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Explained: देशभर के राजभवन बने 'लोकभवन', कैसे विपक्षी राज्यों में राज्यपाल-सीएम टेंशन खत्म होगी, बीजेपी की मंशा क्या है?

ABP Explainer: देशभर के राजभवनों को अब 'लोकभवन' कहा जाएगा. यानी राज्यपाल अब लोकपाल का काम भी करेंगे. जनसुनवाई होगी और बैठकें होंगी. लेकिन अचानक इतना बड़ा बदलाव करने की जरूरत क्या पड़ गई?

बीते 11 सालों में बीजेपी सरकार ने सैकड़ों शहरों के नाम बदल दिए. इलाहाबाद को प्रयागराज कर दिया, तो होशंगाबाद को नर्मदापुरम. नाम बदलने की राजनीति सिर्फ शहरों पर खत्म नहीं होती, क्योंकि अब प्रदेश के सबसे ऊंचे सरकारी आवास 'राजभवन' का नाम बदलने का वक्त आ गया है. अब देशभर के 28 राजभवनों को 'लोकभवन' कहा जाएगा. इसकी शुरुआत हुई पश्चिम बंगाल से. ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि राजभवन का नाम बदलने से क्या-क्या बदलेगा, इसके पीछे बीजेपी की स्ट्रैटजी क्या और राजभवनों का इतिहास क्या रहा है...

सवाल 1- राजभवनों के नाम बदलकर 'लोकभवन' रखने का पूरा मामला क्या है?
जवाब- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 25 नवंबर 2025 को सभी राज्यों के राज्यपालों को चिट्ठी लिखकर कहा था कि राजभवन को 'लोकभवन' और केंद्र शासित प्रदेशों के राजनिवास को 'लोकनिवास' नाम दो. मंत्रालय ने कहा था कि राज्यपाल खुद नोटिफिकेशन जारी करें और यह धीरे-धीरे लागू होगा. 1 दिसंबर तक 4 राज्यों यानी पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और केरल में यह आधिकारिक रूप से लागू हो चुका है. बाकी जगहों पर प्लानिंग चल रही है, लेकिन नोटिफिकेशन या बोर्ड चेंज नहीं हुआ.

  • पश्चिम बंगाल: सबसे पहले यहां लागू हुआ. 29 नवंबर 2025 को राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस ने कोलकाता राजभवन, दार्जिलिंग राजभवन और बैरकपुर फ्लैगस्टाफ हाउस का नाम बदलकर 'लोकभवन' कर दिया. बोस ने खुद पुराना बोर्ड हटाया और नया लगाया. नोटिफिकेशन तुरंत प्रभाव से जारी कर दिया गया है.
  • केरल: 1 दिसंबर 2025 से राजभवन को आधिकारिक रूप से 'लोकभवन' कर दिया. राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने 30 नवंबर को नोटिफिकेशन जारी किया था, यानी तिरुवनंतपुरम का राजभवन अब 'लोकभवन, केरल' कहलाएगा. अर्लेकर ने 2024 के गवर्नर्स कॉन्फ्रेंस में ही ये सुझाव दिया था.
  • त्रिपुरा: राज्यपाल इंद्रसेना रेड्डी नल्लू ने 30 नवंबर को ऐलान किया कि अगरतला राजभवन अब 'लोकभवन' होगा. नोटिफिकेशन 1 दिसंबर से प्रभावी हो चुका है.
  • असम: 28 नवंबर को राज्यपाल लक्ष्मण आचार्य ने नोटिफिकेशन जारी कर राजभवन का नाम 'लोकभवन' की घोषणा की.

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे बाकी 24 राज्यों में भी यह धीरे-धीरे लागू हो जाएगा. गृह मंत्रालय दिसंबर अंत तक ज्यादा से ज्यादा राजभवनों के नाम बदलना चाहता है.

सवाल 2- राजभवन का नाम 'लोकभवन' होने से क्या-क्या बदल जाएगा?
जवाब- यह बदलाव केंद्र सराकर के एक सर्कुलर से शुरू हुआष लेकिन हर राज्य में राज्यपाल खुद लागू कर रहे हैं...

