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वो नेता जो बने कांग्रेस के अध्यक्ष, लेकिन नहीं थे गांधी परिवार से

Non-Gandhi Party Presidents: साल 1947 में देश को मिली आजादी के बाद कांग्रेस के 19 अध्यक्ष हुए हैं. इन 19 में सिर्फ 5 अध्यक्ष ही गांधी परिवार से रहे हैं जबकि अन्य का गांधी परिवार से दूर-दूर तक नाता नहीं रहा.

Non-Gandhi Party Presidents: 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस अपनी खोई जमीन को पाने की कोशिश में लगी है. इसी बीच पार्टी के अध्यक्ष का चुनाव भी नजदीक आ रहा है. अभी तक शीर्ष पद को लेकर चर्चाओं का दौर थमा नहीं है. नए अध्यक्ष को लेकर सियासी सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं. इस बीच खबर है कि पार्टी की मौजूदा अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की तबीयत नासाज है और वह इलाज के लिए विदेश जा रही हैं. जबकि पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी अध्यक्ष के रूप में वापसी के मूड में नहीं हैं. हाईकमान ये भी स्पष्ट कर चुका है कि इस बार गांधी परिवार से बाहर का कोई शख्स अध्यक्ष बनना चाहिए. ऐसे में पार्टी एक नए नेतृत्व की तलाश में है. हालांकि ये सवाल भी बरकरार है कि पार्टी का नया अध्यक्ष गांधी परिवार से ही होगा या नहीं. 

फिलहाल इस रेस में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  का नाम सबसे आगे लिया जा है. ऐसा माना जा रहा है कि पार्टी चाहती है गहलोत आगे आकर इस पद की जिम्मेदारी संभाल लें, लेकिन अशोक गहलोत ने खुद इस मामले पर अभी तक कुछ नहीं कहा का है. इस रेस में प्रियंका गांधी वाड्रा का नाम भी सामने आ रहा है. ऐसी संभावना है कि उन्हें अध्यक्ष पद संभालने के लिए मनाया जा सकता है,लेकिन  उन्होंने कई मौकों पर इस पद को संभालने से इनकार कर दिया था. अब जब गांधी परिवार के तीनों सदस्य ने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया है तो अगले पार्टी अध्यक्ष को लेकर चर्चा और तेज हो गई है .

राहुल गांधी ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था और शिकस्त की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. इस इस्तीफे को पूरे दो साल हो चुके हैं लेकिन आज भी कांग्रेस पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना है. राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वापसी होगी या नहीं, इस पर अभी भी कोई स्पष्टता भी नहीं है. 

यह पार्टी 54 साल तक केंद्र की सत्‍ता में रही है और देश को 7 प्रधानमंत्री दिए हैं. अध्यक्ष पद की बात करें तो पार्टी ने आजादी के बाद से कुल 19 नेताओं को अध्‍यक्ष पद पर बिठाया है. कहा जाता है कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार की चलती है, लेकिन अगर आप इन आजादी के बाद बने पार्टी के 19 अध्यक्षों को देखें तो पता चलता है कि इसमें नेहरू-गांधी खानदान के पांच लोग हैं. हालांकि आजादी के 75 सालों में 40 साल इस परिवार का ही कोई न कोई सदस्य अध्यक्ष पद पर काबिज रहा. साल 1998 के बाद लगातार सोनिया या राहुल गांधी ही अध्यक्ष रहे हैं.

कितने गैरगांधी कांग्रेसी पार्टी प्रेसिडेंट बने हैं और उनका कांग्रेस के लिए क्या योगदान रहा है.

1948-1949: स्वतंत्र भारत में कांग्रेस पार्टी के पहले अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैय्या (Pattabhi Sitaraimayya) थे जो पेशे से डॉक्टर थे और जयपुर अधिवेशन के पार्टी प्रमुख के रूप में चुने गए थे. साल 1930 में आंध्र प्रदेश के मसूलीपट्टनम के पास समुद्र तट पर स्वयंसेवकों का नेतृत्व करके और नमक बनाकर नमक कानून तोड़ने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था.

1950: पुरुषोत्तम दास टंडन साल 1950 में अध्यक्ष बने और नासिक सत्र की अध्यक्षता की. भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी को प्रतिष्ठित करवाने में उनका खास योगदान माना जाता है और देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भी उन्हें दिया गया था. 

1960-1963: आंध्र प्रदेश के एक प्रमुख नेता, नीलम संजीव रेड्डी 1960-1963 तक INC के अध्यक्ष थे. वह साल 1977 से 1982 तक भारत के छठे राष्ट्रपति थे. उन्होंने 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के लिए कॉलेज में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी. 

1964-1967: के कामराज साल 1964 से 1967 तक INC के अध्यक्ष रहे. उन्हें भारतीय राजनीति में किंगमेकर माना जाता था. INC वेबसाइट के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू के निधन से लेकर 1969 में कांग्रेस के विभाजन तक भारत के भाग्य को आकार देने में अग्रणी भूमिका निभाई. उन्हें भारत रत्न पुरस्कार दिया गया था. 

1968-1969: एस सिद्धवनल्ली निजलिंगप्पा पेशे से वकील थे जिन्होंने कर्नाटक के एकीकरण में अग्रणी भूमिका निभाई और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. वह साल 1968-69 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे. जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तो उन्होंने ही इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट के खिलाफ संगठन के मोर्चे का समर्थन किया था. 

1970-1971: जगजीवन राम को बाबूजी भी कहा जाता है, उनका विचार था कि दलित नेताओं को न केवल सामाजिक सुधारों के लिए लड़ना चाहिए, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भी मांग करनी चाहिए. महात्मा गांधी से प्रेरित होकर वे सविनय अवज्ञा आंदोलन और सत्याग्रह में शामिल हो गए. वे पिछड़े वर्गों, अछूतों और शोषित मजदूरों के नेता थे. उन्होंने सामाजिक न्याय को संविधान में शामिल करने पर जोर दिया और 1946 में नेहरू की अंतरिम सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री थे.

1972-1974: शंकर दयाल शर्मा ने चार साल तक कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. वह 1992 से 1997 तक भारत के राष्ट्रपति भी रहें और साल 1959 में कराची, पाकिस्तान में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर यूनेस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. 

1975-1977: देवकांत बरुआ ने साल 1975-1977 तक आपातकाल के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था. उन्हें अपनी 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' टिप्पणी के लिए जाना जाता है. वह गांधी परिवार के वफादार थे, लेकिन बाद में कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा विरोधी गुट में शामिल हो गए. 

1992-96: पीवी नरसिम्हा राव साल 1992 से 1996 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहें. पीवी नरसिम्हा राव, भारत के नौवें प्रधान मंत्री थे और उन्हें एक ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली जो सोवियत संघ के पतन के कारण एक अंतरराष्ट्रीय चूक के कगार पर थी. प्रधानमंत्री पद के अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की देखरेख की.

1996-1998: बिहार से तालुक रखने वाले सीताराम केसरी को 1996 में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गए थे. सीताराम केसरी 13 साल के बच्चे के रूप में बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए और अंतत अपने राज्य के एक युवा नेता बन गए. 

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