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Mughal Law For Women: मुगलकाल में मुस्लिम महिलाएं कैसे ले सकती थीं तलाक, किस मुगल बादशाह ने दिया कानूनी अधिकार

मुगल बादशाह जहांगीर ने 1611 में तलाक को लेकर ऐसा फैसला दिया, जिसने औरतों को अधिकार और आवाज दी. जानिए कैसे उनके आदेश ने मुगलकाल की सामाजिक तस्वीर बदल दी.

मुगलों के दौर के रीति-रिवाज और सामाजिक परंपराएं अक्सर चौंकाने वाली रही हैं, लेकिन मुगल बादशाह जहांगीर ने 1611 में एक ऐसा कदम उठाया, जिसने उस दौर की महिलाओं को नई पहचान दी. ‘मजलिस-ए-जहांगीरी’ नामक ऐतिहासिक दस्तावेज में दर्ज है कि जहांगीर ने 20 जून 1611 को तलाक से संबंधित एक बड़ा और साहसिक ऐलान किया था. उन्होंने कहा था कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति बिना किसी वाजिब वजह के अपनी बेगम को तलाक देता है तो उसे अवैध माना जाएगा.

जहांगीर के इस आदेश पर काजी की मुहर लगी और इसे कानून के रूप में लागू कर दिया गया. इस तरह पहली बार महिलाओं को तलाक के मामलों में न्याय पाने का अधिकार मिला. जहांगीर के फैसले से पहले समाज में पुरुषों की जुबान ही कानून मानी जाती थी. तलाक देना उनका व्यक्तिगत निर्णय था, जिसमें महिलाओं की कोई राय मायने नहीं रखती थी, लेकिन इस नए कानून ने स्थिति को बदल दिया. महिलाओं को अब अपनी बात रखने और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का अवसर मिला. बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि इस फैसले के बाद महिलाओं ने न केवल तलाक की प्रक्रिया को समझना शुरू किया, बल्कि कई बार खुले तौर पर तलाक की मांग भी की.

1628 का मामला तलाक के बदले सिक्कों की मांग

एक मुस्लिम व्यक्ति ने तलाक देने के लिए अपनी बेगम से 60 महमूदी सिक्के मांगे. सिक्के मिलने के बाद उसने तलाक दे दिया, लेकिन दस्तावेज में वजह दर्ज नहीं की गई. यह मामला दिखाता है कि पुरुष वर्चस्व अभी भी समाज में गहराई से मौजूद था, लेकिन कानून ने महिलाओं को लड़ने का रास्ता दिया.

फत बानू का मामला शराबी पति से तलाक

एक और उदाहरण में, फत बानू नाम की महिला ने अपने पति चिश्त मोहम्मद के खिलाफ काजी से शिकायत की. उसने कहा कि उसका पति शराबी है और पति होने के अधिकार खो चुका है. काजी ने उसकी बात सही मानी और तलाक को मंज़ूरी दी. यह उस दौर की पहली मिसालों में से एक थी जब महिला की बात को महत्व दिया गया.

1612 का मामला मोहम्मद जियू और पत्नी का विवाद

5 फरवरी 1612 को मोहम्मद जियू नाम के व्यक्ति ने अपनी पत्नी से अलग होने की अर्जी दी. काजी ने तलाक की शर्त तय की रोजाना एक तांबे का सिक्का, दो कुर्तियां और दो साड़ियां पत्नी को देना अनिवार्य होगा. बाद में जब पति ने ये वादे पूरे नहीं किए तो पत्नी ने काजी से कहा कि उसने दस्तखत करते समय कहा था कि अगर मैं यह हर्जाना नहीं दे पाया तो शादी खत्म मानी जाएगी. काजी ने महिला का पक्ष सुना और तलाक को वैध करार दिया.

समाज में नई सोच की शुरुआत
जहांगीर के इस आदेश ने न केवल कानूनी ढांचा बदला, बल्कि सामाजिक मानसिकता को भी झकझोरा. अब महिलाएं काजी के पास जाकर अपनी बात रख सकती थीं. उनकी शिकायतें सुनी जाने लगीं और पुरुषों के फैसले पर सवाल उठने लगे. इतिहासकारों का मानना है कि यह फैसला भारतीय उपमहाद्वीप में महिलाओं के अधिकारों की दिशा में पहला कानूनी कदम था.

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