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'US को दशकों तक बनाया बेवकूफ, अब चीन की बारी', पाकिस्तान का जिक्र कर पूर्व IAF ऑफिसर ने कही बड़ी बात

Former IAF Officer On Pakistan: पाकिस्तान ने जिहादी रणनीति पर काम करना 1973-74 में ही प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में शुरू कर दी थी.

Pakistan Reality: भारत से अलग होकर पाकिस्तान ने अपनी अलग और खास पहचान बनाई है. आतंकवादी देश, धोखेबाज और चालबाज ये उसकी पहचान बन चुकी है. ये एक ऐसा देश है जिसने अपनी देश की जनता के साथ भी धोखा किया. भारतीय वायुसेना के पूर्व ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत ने पाकिस्तान को धोखेबाजी में मास्टर करार दिया और कहा कि वो ऐतिहासिक रूप से विश्व की शक्तियों का सिर्फ शोषण किया.

अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक सी. क्रिस्टीन फेयर के एक लेख पर प्रतिक्रिया देते हुए, अहलावत ने लिखा, "पाकिस्तान चालाकी करने में माहिर है. वो सभी को मूर्ख बनाता है- किसी को नहीं छोड़ता. उसने दशकों तक अमेरिका का फायदा उठाया और उसे फूल बनाया. अब वो चीन के साथ भी ऐसा ही करेगा- बस समय की बात है.”

अजय अहलावत ने क्यों कही ये बात?

अहलावत की ये टिप्पणी फेयर की ओर से पाकिस्तान के दोहरेपन के लंबे रिकॉर्ड के बावजूद वाशिंगटन की ओर से पाकिस्तान को लगातार गलत तरीके से समझने पर विस्तृत टिप्पणी शेयर करने के बाद आई है. ‘पाकिस्तान अमेरिकियों को कैसे बहकाता है’ टाइटल वाले अपने लेख में फेयर ने बताया है कि कैसे अमेरिकी अधिकारी बार-बार पाकिस्तान की सावधानीपूर्वक गढ़ी गई कहानियों के झांसे में आ गए, जो सॉफ्ट पावर, रणनीतिक हेरफेर और किराए की तलाश करने वाले व्यवहार से प्रेरित थे.

क्रिस्टीन फेयर ने क्या लिखा था?

फेयर लिखती हैं, "पिछले कुछ सालों में मुझे वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के कई अधिकारियों से मिलने का मौका मिला है. वे सभी कभी न कभी एक ही सवाल पूछते हैं: ‘पाकिस्तानी आप अमेरिकियों को कैसे धोखा देते रहते हैं? यह दुष्ट देश आतंकवाद का समर्थन करते हुए और एक गैर-जिम्मेदार परमाणु हथियार संपन्न देश होते हुए भी अरबों डॉलर की सहायता और सैन्य सहायता कैसे लेता रहता है?”

वह बताती हैं कि पाकिस्तान की ताकत सिर्फ उसके परमाणु ताकत और आतंकी नेटवर्क से ही नहीं आती, बल्कि यह भी है कि वह कैसे हॉस्पिटैलिटी, अच्छे से बोले गए झूठ और मिलिट्री टूरिज्म के जरिए सहानुभूति पैदा करता है. उनके मुताबिक, पाकिस्तान पर काम करने वाले कई अमेरिकी अधिकारी अच्छे इरादे वाले भोले-भाले हैं, जो क्षेत्रीय जटिलताओं से अपरिचित हैं.

वो कहती हैं, पाकिस्तान ने जिहादी रणनीति पर काम करना 1973-74 में ही प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में शुरू कर दी थी, इससे बहुत पहले कि अमेरिका इस क्षेत्र के सोवियत विरोधी प्रयासों में शामिल होता.

वह लिखती हैं, "पाकिस्तान ने 1973 और 1974 के बीच अपनी जिहाद नीति शुरू की, जब मोहम्मद दाउद खान ने लोकप्रिय राजा जाहिर शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया. उस समय, पाकिस्तान के नागरिक तानाशाह, जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस्लामवादियों को साधने के लिए ISI अफगानिस्तान सेल की स्थापना की. 1979 के क्रिसमस के दिन जब सोवियत संघ ने अमु दरिया को पार किया, तब तक मुख्य तथाकथित मुजाहिदीन पार्टियां पहले ही बन चुकी थीं. पाकिस्तान ने यह सब अपने दम पर किया क्योंकि अफगानिस्तान में घटनाओं में हेरफेर करना 1947 से ही पाकिस्तान का स्थायी रणनीतिक उद्देश्य रहा है."

चीन के बारे में उन्होंने फेयर कहा?

उन्होंने लिखा, "जबकि पाकिस्तानियों ने अमेरिका की मदद करने में अमेरिका की विफलता की निंदा की (भारत-बांग्लादेश युद्ध के दौरान) जब संयुक्त राज्य अमेरिका के पास ऐसा करने का कोई दायित्व नहीं था, पाकिस्तान ने उसी अवधि के दौरान साम्यवादी चीन को खुश किया जब उसने उन समझौतों में शामिल होने पर जोर दिया जो साफतौर से साम्यवाद का मुकाबला करने के लिए बनाए गए थे."

पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में लंबे समय से अमेरिका के साथ दोहरा खेल खेला है. उसने खुद को एक प्रमुख सहयोगी बताया, साथ ही साथ उन आतंकवादी ग्रुप को शरण और समर्थन दिया है, जिनसे लड़ने का उसने वादा किया था. 2001 से अरबों की अमेरिकी सहायता पाने के बावजूद, पाकिस्तान ने तालिबान नेताओं और हक्कानी नेटवर्क का सुरक्षित पनाहगाह बना रहा, जिससे अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो बलों पर सीमा पार हमले संभव हो सके.

ये भी पढ़ें: 'US में आएगी कोरोना से भी बड़ी तबाही', अमेरिकी एक्सपर्ट ने चीन को लेकर कह दी बड़ी बात

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