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Raid On PFI: कितने दिनों तक पीएफआई पर पड़े छापे और क्या हुआ हासिल, कितनी गिरफ्तारी हुईं; जानिए सबकुछ

PFI Cases: पीएफआई से जुड़े लोगों के खिलाफ 2010 से कार्रवाइयां हो रही हैं. आतंकी गतिविधियों और हत्या समेत कई मामलों में संगठन का नाम आ चुका है. आइये जानते हैं पीएफआई के बारे में सबकुछ.

PFI Controversies: इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़े लोगों के खिलाफ कानून प्रर्वतन एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) ने 22 सितंबर को देश के 15 राज्यों में छापेमारी (Raids) की थी और सौ से ज्यादा लोगों के गिरफ्तार किया था. मंगलवार (27 सितंबर) को एक बार फिर एनआईए (NIA) की लीड पर सात राज्यों की पुलिस (Police) ने पीएफआई के कई ठिकानों पर छापे मारे. इस कार्रवाई को ऑपरेशन ऑक्टोपस 2.0 बताया जा रहा है.

मंगलवार को दिल्ली, उत्तर प्रदेश (UP), मध्य प्रदेश (MP), महाराष्ट्र (Maharashtra) और कर्नाटक (Karnataka) समेत कई राज्यों में पीएफआई से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई. मंगलवार की कार्रवाई में देशभर से 80 से ज्यादा पीएफआई सदस्यों को गिरफ्तार किया गया. वहीं, 247 लोगों को हिरासत में लिया गया.

मंगलवार को दिल्ली में पीएफआई से जुडे़ 30 लोगों को गिरफ्तार किया गया. वहीं, असम में 25 और कर्नाटक में भी 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया. उत्तर प्रदेश 24 लोगों को हिरासत में लिया गया. महाराष्ट्र में 27, गुजरात में 15  और कर्नाटक में पीएफआई और एसडीपीआई के 80 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया.

ऑपरेशन ऑक्टोपस के पहले पार्ट में हुई इतनी गिरफ्तारियां

22 सितंबर को पीएफआई के खिलाफ 15 राज्यों में छापेमारी के दौरान 106 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. जिनमें 45 लोगों को एनआईए ने गिरफ्तार किया था. इनमें केरल से 39, तमिलनाडु से 16, कर्नाटक से 12, आंध्र प्रदेश से सात, राजस्थान और महाराष्ट्र से चार-चार, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से दो-दो, तेलंगाना, असम, मध्य प्रदेश, गोवा, पश्चिम बंगाल, बिहार और मणिपुर में एक-एक गिरफ्तारी हुई थी.

2010-11 से अब तक पीएफआई के 46 लोगो दोषी ठहराए जा चुके हैं और 355 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है. एनआईए, अन्य एजेंसियों और पुलिस द्वारा अब तक गिरफ्तार किए गए पीएफआई के लोगों के सटीक आंकड़े की जानकारी नहीं है लेकिन सैंकड़ों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. 

क्या है पीएफआई?

22 नवंबर 2006 को केरल के नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिगनिटी और तमिलनाडु के मनिता नीति पसरई संगठनों का विलय करके पीएफआई की स्थापना की गई. शुरू में पीएफआई का मुख्यालय केरल के कोझिकोड में था लेकिन बाद में उसे दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया था.

पीएफआई के अध्यक्ष ओएमए अब्दुल सलाम हैं और ईएम अब्दुल रहिमन इसे उपाध्यक्ष हैं. हर वर्ष 15 अगस्त को यह संगठन फ्रीडम परेड आयोजित करता है लेकिन 2013 में केरल सरकार ने परेड पर रोक लगा दी थी. पीएफआई की वर्दी भी है, जिसमें पुलिस की तरह सितारे और एंबलम लगे हैं. 

