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आखिरी बार कोर्ट में बैठे चीफ जस्टिस गवई, कहा- हर पद देश की सेवा का अवसर, मैंने भी यही कोशिश की

सुप्रीम कोर्ट की परंपरा के मुताबिक शुक्रवार को सीजेआई बी आर गवई के सम्मान में सेरेमोनियल बेंच (औपचारिक विदाई बेंच) बैठी. इसमें उनके साथ अगले चीफ जस्टिस सूर्य कांत भी बैठे.

'मैं कानून के छात्र के रूप में आया और अब न्याय के छात्र के तौर पर विदा ले रहा हूं. मैं यह मानता हूं कि हर पद देश की सेवा का एक अवसर है. मैंने यही करने की कोशिश की.' 1985 में वकालत शुरू करने से लेकर न्यायपालिका के सर्वोच्च पद से सेवानिवृत्त होने के सफर को चीफ जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने इन शब्दों में याद किया. रविवार, 23 नवंबर को रिटायर हो रहे चीफ जस्टिस शुक्रवार को आखिरी बार बतौर जज कोर्ट में बैठे थे.

बौद्ध समुदाय के पहले जज
इस साल 14 मई को देश के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले जस्टिस गवई इस पद तक पहुंचने वाले अनुसूचित जाति वर्ग के दूसरे और बौद्ध समुदाय के पहले व्यक्ति थे. देश के 52वें चीफ जस्टिस गवई का जन्म 24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ. वह एक राजनीतिक परिवार से हैं. उनके पिता रामकृष्ण गवई एमएलसी, लोकसभा सांसद और 3 राज्यों के राज्यपाल रहे. सीजेआई बी आर गवई 2003 में बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बने थे. 24 मई 2019 को वह सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त हुए.

उदार रवैया पहचान
सुप्रीम कोर्ट की परंपरा के मुताबिक शुक्रवार को उनके सम्मान में सेरेमोनियल बेंच (औपचारिक विदाई बेंच) बैठी. इसमें उनके साथ अगले चीफ जस्टिस सूर्य कांत भी बैठे. इस दौरान तमाम वकीलों ने जस्टिस गवई की प्रशंसा में कई बातें कहीं. इन सभी बातों में जो बात सबसे ज्यादा उभर कर आई, वह थी जस्टिस गवई का उदार रवैया. सबने एकमत से कहा कि वह जिस सम्मान और अपनत्व के साथ वकीलों से पेश आए, वह याद रखा जाएगा.

जूता फेंकने वाले को माफ किया
अपने कार्यकाल के दौरान चीफ जस्टिस गवई की उदारता की सबसे बड़ी मिसाल तब देखने को मिली, जब उन्होंने अपनी तरफ जूता उछालने वाले एक वकील को माफ कर दिया. उन्होंने वकील के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का फैसला लिया. अनुसूचित जाति वर्ग से होने के बावजूद गवई लगातार एससी/एसटी वर्ग में भी क्रीमी लेयर की पैरवी करते रहे हैं. उन्होंने कई मौकों पर खुल कर कहा है कि इन वर्गों के जो लोग संपन्न हो चुके हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए.

प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का दिया जवाब
बतौर जज और सीजेआई, जस्टिस गवई का कार्यकाल कई बड़े फैसलों के लिए याद किया जाएगा. इसी सप्ताह उनकी अध्यक्षता वाली 5 जजों की बेंच न राष्ट्रपति की तरफ से भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का उत्तर दिया. इसमें साफ किया गया कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता.

वक्फ कानून पर रोक से मना किया
एक और अहम फैसले में चीफ जस्टिस गवई ने वक्फ संशोधन कानून पर रोक लगाने से मना किया. इससे इस कानून को लागू करने का रास्ता साफ हो गया. उनकी अध्यक्षता वाली बेंच ने दिल्ली में पटाखों पर लगी रोक हटाते हुए ग्रीन पटाखों की बिक्री की अनुमति दी. इसके चलते कई सालों बाद दिल्ली के लोगों ने इस बार दीवाली पर आधिकारिक रूप से पटाखे खरीद कर उन्हें चलाया.

बुलडोजर की रफ्तार थामी
पिछले साल उनकी अगुआई वाली बेंच ने बुलडोजर कार्रवाई को लेकर देशभर में लागू होने वाले नियम तय किए थे. कोर्ट ने निर्देश दिया था कि किसी संपत्ति पर कार्रवाई करने से पहले प्रभावित व्यक्ति को नोटिस देना जरूरी होगा और नोटिस और कार्रवाई के बीच कम से कम 15 दिन का अंतर होना चाहिए.

370 और नोटबंदी पर की सुनवाई
जस्टिस गवई उस बेंच के सदस्य रहे जिसने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने को सही ठहराया. जस्टिस गवई 2016 की नोटबंदी को संवैधानिक मान्यता देने वाली बेंच के भी सदस्य रहे. इन फैसलों के अलावा चुनावी चंदे से जुड़ी इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को रद्द करने वाले निर्णय में भी जस्टिस गवई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अवैध गिरफ्तारी से राहत
हाल ही में दिए एक फैसले में उन्होंने अवैध गिरफ्तारी से लोगों को राहत दी. उन्होंने कहा कि अगर गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तारी का कारण लिखित में नहीं बताया तो इस आधार पर उसे रिहा कर दिया जाएगा. उन्होंने पर्यावरण की रक्षा और वन्य प्राणियों के अधिकार से जुड़े भी कई आदेश दिए.

करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.
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