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तालिबान का क्या है देवबंद से कनेक्शन, जहां आज जाएंगे अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की?

अफगानिस्तान के तालिबान विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की 11 अक्टूबर को देवबंद के दारुल उलूम का दौरा करेंगे. यह केंद्र हनफी विचारधारा और तालिबान से जुड़ा विश्वविख्यात शिक्षण संस्थान है.

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की पहली बार भारत दौरे पर हैं. इस यात्रा के दौरान मुतक्की उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद कस्बे का भी दौरा करेंगे. 11 अक्टूबर को वे विश्व प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम, देवबंद का दौरा करेंगे और यहां के प्रबंधन और प्रमुख मौलानों से मुलाकात करेंगे.

देवबंद और तालिबान का कनेक्शन

देवबंद का नाम सिर्फ एक मदरसे के लिए नहीं, बल्कि एक विचारधारा के जन्मस्थान के रूप में भी जाना जाता है. 1866 में अंग्रेजों के शासन के दौरान स्थापित दारुल उलूम, देवबंद का उद्देश्य था इस्लामी शिक्षा को बाहरी प्रभावों से सुरक्षित रखना और कुरान-हदीस को उनके असली स्वरूप में पढ़ाना. यहीं से देवबंदी आंदोलन की शुरुआत हुई, जो धीरे-धीरे भारत से निकलकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तक फैल गई. इस तरह देवबंद विश्वस्तरीय इस्लामी शिक्षा केंद्र के रूप में उभरा.

तालिबान और देवबंद का क्या संबंध है?

पाकिस्तान में स्थित दारुल उलूम हक्कानिया, जिसे लोग तालिबान की पाठशाला कहते हैं, दारुल उलूम देवबंद की तर्ज पर बनाई गई थी. इसी मदरसे से तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर और अन्य नेता पढ़े हैं. हक्कानिया के फाउंडर मौलाना अब्दुल हक खुद देवबंद के छात्र थे और उनके बेटे सामी-उल-हक को दुनिया तालिबान का पिता कहती है.  इसका मतलब स्पष्ट है – तालिबान की धार्मिक और वैचारिक जड़ें देवबंद की मिट्टी से जुड़ी हुई हैं. देवबंद और तालिबान दोनों हनफ़ी फिकह पर आधारित हैं.

यह सुन्नी इस्लाम की चार प्रमुख विधियों में से एक है, जिसे 8वीं सदी में इमाम अबू हनीफ़ा ने स्थापित किया. हनफी फिकह तर्क और समझदारी पर जोर देती है और भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सबसे अधिक मान्य है. देवबंद ने हनफ़ी फिकह को अपनी शिक्षा की नींव बनाया और तालिबान ने अपने कानून और नियमों के लिए इसी पर आधार रखा. 

अब जब तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की भारत आए हैं उनका देवबंद दौरा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्व का भी है.  यह संकेत है कि तालिबान पाकिस्तान से हटकर भारत जैसे देशों के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है.  पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में हाल ही में तनाव बढ़ा है. सीमा विवाद, आतंकवादी घटनाएं और भरोसे की कमी के कारण. ऐसे में मुतक्की का भारत और देवबंद दौरा “Spiritual Diplomacy” यानी धार्मिक कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

मुतक्की का दौरा और तैयारियां

विदेश मंत्री मुतक्की 11 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक दारुल उलूम देवबंद में रहेंगे. इस दौरान उन्हें संस्थान परिसर का भ्रमण कराते हुए प्रमुख मौलानों से मुलाकात कराई जाएगी. उनके स्वागत के लिए दारुल उलूम प्रबंधन ने सफाई और नवीनीकरण का काम शुरू कर दिया है. परिसर स्थित विशाल गोलाकार पुस्तकालय में स्वागत समारोह का आयोजन किया जाएगा.

मुलाकात के दौरान मौलाना अरशद मदनी भी मौजूद रहेंगे. मुतक्की का संबोधन उर्दू भाषा में होगा और इस कार्यक्रम में दारुल उलूम के अन्य प्रमुख मौलानों को भी आमंत्रित किया गया है. सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस प्रशासन ने कड़े इंतजाम किए हैं और खुफिया विभाग भी हाई अलर्ट पर है.

दारुल उलूम की कब हुई स्थापना

दारुल उलूम, देवबंद केवल एक मदरसा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक इस्लामी शिक्षा और धार्मिक विचारधारा का केंद्र है. यहां न केवल धार्मिक शिक्षा दी जाती है, बल्कि यह देवबंदी विचारधारा का जन्मस्थान भी है, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम समाज की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक सोच को गहराई से प्रभावित किया.

इसकी स्थापना 31 मई 1866 को मौलाना मुहम्मद कासिम नानोत्वी, हाजी आबिद हुसैन और अन्य विद्वानों ने की थी. संस्था की शुरुआत एक पुरानी मस्जिद, मस्जिद छत्ता, से हुई थी.

देवबंद केवल इस्लामी शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि एक प्राचीन नगर भी है. माना जाता है कि इसका पुराना नाम ‘द्वैतवन’ था, जिसका उल्लेख महाभारत कालीन ग्रंथों में मिलता है. यह शहर धार्मिक विविधता का उदाहरण प्रस्तुत करता है. यहां मां बाला सुंदरी देवी मंदिर भी स्थित है, जो हिंदू समुदाय के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है. तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की का यह दौरा शैक्षिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

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