पीएफआई के गठन के वक्त प्रतिबंधित आतंकी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया के सदस्य पीएफआई में शामिल थे. तत्कालीन पीएफआई अध्यक्ष अब्दुल रहमान कभी सिमी के राष्ट्रीय सचिव थे और पीएफआई के राज्य सचिव अब्दुल हमीद भी सिमी के सचिव रह चुके थे. इसके अलावा, पीएफआई के संस्थापक सदस्यों में सिमी का महासचिव ईएम रहीमन, केरल में सिमी इकाई का अध्यक्ष ई अबूबकर और प्रोफेसर पी कोया शामिल थे.

सिमी का गठन अप्रैल 1977 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था. पीएफआई खुद को न्याय, स्वतंत्रता और लोगों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने वाला एक नव-सामाजिक संगठन बताता है. संगठन मुस्लिम आरक्षण की वकालत करता है. 2012 में पीएफआई ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के इस्तेमाल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. संगठन का कहना था कि कानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों को हिरासत में लेने के लिए किया जा रहा है. 

एसडीपीआई की स्थापना

पीएफआई ने 2009 में एक राजनीतिक पार्टी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की स्थापना की. इस पार्टी के गठन का मकसद मुस्लिमों, दलितों और दबे-कुचले लोगों की मदद करना बताया गया. अबूबकर एसडीपीआई का प्रमुख बना. पीएफआई ने कॉलेज में छात्र राजनीति पर पकड़ बनानी शुरू की औक द कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) संगठन खड़ा किया.

कौन-कौन से संगठनों से पीएफआई का टाईअप

पीएफआई का देश के कई संगठनों से टाईअप है. संगठन गोवा सिटीजंस फोरम, राजस्थान के कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशन सोसायटी, पश्चिम बंगाल के नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, मणिपुर में लीलांग सोशल फोरम और आंध्र प्रदेश में एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस के साथ मिलकर काम करता है.

पीएफआई के विवाद और कानूनी कार्रवाइयां

2003 केरल के कोझीकोड के मराड समुद्र तट पर सांप्रदायिक संघर्ष हुआ था. हिंसा में आठ हिंदुओं की हत्या की गई थी. हत्या के आरोप में जिन लोगों को गिरफ्तार किए गया था, वो बाद में पीएफआई में शामिल हो गए थे.

2010 में पीएफआई के लोगों ने ईश निंदा के आरोप में एक मलयालम प्रोफेसर टीजे जोसफ का कलाई के पास हाथ काट दिया था. केरल के थोडुपुझा स्थित न्यूमैन कॉलेज में मलयालम भाषा के प्रोफेसर टीजे जोसफ ने मार्च 2010 में बीकॉम के द्विती वर्ष के छात्रों के लिए एक प्रश्नपत्र बनाया था. जोसफ पर आरोप लगा था कि उन्होंने ईश निंदा वाला सवाल प्रश्नपत्र में रखा. बाद में जोसफ को नौकरी से निकाल दिया गया था. पुलिस ने जोसफ पर हमला करने आरोप में शुरू में पीएफआई के दो लोगों अशरफ और जफर को गिरफ्तार किया था. 14 जनवरी को पुलिस ने पीएफआई से जुड़े 27 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था. 

जुलाई 2010 में केरल पुलिस ने पीएफआई कार्यकर्ताओं से देशी बम, हथियार, सीडी और तालिबान और अल-कायदा के प्रचार वाले कई दस्तावेज जब्त किए थे. 

केरल सरकार ने हाई कोर्ट को बताया कि 6 सितंबर 2010 तक पुलिस को हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा या अल-कायदा के साथ संबंधों के आरोपों की जांच में कोई सबूत नहीं मिला है लेकिन अप्रैल 2013 में केरल पुलिस द्वारा उत्तरी केरल में पीएफआई केंद्रों पर छापेमारी में घातक हथियार, विदेशी मुद्रा, बम, कच्चे विस्फोटक माल, बारूद, तलवारें और अन्य चीजें मिलीं. केरल पुलिस ने दावा किया था कि छापेमारी से पीएफआई के 'आतंकी चेहरे' का पता चला है.

