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Birthday Special: जानें आखिर क्यों लगता है बाबा साहब भीमराव के नाम के पीछे 'अंबेडकर'

अंबेडकर को 15 अगस्त, 1947 को देश के पहले देशी संविधान के निर्माण के लिए संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया. अंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था.

नई दिल्ली: 1930 का दशक जब देश आजाद नहीं हुआ था. महात्मा गांधी भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने के लिए सबसे बड़े स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे. उसी दौरान 41 साल का एक और नेता था जिसे सिर्फ एक ही चिंता सता रही थी और वो थी दलितों और हर पिछड़े वर्ग की जो सैकड़ों सालों से शोषित और वंचित थे. हम बात कर रहे हैं भारतरत्न डॉ भीमराव अंबेडकर की जिन्हें दलितों का मसीहा माना जाता है, जबकि असलियत में उन्होंने जीवन भर दलितों की नहीं, बल्कि समाज के सभी शोषित वर्गो के अधिकारों की लड़ाई लड़ी.

अंबावड़े गांव और अंबेडकर का संबंध

भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक एक गांव में हुआ था. इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था. इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे. ये अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे. ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था. भीमराव ने अपने एक ब्राह्मण दोस्त के कहने पर अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया, जो अंबावड़े गांव से प्रेरित था.

डॉ अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई. रमाबाई की मृत्यु के बाद इन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया. सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था. अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन साल 2003 में हुआ.

भारत के पहले कानून मंत्री थे डॉ भीमराव अंबेडकर

अंबेडकर की गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी. वे नौ भाषाओं के जानकार थे. इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं. इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं. अंबेडकर को 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के बाद देश के पहले देशी संविधान के निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया. फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ, 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया. कानूनविद् अंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था.

डॉड अंबेकर ने समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए सबसे ज्यादा महिलाओं की अशिक्षा को जिम्मेदार माना. इन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया. उनके सशक्तिकरण के लिए इन्होंने हिंदू कोड अधिनियम की मांग की. तब भारी विरोध के चलते वह पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में वही अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और हिंदू विशेष विवाह अधिनियम के नाम से 1956 में पारित हुआ. इससे हिंदू महिलाओं को मजबूती मिलती थी.

सिर्फ दलितों के नहीं पिछड़ों-वंचितों के भी थे मसीहा

बाबा साहेब ने सिर्फ अछूतों के अधिकार के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के पुनर्निर्माण के लिए प्रयासरत रहे. उन्होंने मजदूर वर्ग के कल्याण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया. पहले मजदूरों से प्रतिदिन 12-14 घंटों तक काम लिया जाता था. इनके प्रयासों से प्रतिदिन आठ घंटे काम करने का नियम पारित हुआ.

इसके अलावा इन्होंने मजदूरों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुआवजा आदि सुधार भी इन्हीं के प्रयासों से हुए. उन्होंने मजदूरों को राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्रेरित किया. वर्तमान के लगभग सभी श्रम कानून बाबा साहेब के ही बनाए हुए हैं. बाबा साहेब कृषि को उद्योग का दर्जा देना चाहते थे. उन्होंने कृषि का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया. राष्ट्रीय झंडे में अशोक चक्र लगाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है. ये अकेले भारतीय हैं, जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्‍स के साथ लगी है. साल 1948 में डॉ अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित हो गए. छह दिसंबर, 1956 को इनका निधन हो गया.

डॉ अंबेडकर को देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले. इनके निधन के 34 साल बाद वर्ष 1990 में जनता दल की वी.पी. सिंह सरकार ने इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया था. इस सरकार को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) बाहर से समर्थन दे रही थी. वीपी सिंह ने जब वीपी मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दलितों, पिछड़ों को आरक्षण का अधिकार दिया, तब बीजेपी ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी थी और सवर्ण युवाओं को आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह के लिए उकसाया था. देशभर में कई युवकों ने आत्मदाह कर लिया था और जातीय दंगे हुए थे, जिसे 'मंडल-कमंडल विवाद' नाम दिया गया था.

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