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नहीं रहे राम जेठमलानी, खामोश हुई वकालत की सबसे बुलंद आवाज़

मशहूर वकील राम जेठमलानी का 95 साल की उम्र में निधन हो गया है, वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे. उनका अंतिम संस्कार आज शाम लोधी रोड स्थित शवदाहगृह में किया जाएगा.

नई दिल्ली: "In my 75 years of excellence in bar" यानी "वकालत में मेरे 75 साल के शानदार करियर के दौरान," इन शब्दों के साथ कोर्ट में अब कभी जिरह की शुरुआत नहीं होगी. गरजती हुई आवाज़ में ऐसा कहने का इकलौता हकदार आज दुनिया से चला गया. राम जेठमलानी की इस बात का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों के रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है.

18 की उम्र में वकालत 23 सितंबर 1923 को अविभाजित भारत के सिंध में जन्मे रामचंद बूलचंद जेठमलानी ने सिर्फ 17 साल की उम्र में एलएलबी की डिग्री हासिल कर ली. लेकिन तब के नियमों के मुताबिक वह वकालत नहीं कर सकते थे. उन्होंने इसके खिलाफ खुद अपना केस तैयार किया. अदालत में पैरवी की और वकालत का हक हासिल कर लिया. इस तरह 18 साल की उम्र में उन्होंने बतौर वकील प्रैक्टिस शुरू की. 94 साल की उम्र में जब उन्होंने आखिरकार वकालत को अलविदा कहा, तब तक उनका करियर एक किंवदंती की शक्ल ले चुका था. ऐसी किंवदंती जिसकी बातें अदालत की गलियारों में हमेशा होती रहेंगी.

पूरे देश में पहचान भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद कराची में भड़के दंगों के चलते जनवरी 1948 में राम जेठमलानी परिवार के साथ मुंबई आ गए. जबरदस्त प्रतिभा के धनी जेठमलानी को अपनी पहचान बनाने में ज्यादा समय नहीं लगा. 1959 के चर्चित के एम नानावती केस (जिस पर अक्षय कुमार की फ़िल्म 'रुस्तम' आधारित है) में उनकी भूमिका ने पूरे देश में उनका नाम पहुंचा दिया. जेठमलानी इस मामले में सरकारी वकील की सहायता कर रहे थे. लेकिन सब जानते थे कि असल में आरोप पक्ष का मुकदमा उन्होंने तैयार किया है.

'वकील हूँ, जज नहीं' जेठमलानी अक्सर बड़े आपराधिक मामलों में आरोपी का बचाव करते हुए नजर आते थे. चर्चा होती कि वह अपराधियों के साथ खड़े होते हैं. लेकिन उनका कहना था, "सही गलत का फैसला जज का काम है. वकील का काम अपने मुवक्किल के पक्ष को पूरी ईमानदारी से कोर्ट के सामने रखना है." संसद हमले में अफ़ज़ल गुरु, इंदिरा गांधी हत्याकांड में सतवंत और केहर, जेसिका लाल हत्याकांड में मनु शर्मा, उपहार अग्निकांड में अंसल बंधु, चारा घोटाले में लालू यादव जैसे अनगिनत मामले हैं, जहां जेठमलानी उन लोगों का कोर्ट में बचाव करते आए, जिन्हें समाज का एक बड़ा हिस्सा दोषी मान चुका था.

पारदर्शी व्यवस्था की फिक्र उन्होंने कभी इस बात की फिक्र नहीं की कि समाज उनके बारे में क्या सोचेगा. वह बस अपने काम के प्रति ईमानदार बने रहना चाहते थे. देश और समाज के लिए अपनी जिम्मेदारियों से वह कभी पीछे नहीं हटे. वह अक्सर कहा करते थे, "मेरा सपना है कि मैं भारत में पारदर्शी व्यवस्था बनाने में अपना योगदान दे सकूं" उन्होंने काले धन के खिलाफ आंदोलन कर रहे बाबा रामदेव की अदालत में पैरवी की. खुद भी निजी हैसियत से सुप्रीम कोर्ट में विदेशों में जमा काले धन पर कार्यवाही की मांग के लिए याचिका दाखिल की.

खुद को नौजवान समझते कानून के बारे में सीखने और सिखाने का उन्हें बहुत शौक था. वह कहा करते थे कि अगर सीखना चाहते हो तो पढ़ाना शुरू कर दो. देश के अलग-अलग लॉ कॉलेज में जाना और वहां छात्रों से बात करना उन्हें पसंद था. बेहद जिंदादिल जेठमलानी युवाओं से घिरे रहना पसंद करते थे. वह कहा करते थे, "लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कैसे इस उम्र में भी सक्रिय हूं? मैं नौजवानों के बीच रहता हूं और मुझे लगता है कि अभी मेरी उम्र ही क्या है?"

राजनीति में सक्रियता वकालत, अध्यापन के साथ जेठमलानी राजनीति में भी लगातार सक्रिय रहे. बोफोर्स घोटाला सामने आने के बाद रोजाना तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से पूछे जाने वाले उनके सवाल सरकार को हिलाकर रख देते थे. कोर्ट के अंदर और कोर्ट के बाहर उनकी हाजिर जवाबी चर्चा में रहती थी. जब तत्कालीन राजीव गांधी से उनके सवालों पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा, "मैं हर भौंकने वाले कुत्ते को जवाब नहीं दे सकता." इस पर जेठमलानी ने कहा, "कुत्ता तभी भौंकता है, जब उसे कोई चोर नजर आता है."

1987 में उन्होंने भारत मुक्ति मोर्चा के नाम से पार्टी बनाई. 1995 में पवित्र हिंदुस्तान कड़गम के नाम से भी पार्टी बनाई. 1988 में वह पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए. जेठमलानी अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में केंद्रीय कानून मंत्री और शहरी विकास मंत्री जैसे पदों पर रहे.

अलग-अलग पार्टियों से राज्यसभा के लिए चुने जाने, अपराधियों की कोर्ट में पैरवी करने जैसी बातों के लिए जेठमलानी की कई लोगों ने आलोचना की. कभी कभी उनके निजी जीवन पर भी टिप्पणियां की गईं. लेकिन इन सब बातों से बेफिक्र जेठमलानी अपने ही अंदाज में जीते रहे. 90 से ज्यादा की उम्र तक वह अपने घर पर बने बैडमिंटन कोर्ट में नौजवानों को मात देते नजर आ जाते थे. बिना माइक के कोर्ट रूम के हर कोने में गूंजती उनकी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई. लेकिन जिन्होंने उन्हें सुना है, वह शायद ही कभी उन्हें भुला पाएंगे.

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