152 सीटों पर पहले फेज में 92.56% मतदान हुआ. वहीं, तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर 85.13% वोटिंग हुई. दोनों राज्यों में आजादी के बाद अब तक सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है. इससे पहले तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मतदान 2011 में 78.29% था, जबकि बंगाल में 2011 में 84.72% मतदान दर्ज किया गया था. इससे पहले असम, केरलम और पुडुचेरी में भी 9 अप्रैल को रिकॉर्ड वोटिंग हुई थी. असम के इतिहास में सबसे ज्यादा 85.91%, पुडुचेरी में 90% और केरलम में 1987 के बाद सबसे ज्यादा 78.27% वोटिंग हुई थी. पाचों राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को एकसाथ आएंगे, लेकिन इससे पहले एक्सप्लेनर में समझते हैं कि रिकॉर्ड वोटिंग के मायने क्या हैं...

सवाल 1: किस राज्य में कौन से चरण का मतदान हुआ और कितने प्रतिशत वोटिंग हुई?
जवाब: 9 से 23 अप्रैल 2026 तक 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव मे मतदान का पूरा गणित यह रहा:

राज्य मतदान का चरण मतदान प्रतिशत
पश्चिम बंगाल पहला चरण (152 सीटों पर) 92.56%
तमिलनाडु एकमात्र चरण 85.13%
केरलम एकमात्र चरण 78.27%
असम एकमात्र चरण 85.91%
पुडुचेरी एकमात्र चरण 90%

पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में मतदान प्रतिशत 90% के पार चला गया, जिसे मुख्य चुनाव आयुक्त ने आजादी के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया. तमिलनाडु में पिछली बार (2021) के 73.63% मतदान की तुलना में इस बार जबरदस्त उछाल देखने को मिला.

सवाल 2: मतदान का इतना अधिक प्रतिशत होने के क्या मायने हैं?
जवाब: यह एक आम धारणा है कि अधिक मतदान मतलब सरकार के खिलाफ गुस्सा, लेकिन पिछले सात दशकों के चुनावी आंकड़ों को गहराई से जांचने पर यह पारंपरिक सोच पूरी तरह खारिज हो जाती है. डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने 1957 से 2021 के बीच हुए 56 विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे.

जब मतदान प्रतिशत बढ़ा तब सत्ताधारी दल 52% बार बच निकले. जब मतदान प्रतिशत गिरा तब सत्ताधारी दल केवल 44% बार ही दोबारा जीत पाए. यह आंकड़ा बताता है कि सिर्फ मतदान प्रतिशत के आधार पर सत्ता-विरोधी लहर का अनुमान लगाना सही नहीं है.

इस पैटर्न को समझिए:

  • पश्चिम बंगाल (2011): मतदान में मामूली बढ़ोतरी (2.6%) हुई और वाम मोर्चे का 34 साल पुराना शासन खत्म हो गया. यह 'पारंपरिक ज्ञान' के पक्ष में गया.
  • पश्चिम बंगाल (2021): मतदान प्रतिशत में गिरावट आई, लेकिन ममता बनर्जी की TMC रिकॉर्ड बहुमत के साथ दोबारा जीत गई. इसने पारंपरिक सोच को गलत साबित कर दिया.
  • तमिलनाडु: यहां तो हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन का अपना ही पैटर्न है. 2006 में 11.7% अधिक मतदान के बावजूद AIADMK सत्ता से बाहर हो गई, तो 2021 में मतदान गिरने पर भी उसे हार का सामना करना पड़ा.

इससे साफ है कि यहां मतदान प्रतिशत नहीं, बल्कि सत्ता-विरोधी और नेतृत्व की भूमिका ज्यादा मायने रखती है.

सवाल 3: तो फिर हाई टर्नआउट के असली मायने क्या हैं?
जवाब: इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं कि हाई टर्नआउट 'भागीदारी का पैमाना' है, राजनीतिक बदलाव की भविष्यवाणी करने का 'भरोसेमंद पैमाना' नहीं है. कभी-कभी हाई टर्नआउट भरोसे का प्रतीक होता है, जहां मतदाता अपने पसंदीदा नेता को और मजबूत करने के लिए वोट देने निकलते हैं. इसके पीछे 3 बड़ी वजहें हैं:

  1. मजबूत लामबंदी: केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पार्टी कार्यकर्ताओं की जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ और मतदाताओं को बूथ तक लाने की क्षमता.
  2. नए और महिला मतदाताओं की भूमिका: तमिलनाडु में इस बार 14.59 लाख से ज्यादा पहली बार वोट देने वाले मतदाता हैं. महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से लगभग 10 लाख ज्यादा है यानी 2.93 करोड़. इन वोटर्स का उत्साह आंकड़ों को प्रभावित करता है.
  3. तमिलनाडु का '80 प्रतिशत पैराडॉक्स': यह एक बेहद अहम पहलू है. इस बार चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत तमिलनाडु में 95 लाख फर्जी, डुप्लीकेट या मृत मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए. इससे कुल मतदाताओं की संख्या 2021 के 6.29 करोड़ से घटकर 5.73 करोड़ रह गई . नतीजतन, कम मतदाताओं की वजह से प्रतिशत अपने आप ऊंचा हो जाता है. उदाहरण के लिए, इस बार का 75% मतदान भी 2021 के 73.63% की तुलना में 33 लाख कम लोगों के वोट डालने के बराबर होगा.

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, 'पश्चिम बंगाल में इतनी ज्यादा वोटिंग होना, बीजेपी के लिए चुनौती साबित हो सकती है. बंगाल में पहले फेज में जिस इलाके में वोटिंग हुई है, वो बीजेपी का गढ़ है. वहीं अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर बीजेपी को सबक सिखाने के लिए ज्यादा वोटर्स निकले, खासकर महिलाएं. सिर्फ पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु की बात न करते हुए सभी 5 राज्यों में देखें तो SIR हो या हजारों-करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट्स की सौगातें, कहीं न कहीं बीजेपी के हक में झंडे जरूर गाड़ेंगी.'

सवाल 4: हाई टर्नआउट से चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: अमिताभ तिवारी का कहना है, 'यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वोटर टर्नआउट बढ़ने से किसे फायदा मिलेगा. पश्चिम बंगाल के पिछले चुनावों के एनालिसिस से भी कोई साफ पैटर्न समझ नहीं आता है. आजादी के बाद 17 चुनावों में 9 बार वोटिंग 4.5% से ज्यादा घटी या बढ़ी है. इसमें सिर्फ 3 बार सत्ता परिवर्तन हुआ, बाकी 6 बार मौजूदा सरकार ही बरकरार रही.'

2020 तक देश में करीब 332 विधानसभा चुनाव हुए हैं. इनमें से 188 चुनावों में मतदान-प्रतिशत बढ़ा, जिनमें 89 सरकारें दोबारा चुनी गईं. वहीं 144 बार मतदान-प्रतिशत घटा है, जिनमें 56 सरकारें दोबारा चुनी गईं. साफ तौर पर मतदान-प्रतिशत और चुनावी नतीजों के बीच कोई मजबूत संबंध नहीं है.

मतदान प्रतिशत चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी का भरोसेमंद जरिया नहीं है, इसलिए असली फैसला 4 मई को EVM से निकलने वाले आंकड़ों पर टिका है. उस दिन यह स्पष्ट होगा कि रिकॉर्ड मतदान मतलब 'परिवर्तन' था या 'निरंतरता'.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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