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‘रिमोट कंट्रोल’ कैसे बना एक सियासी शब्द? ठाकरे से लेकर पवार और सोनिया गांधी तक कर चुके हैं इस्तेमाल

शरद पवार की पहल पर ही शिवसेना और कांग्रेस जैसी विपरीत विचारधाराओं वाली पार्टियां सरकार बनाने के लिये एक साथ आईं.

मुंबई: रिमोट कंट्रेल भले ही टीवी चलाने का छोटा सा एक यंत्र हो लेकिन भारतीय राजनीति में भी बीते ढाई दशक से इसका इस्तेमाल होता आया है. इसका सबसे ताजा इस्तेमाल किया उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के मुखपत्र सामना को दिये एक इंटरव्यू में. ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार का रिमोट कंट्रोल एनसीपी प्रमुख शरद पवार के हाथ में नहीं है बल्कि पवार तो सिर्फ सरकार के मार्गदर्शक हैं.

जिस तरह से रिमोट कंट्रोल का इस्तेमाल टीवी बंद करने, चालू करने, चैनल बदलने या आवाज कम ज्यादा करने के लिये होता है, उसी तरह से कुछ राजनेता भी सरकार से बाहर रहते हुए सरकार को नियंत्रित करते हैं. अपने अदृश्य रिमोट के जरिये इन्होने कभी मंत्री बदले हैं तो कभी मुख्यमंत्री, कभी सरकार से कुछ फैसले करवाये हैं तो कुछ फैसले रूकवाये हैं. सरकार किस मसले पर क्या रूख अपनायेगी, ये रिमोट कंट्रेल थामने वाला नेता ही तय करता है.

इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1995 में हुआ था. शिवसेना-बीजेपी की गठबंधन सरकार पहली बार महराष्ट्र की सत्ता में आई थी. जब शिवसेना की ओर से मनोहर जोशी को मुख्यमंत्री बनाया गया तो पत्रकारों ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से पूछा कि वे सरकार का हिस्सा क्यों नहीं हैं, तब ठाकरे ने कहा –‘सरकार का रिमोट कंट्रेल मेरे हाथ में रहेगा’. इसका मतलब साफ था कि भले ही सरकार का चेहरा जोशी थे, लेकिन सरकार की असली ताकत बाल ठाकरे के हाथ में थी. ठाकरे ने ये सौगंध ले रखी थी कि वे न तो कभी चुनाव लडेंगे और न ही कभी कोई सरकारी पद लेंगे.

अपने पास मौजूद रिमोट कंट्रोल का ठाकरे ने बखूबी इस्तेमाल भी किया. सरकार के तमाम अहम फैसले उन्हीं के इशारे पर लिये गये. 1999 में ठाकरे ने जब रिमोट का बटन दबाया तो मनोहर जोशी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन गई और उनकी जगह नारायण राणे को बिठा दिया गया. हालांकि उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में बाल ठाकरे के हाथ से रिमोट कंट्रोल छिन गया और महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की सत्ता आ गई.

2004 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की सत्ता का रिमोट कंट्रोल शरद पवार के पास आ गया. हालांकि मुखयमंत्री कांग्रेस का बनाया गया लेकिन चलती एनसीपी प्रमुख शरद पवार की थी. इसके पीछे कारण ये था कि पवार ने कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीतकर भी उसे मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया था. कांग्रेस को तब 69 सीटें मिलीं थीं और एनसीपी को 71.

रिमोट कंट्रोल का इस्तेमाल केंद्र सरकार के लिये भी हुआ. साल 2004 में जब यूपीए की सत्ता आई तो सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री का पद स्वीकार ना करते हुए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया. उसके बाद आने वाले 10 सालों तक यानि कि 2014 तक माना गया कि केंद्र सरकार का रिमोट कंट्रोल मां-बेटे यानी सोनिया-राहुल के हाथ में रहा.

2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद जो सियासी ड्रामा चला उसके सूत्रधार शरद पवार माने जाते हैं. माना जाता है कि सरकार का रिमोट कंट्रोल शरद पवार के हाथ में है और वे कुछ उसी तरह से महाराष्ट्र को नियंत्रित करते हैं जिस तरह 1995 से 1999 तक बाल ठाकरे करते थे. हालांकि, उद्धव ठाकरे ने इस आरोप का खंडन किया है और कहा है कि पवार सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका में रहते हैं.

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