8 हफ्ते के लिए टली अयोध्या पर सुनवाई, कोर्ट की सलाह- पक्ष आपसी सहमति से हल निकालने की करें कोशिश
सुनवाई के दौरान 5 जजों की बेंच ने एक बेहद अहम सुझाव दिया. कोर्ट ने कहा कि मामले का हल आपसी सहमति से निकालने की कोशिश होनी चाहिए.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद पर सुनवाई 8 हफ्ते के लिए टल गई है. कोर्ट ने कहा है कि सुनवाई तभी हो सकती है जब सभी पक्ष दस्तावेजों के उपलब्ध अनुवाद पर सहमति जताएं. इसलिए, सभी पक्ष यूपी सरकार की तरफ से दिए गए अनुवाद को 6 हफ्ते में देखें. अगर किसी हिस्से पर एतराज़ हो तो बताएं. इसके बाद आगे की रूपरेखा तय की जाएगी.
मध्यस्थता पर अगले हफ्ते आदेश संभव सुनवाई के दौरान 5 जजों की बेंच ने एक बेहद अहम सुझाव दिया. कोर्ट ने कहा कि मामले का हल आपसी सहमति से निकालने की कोशिश होनी चाहिए. बेंच के सदस्य जस्टिस एस ए बोबडे ने कहा, "हम मध्यस्थता पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. अगर मामले से जुड़े पक्षों के साथ बैठने से समाधान की 1 फीसदी भी गुंजाइश है, तो ऐसा ज़रूर होना चाहिए."
बेंच के इस सुझाव पर कोर्ट में मौजूद पक्षों की प्रतिक्रिया ज़्यादा सकारात्मक नहीं रही. रामलला विराजमान के वकील सी एस वैद्यनाथन और हिंदू पक्ष के एक और वकील रंजीत कुमार ने कहा कि इससे कुछ नहीं होगा. मध्यस्थता की कई कोशिशें असफल हो चुकी हैं. कोर्ट सुनवाई कर मामले पर फैसला दे. मुस्लिम पक्ष के वकीलों राजीव धवन और दुष्यंत दवे ने भी मध्यस्थता की सफलता पर शक जताया. लेकिन उनका कहना था कि अगर बंद कमरे में गंभीरता से चर्चा हो, इस दौरान हुई बातों को मीडिया में लीक न किया जाए तो हो सकता है कि कुछ नतीजे निकलें.
बाद में बेंच की तरफ से आदेश लिखवाते हुए चीफ जस्टिस ने कहा, "हमारी सोच ये है कि 8 हफ्ते के समय का इस्तेमाल आपसी चर्चा के लिए हो तो अच्छा रहेगा. कुछ पक्ष तैयार नज़र आ रहे हैं, कुछ नहीं. अगले मंगलवार को हम सिर्फ इसी पहलू पर बात करने के लिए बैठेंगे. अगर सही लगा तो अपनी कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हम किसी मध्यस्थ की नियुक्त कर देंगे."
अनुवाद पर विवाद इससे पहले अनुवाद को लेकर कोर्ट में तीखी बहस हुई. चीफ जस्टिस ने इस मसले पर अपने रजिस्ट्रार की रिपोर्ट सभी पक्षों को दी और कहा, "हमें बताया गया है कि यूपी सरकार सभी दस्तावेजों का अनुवाद जमा करवा चुकी है. अगर सभी पक्ष चाहें तो हम कार्रवाई को आगे बढ़ा सकते हैं." मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने तुरंत कहा, "हम अभी कुछ नहीं कह सकते. हमें दस्तावेज देखने के लिए 8 से 12 हफ्ते का वक्त दिया जाए." यूपी सरकार और हिंदू पक्ष के वकीलों ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका कहना था कि 4 साल से सबको पता है कि अनुवाद का काम यूपी सरकार करवा रही है. 5 दिसंबर 2017 को कोर्ट ने साफ आदेश दिया कि अगली सुनवाई में सभी पक्ष इस अनुवाद के हिसाब से बहस की तैयारी कर के आएं. इतने दिनों के बाद भी मुस्लिम पक्ष फिर केस को टलवाने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि, चीफ जस्टिस ने ये कहते हुए मुस्लिम पक्ष को 6 हफ्ते दे दिए कि बिना सबकी सहमति के सुनवाई करना सही नहीं होगा. इस तरह मामला 8 हफ्ते के लिए टल गया. कोर्ट के रुख को देखते हुए यही लगता है कि वो अगले हफ्ते मध्यस्थता का आदेश दे देगा. अगर तय समय सीमा में मध्यस्थता से कोई हल निकल सका तो कोर्ट उसे औपचारिक आदेश की शक्ल दे देगा. अगर हल नहीं निकला या अनुवाद को लेकर ज़्यादा एतराज़ हुआ तो मामला एक बार फिर लंबे समय के लिए टल सकता है.
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