2012 में केरल सरकार ने केरल हाई कोर्ट में एक हलफनामा देकर बताया कि 27 हत्या के मामलों में पीएफआई की सक्रिय भागीदारी थी. जिन लोगों की हत्या की गई, उनमें ज्यादातर सीपीआई-एम और आरएसएस के कार्यकर्ता थे.

कन्नूर के छात्र की हत्या और असम दंगे में आया नाम

6 जुलाई 2012 को कन्नूर के रहने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक छात्र एन सचिन गोपाल को कथित तौर पर सीएफआई और पीएफआई के लोगों ने चाकू मार दी थी, बाद में 6 सितंबर को इलाज के दौरान गोपाल की मौत हो गई थी.  विशाल नाम के छात्र की हत्या करने का आरोप भी पीएफआई के लोगों पर लगा था. मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल का गठन किया गया था.

जुलाई 2012 में असम में बोडो समुदाय और मुस्लिम समुदाय के बीच दंगे भड़के थे. दंगों के पीछे भी पीएफआई का नाम आया था.

इन दंगों की वजह से दक्षिण भारत से उत्तर भारतीयों निकालने की मुहिम शुरू की गई थी. इसके लिए पीएफआई और हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी यानी हूजी संगठन पर आरोप लगे थे. 13 अगस्त 2012 को छह करोड़ से ज्यादा भड़काऊं एसएमएस भेजे गए थे, जिनमें 30 फीसदी पाकिस्तान से आए थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, बेंगलुरु से तीन दिन में 30 हजार से ज्यादा उत्तर भारतीयों को वापस लौटना पड़ा था.

केरल सरकार ने हाई कोर्ट में दी पीएफआई के खिलाफ डिटेल 

2014 में केरल सरकार ने हाई कोर्ट को बताया कि एनडीएफ और पीएफआई के कार्यकर्ता 27 सांप्रदायिक हत्याओं, 86 हत्या के प्रयास के मामलों और राज्य में दर्ज 106 सांप्रदायिक मामलों में शामिल थे. आबिद पाशा नाम के एक बढ़ई को हत्या के छह मामलों में गिरफ्तार किया गया था. उसके पीएफआई के साथ संबंध थे.

नवंबर 2017 में केरल पुलिस ने पीएफआई के 6 सदस्यों की पहचान की, जो खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गए थे, जो संभवत: नकली पासपोर्ट का उपयोग करके सीरिया चले गए थे.

फरवरी 2019 में धर्मांतरण गतिविधियों के बारे में कुछ मुसलमानों के साथ बहस के बाद पीएमके के सदस्य रामलिंगम की हत्या कर दी गई थी, जिसके लिए पीएफआई के एक सदस्य को गिरफ्तार किया गया था. मामले में अगस्त 2019 में पीएफआई के 18 सदस्यों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे. 

2017 में इंडिया टुडे ने पीएफआई के संस्थापक सदस्य अहमद शरीफ का स्टिंग ऑपरेशन किया था, जिसमें उसने मीडिल ईस्ट के देशों से हवाला चैनल के जरिये संगठन को फंड मिलने की बात स्वीकारी थी और कहा था कि भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को इस्लामिक बनाना चाहता है. 

हाल के विवाद

2020 में नागरिकता संसोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में संगठन का नाम आया. देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों की फंडिंग करने का आरोप पीएफआई पर लगा था. पटना के फुलवारी शरीफ में 'गजवा-ए-हिंद' साजिश का भंडाफोड़ किया गया.  

इसी साल चार जुलाई को तेलंगाना के निजामाबाद थाने में पीएफआई से जुड़े 25 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. एफआईआर में बताया गया कि आरोपी हिंसक-आतंकी कार्यों में संलिप्त थे और धर्म के आधार पर समाज में हिंसा को बढ़ावा दे रहे थे. इसके लिए आरोपी प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर रहे थे. कराटे ट्रेनिंग के नाम पर लोगों को हथियार चलाना सिखाया जा रहा था. 

इसी साल कर्नाटक हिजाब विवाद और राज्य में बीजेपी के युवा नेता प्रवीण नेत्तारू की हत्या के मामले में पीएफआई का नाम आया था.

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