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Exclusive: केजरीवाल ने बताया, बधाई देने वाले विपक्षी नेताओं को शपथ में क्यों नहीं बुलाया

मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि केजरीवाल अब मोदी विरोधी नहीं दिखना चाहते हैं. केजरीवाल कहते हैं ये बातें झूठी हैं. उन्होंने बताया कि पहले भी जब वे दो बार सीएम बने, तब भी किसी विपक्षी नेता को नहीं बुलाया.

नई दिल्ली: अरविंद केजरीवाल जीते, तो विपक्ष के सभी बड़े नेताओं ने उन्हें बधाई दी. सोनिया गांधी, शरद पवार, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे से लेकर अखिलेश यादव तक सभी ने उन्हें बधाई दी. किसी ने फोन कर शुभकामनाएं दी, तो कुछ नेताओं ने ट्वीट कर उन्हें बधाई दी. दिल्ली में कांग्रेस पार्टी को केजरीवाल ने तीसरे नंबर पर ढकेल दिया है. फिर भी कांग्रेस के नेता पार्टी की दुर्गति के बदले बीजेपी की हार पर गदगद हैं. दिल खोल कर केजरीवाल को बधाई दी गई. वैसे भी दिल्ली का चुनाव तो जैसे देश का चुनाव बन गया था. इतना हाई वोल्टेज प्रचार तो बीजेपी कभी कभार करती है. गृह मंत्री अमित शाह ने तो सब कुछ दांव पर लगा दिया था. इसीलिए जब बीजेपी हारी, तो पूरे विपक्ष इसमें अपने-अपने हिस्से की खुशियां ढूंढ ली.

रविवार को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में केजरीवाल तीसरी बार मुख्य मंत्री की शपथ लेंगे. विपक्ष के बड़े बड़े नेता इंतजार ही करते रह गए. सोचा था दिल्ली के शपथ ग्रहण में बुलाया जाएगा. मंच पर बीजेपी के खिलाफ दिग्गजों का जमावड़ा लगेगा.  सब मुस्कुराते हुए हाथ उठा कर फोटो खिंचायेंगें. ये संदेश जाएगा कि हम साथ साथ हैं. बीजेपी  के खिलाफ हम एकजुट हैं. अखबारों से लेकर टीवी न्यूज चैनलों की हेडलाइन होगी- मोदी के खिलाफ विपक्ष लामबंद. थोड़ी देर के लिए ही सही विपक्ष नेता आपसी मन मुटाव को गुडबाय कर देंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ना ऐसा होना था.

आखिर अरविंद केजरीवाल ने अपने शपथ में विपक्षों नेताओं को क्यों नहीं बुलाया ? इसका जवाब भी वे खुद ही देते हैं. उन्होंने तो ये फैसला पिछले लोकसभा चुनाव के बाद ही कर लिया था. चुनाव में आम आदमी पार्टी पिट गई थी. दिल्ली में खाता तक नहीं खुला. सबसे शर्मनाक तो ये रहा कि पार्टी को दिल्ली में कांग्रेस से भी कम वोट मिले. कहते हैं ना कि ठेस लगने से बुद्धि बढ़ती है. केजरीवाल ने हार से सबक लेते हुए अपनी रणनीति बदल ली. बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकता से उन्होंने तौबा कर ली. अपना काम, अपनी राजनीति का फॉर्मूला पकड़ लिया. इसीलिए तो दिल्ली के चुनाव में उन्होंने किसी की मदद नहीं ली. इसका फायदा भी रहा. दिल्ली में जीत का सारा क्रेडिट उनके नाम ही रहा.

याद करिए बेंगलुरू की उस फोटो को. मौका कुमारस्वामी सरकार के शपथ ग्रहण का था. मंच पर सोनिया, मायावती, ममता, अखिलेश, केजरीवाल और लेफ्ट के नेता साथ नजर आए थे. विपक्ष के सभी बड़े नेता मंच पर एकसाथ थे. बाद में कुमारस्वामी की सरकार चली गई. विपक्ष के नेता भी अपने अपने काम में जुट गए. यहां पांच साल पहले पटना की एक तस्वीर का भी जिक्र जरूरी है. नीतीश कुमार बिहार के मुख्य मंत्री की शपथ ले रहे थे. पटना के गांधी मैदान में भव्य मंच बना था. लालू यादव और नीतीश की जोड़ी ने चुनाव में बीजेपी को धूल चटा दी थी. कांग्रेस समेत विपक्षी बड़े नेताओं को बुलाया गया था. मंच पर लालू के ठीक बगल में अरविंद केजरीवाल खड़े तो जरूर थे. लेकिन बड़े अनमने तरीके से. नई राजनीति के प्रतीक केजरीवाल को चारा घोटाले के आरोपी लालू के साथ दिखना गलत लग रहा था.

उस पर भी लालू ने जबरदस्ती उनका हाथ पकड़ कर फोटो खिंचवाया. सोशल मीडिया में ये फोटो बहुत वायरल हुआ. केजरीवाल की लोगों ने जम कर खिल्ली उड़ाई. अब केजरीवाल इस तरह के फोटो सेशन से बचना चाहते हैं. उनका मानना है कि विपक्षी नेताओं को बुलाने से गलत मैसेज जाता है. लोग ये समझते कि उनमें राष्ट्रीय नेता बनने की महत्वाकांक्षा जग गई है. विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं की भीड़ में केजरीवाल खो जाते. वैसे भी दिल्ली की सात लोकसभा सीटों वाले सीएम को कोई बड़ा स्पेस तो मिलना नहीं है. पिछले सात आठ सालों में केजरीवाल ने राजनीति का गुणा भाग समझ और सीख लिया है. इसीलिए उन्होंने सिर्फ प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को ही शपथ ग्रहण में बुलाया.

अरविंद केजरीवाल अब बेंगलुरू और पटना की गलती दोहराना नहीं चाहते हैं. जिसमें उन्हें ना माया मिली, ना ही राम. अब वे अपनी लकीर खुद ही खींचना चाहते हैं. विपक्ष के नेताओं को ना बुलाने को लेकर मीडिया में जो खबरें आ रही हैं. केजरीवाल ने उसे मनगढ़ंत कहानी बताया है.

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