'उसे तत्काल रिहा करें...', निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली की याचिका पर बोला सुप्रीम कोर्ट
सुरेंद्र कोली को 12 मामलों में पहले ही बरी किया जा चुका है. सिर्फ एक केस बचा था, जिसमें उसे आज बरी कर दिया गया. 2009 में हाईकोर्ट ने उसे नाबालिग की हत्या का दोषी ठहराया था.

निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है. मंगलवार को (11 नवंबर, 2025) को कोर्ट ने उसकी क्यूरेटिव याचिका स्वीकार कर ली है. 12 मामलों में बरी हो चुका कोली सिर्फ रिम्पा हलदर मामले में दोषी होने के चलते जेल में था. सुप्रीम कोर्ट ने आज 2011 में आया अपना आदेश बदल दिया है.
इसी साल इलाहाबाद हाईकोर्ट से 12 मामलों में बरी होने के बाद कोली ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल की थी. फरवरी, 2011 में कोर्ट ने उसे 15 साल की नाबालिग की हत्या का दोषी पाया था. मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने फरवरी, 2011 का फैसला पलटते हुए उसकी दोषसिद्धी को रद्द कर दिया.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस सूर्यकातं ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से बरी किया जाता है. याचिकाकर्ता को तत्काल बरी किया जाए.' 7 अक्टूबर को सुरेंद्र कोली की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ एक बयान और किचन से मिले चाकू के आधार पर उसे दोषी करार दिया गया. कोर्ट ने यह भी कहा है कि बाकी मामलों में बरी किए जाने की वजह से विषम स्थिति पैदा हो गई हैं.
निठारी मर्डर केस साल 2006 में तब सामने आया जब नोएडा के निठारी गांव में एक घर के पास नाले से कुछ कंकाल मिले थे. यह घर मोनिंदर सिंह पंढेर का था और सुरेंद्र कोली उसका नौकर था. सीबीआई को मामले की जांच सौंपी गई और जांच एजेंसी ने इस मामले में कई केस फाइल किए. सीबीआई ने इस मामले में सुरेंद्र कोली को भी आरोपी बनाया और उसके खिलाफ मर्डर, किडनेपिंग, रेप और साक्ष्य छिपाने जैसे कई मामले दर्ज किए गए, जबकि मोनिंदर पंढेर पर सिर्फ अनैतिक तस्करी का मामला दर्ज हुआ.
बाद में कोली को कई नाबालिग बच्चियों से रेप और हत्या का दोषी करार दिया गया और उसे दस से ज्यादा मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई. जिस मामले में कोली को आज रिहा किया गया है, 2009 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसी मामले में उसे दोषी ठहराया था और मोनिंदर पंढेर को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया. हालांकि, पंढेर को भी दो मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वो भी बरी हो चुका है.
हाईकोर्ट के आदेश को कोली ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई. कोली ने 2014 में पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की, लेकिन कोर्ट से उसे कोई राहत नहीं मिली. 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुरेंद्र कोली की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया. यह फैसला इस आधार पर लिया गया कि उसकी दया याचिका पर फैसला लेने में काफी देरी हो चुकी थी.
2023 में हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में कोली और पंढेर को 2017 में ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई मौत की सजा को पलट दिया. साथ ही सुरेंद्र कोली को 12 और मोनिंदर पंढेर को 2 मामलों में बरी करने का भी फैसला सुनाया गया, जिनमें दोनों को पहले दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई थी. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई और पीड़ित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में 12 याचिकाएं दाखिल कीं, लेकिन 31 जुलाई को कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं.
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Source: IOCL






