  • राज्यपाल के नोटिफिकेशन के बाद एड्रेस बदल जाएगा (जैसे लोकभवन, केरल). लेटरहेड, वेबसाइट और सोशल मीडिया अपडेट होंगे. त्रिपुरा में कहा गया कि सभी पेपर और साइन बोर्ड भी बदलेंगे.
  • राज्यपाल खुद समारोह करेंगे, जिससे लोग को खुद जोड़ा जा सके. गृह मंत्रालय चेक करेगा कि कितने राज्य लागू कर रहे हैं.
  • सबसे बड़ा जमीनी बदलाव है कि अब लोग लोकभवन में जा सकेंगे. पहले राजभवन सुनते ही डर लगता था कि यह राजा का महल जैसा है, लेकिन अब लोकभवन लोगों का घर बनेगा.
  • संवैधानिक जगहें ज्यादा एक्सेसिबल होंगी. लेकिन सिक्योरिटी की वजह से पूरा नहीं खुलेगा.
  • आम नागरिक राज्यपाल से घंटों मिल सकेंगे और अपनी शिकायतें लिखवा सकेंगे. राज्यपालों का काम भी थोड़ा बदलेगा, यानी वह खुद शिकायत कमेटी चलाएंगे.

सवाल 3- राजभवन के नाम बदलने की शुरुआत पश्चिम बंगाल से ही क्यों हुई?
जवाब- एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बंगाल से शुरुआत इसलिए क्योंकि 2026 चुनाव नजदीक हैं. TMC कहा, 'पूरे देश का नोटिफिकेशन, लेकिन बंगाल पहले क्यों? चुनावी गिमिक.' बीजेपी इसे ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप बता रही है. राज्यपाल बोस ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की 2023 वाली 'चाबी सौंपने' वाली घटना को जोड़ा है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ममता बनर्जी को राजभवन की चाबी दी थी, ताकि यह जगह आम लोगों के लिए खुली रहे.

अगर यह कामयाब रहा, तो विपक्षी राज्यों में राज्यपाल लोकल हीरो बनेंगे, जिससे वोट शिफ्ट होंगे. लेकिन अगर शिकायतें अनसुलझी रहीं, तो बैकलैश होगा. जैसे स्टालिन ने इसे शोबाजी कहा. कुल मिलाकर यह राजनीतिक मूव है, जो 2026-27 में होने वाले चुनावों को प्रभावित करेगा.

सवाल 4- 'लोकभवन' नाम के पीछे बीजेपी की असल राजनीति क्या है?
जवाब- पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह नाम का बदलाव सतही तौर पर तो सिर्फ बोर्ड या कागजों का खेल लगता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है क्योंकि बीजेपी कोई भी फैसला यूं ही नहीं लेती. दरअसल बीजेपी की रणनीति 'विकसित भारत' के नाम पर राज्यपालों को 'लोगों का चेहरा' बनाने की कोशिश तो है ही, लेकिन यह विपक्षी राज्यों में केंद्र की पकड़ मजबूत करने का हथियार है...

1. राज्यपालों को जनता का दोस्त बनाने की स्ट्रैटजी

  • 'लोकभवन' नाम से राज्यपाल अब खुद को लोकतंत्र का रखवाला बताएंगे, न कि केंद्र का एंजेट. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस ने 29 नंवबर 2025 को ही 'लोक चर्चा' प्रोग्राम शुरू किया, जहां हर हफ्ते गावों में जाकर लोग अपनी शिकायतें रख सकेंगे. बोस ने कहा, 'यह भवन अब डर का नहीं, उम्मीद का दरवाजा बनेगा. हिंसा, बाढ़ या अत्याचार की शिकायतों पर फौरन मदद मिलेगी.'
  • असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने भी 29 नवंबर को कहा कि लोकभवन असम से पारदर्शिता बढ़ेगी और जनसेवा नई ऊर्जा पाएगी.
  • त्रिपुरा के राज्यपाल नल्लू ने 1 दिसंबर से आम लोगों को घंटों में मिलने का ऐलान किया, ताकि 'राजा का महल' वाली पुरानी इमेज टूट जाए.
  • पहले राजभवन दूर का सपना था, जहां अपॉइंटमेंट के बिना घुसना मुश्किल था. अब् कोलकाता में पहले हफ्ते ही 300 से ज्यादा लोग बिना गेट पास के आए और अपनी शिकायतें रखीं. लद्दाख में लेफ्टिनेंट गवर्नर कविंदर गुप्ता ने 30 नंवबर को कहा, 'यह पीपुल्स सेंट्रिक गवर्नेंस है.' लेकिन हकीकत यह है कि यह बदलाव छोटा-मोटा ही रहेगा.
  • राज्यपाल की संवैधानिक पावर जैसे बिल रोकना वैसी ही रहेगी. तो शिकायत सुनना तो ठीक है, लेकिन अमल का क्या होगा? वो केंद्र की मर्जी पर डिपेंड करेगा. असल में यह लोकल लेवल पर राज्यपालों की पॉपुलैरिटी बढ़ाएगा, जैसे बोस बंगाल में 'हीरो' बन रहे हैं.

