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जानिए कैसे नए सहयोगी बनाने और सत्ता पर काबिज होने के लिए बीजेपी ने लिया था वाजपेयी की ‘उदार’ छवि का सहारा

साल 1980 में जनसंघ के नेताओं द्वारा बीजेपी की स्थापना की गई थी. 1984 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को महज दो सीटें मिली थीं.

नई दिल्ली: बीजेपी ने नए सहयोगी बनाने और 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव जीतकर एक प्रमुख ताकत बनने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रभावशाली और ‘उदार’ छवि का खूब सहारा लिया. वर्ष 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज करके भाजपा ने पहली बार दिखाया था कि वह देश में कांग्रेस का विकल्प बन गई है. वाजपेयी ने 1980 से 1986 तब जब बीजेपी की अगुवाई की तो उन्होंने अपनी पार्टी की मूल विचारधारा ‘हिंदुत्व’ को कभी खुद पर ज्यादा हावी नहीं होने दिया. साल 1980 में जनसंघ के नेताओं द्वारा भाजपा की स्थापना की गई थी. 1984 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को महज दो सीटें मिली थीं.

बहरहाल, लाल कृष्ण आडवाणी को 80 के दशक के अंतिम वर्षों और 90 के दशक के शुरुआती वर्षों में बीजेपी को ऊंचाई पर ले जाने वाली असल शख्सियत के तौर पर जाना जाता है. आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी ने विश्व हिंदू परिषद जैसी अपनी हिंदुत्व की सहयोगियों के साथ मिलकर 1990 में राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू किया और अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए रथ-यात्रा निकाली.

वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामशेषन ने बताया कि वाजपेयी ने ‘‘गांधीवादी समाजवाद’’ का विचार प्रतिपादित किया था, लेकिन उसे जनता में ज्यादा स्वीकार्यता नहीं मिली. राधिका ने कहा कि वाजपेयी को संगठन में एक तरह से ‘‘दरकिनार’’ कर दिया गया था, क्योंकि बीजेपी के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने तय किया था कि उसे पूरे जोर-शोर से हिंदुत्व के साथ चलना है.

आडवाणी को वाजपेयी की तुलना में ज्यादा कट्टर माना जाता था. उन्होंने 1986 में बीजेपी की कमान संभाली और ‘राम जन्मभूमि’ आंदोलन में पूरा जोर लगाने का फैसला किया. उन्होंने पहली बार 1989 में अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण के पक्ष में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की एक बैठक में प्रस्ताव पारित कराया था.

राधिका ने कहा, ‘‘अटलजी इस पूरे दौर में एक तरह से हाशिये पर थे. बीजेपी की कहानी दरअसल वहां (राम जन्मभूमि आंदोलन) से शुरू होती है और वह उस दौर में मौजूद नहीं थे. वह वैचारिक तौर पर काफी मजबूत थे, लेकिन उन्होंने इसे कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और वह अपनी हिंदुत्व की विचारधारा को साबित करने के लिए नारे लगाते नहीं फिरते थे.’’

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मंदिर आंदोलन की बड़ी राजनीतिक कामयाबी के दौरान वाजपेयी पार्टी का चेहरा नहीं थे. वर्ष 1989 में बीजेपी को 85 सीटें हासिल हुई जो उसके लिए बड़ी सफलता थी. इसके बाद 1991 में 120 सीटें जीतकर वह प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई.  हिंदुत्व को लेकर आडवाणी के प्रयासों ने पार्टी के जनाधार में काफी बढ़ोतरी की, लेकिन संगठन के भीतर और आरएसएस के कुछ तबकों में भी लगातार ऐसा महसूस किया जा रहा था कि यदि उसे अगले स्तर तक पहुंचना है और सरकार बनाने का सपना साकार करना है तो उसे एक ऐसे चेहरे की जरूरत होगी जिसकी अपील विचारधारा से कहीं आगे हो.

राधिका ने बताया कि वाजपेयी को सभी को साथ लेकर चलने वाले नेता के तौर पर देखा जाता था और वह ऐसे नेता के रूप में फिट नजर आ रहे थे जिनकी जरूरत संगठन में महसूस की जा रही थी. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि 90 का दशक गठबंधन राजनीति का दौर था और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड के बाद बीजेपी क्षेत्रीय पार्टियों, खासकर दक्षिण भारतीय पार्टियों, के लिए एक तरह से अछूत थी. साल 1995 में आडवाणी की अगुवाई वाली भाजपा ने वाजपेयी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया. आरएसएस के तत्कालीन प्रमुख राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ने भी इस फैसले का समर्थन किया.

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आडवाणी के वैचारिक नेतृत्व ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट किया और समर्थन जुटाया जबकि वाजपेयी ने अपनी वाक्पटुता से जनता के दिलों में जगह बनाई. भाजपा के आलोचक अक्सर आरोप लगाते हैं कि वाजपेयी तो बस एक ‘मुखौटा’ थे ताकि पार्टी के कट्टरपंथी एजेंडे को ढका जा सके. लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि वह वास्तव में एक जन नेता थे, जिनकी अपील जाति, भाषा, धर्म एवं क्षेत्र से परे थी.

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