2. केंद्र-राज्य टेंशन में नया हथियार

  • यह बदलाव 2024 के गवर्नर्स कॉन्फ्रेंस से निकला, जहां तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि की कमेटी ने सुझाया कि नाम बदलकर राज्यपालों को 'जनता का चेहरा' बनाओ. लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि त्रिपुरा और असम जैसे बीजेपी वाले राज्य में यह आसानी से चला, लेकिन पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे विपक्षी राज्यों में यह केंद्र की 'इंटरफेयरेंस' लग रहा है. TMC के कुणाल घोष ने 30 नवंबर को कहा, 'राज्य सराकर से बिना पूछे नाम बदला, जो पैरलल एडमिनिस्ट्रेशन चलाने की साजिश है.'
  •  तमिलनाडु सीएम एम.के. स्टालिन ने 30 नवंबर को X पर लिखा, 'नाम बदलने से क्या होगा? माइंडसेट बदलो. विधानसभा का सम्मान करो, बिल मत रोको.'
  • 1 दिसंबर को केरल के सीएम पिनरई विजयन ने कहा, 'यह दिखावा है, असली संघवाद कहां है. हकीकत में यह बदलाव राज्यपाल-सीएम टकराव को भड़काएगा.' सोशल मीडिया पर तो यह डिबेट भी चल रही है कि राज्यपाल अब लोकपाल बन जाएंगे.

3. लोकतंत्र की जड़ों में बदलाव

  • गृह मंत्रालय के 25 नवंबर के मेमो में साफ लिखा है, 'यह नाम बदलाव डेमोक्रेसी की भागीदारी बढ़ाएगा, संवैधानिक जगहें ज्यादा पब्लिकली एक्सेसिबल होंगी.' लेकिन राजनीतिक नजर से देखो तो यह 'डि-कॉलोनियल (औपनिवेशिक हटाना)' का बहाना है. पहले राजभवन सुनते ही ब्रिटिश राज की याद आती थी, अब लोकभवन से राज्यपाल खुद को पीपल्स रिप्रेजेंटेटिव बताएंगे, जो संविधान की भावना से मैच करता है.
  • लेकिन हकीकत में राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है, तो यह नाम बदलवा संघवाद को कमजोर कर सकता है.
  • लंबे समय में यह इंस्टीट्यूशनल कल्चर बदलेगा, लेकिन कल्चरल इवेंट्स और ओपन मीटिंग्स से लोग जुड़ेंगे. केरल में 7 दशक बाद यह बदलाव आया है, जो पीपल्स हाउस वाली सोच लाएगा. लेकिन अगर राज्यपाल बिल रोकते रहेंगे, तो नाम का फायदा उल्टा पड़ेगा. कुल मिलाकर , यह बदलाव लोकतंत्र को मजबूत करने का मौका है, लेकिन सेंट्रलाइजेशन का भी खतरा है.

सवाल 5- भारत में राज्यपाल के निवास को राजभवन क्यों कहा जाता है, इतिहास क्या है?
जवाब- भारत में राजभवन की शुरुआत 18वीं-19वीं शताब्दी में हुई. जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में बड़े-बड़े प्रांत बनाए, तो हर प्रांत में अपने गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर को भव्य महलनुमा घर दिए गए. इन घरों को अंग्रेजी में 'गवर्नमेंट हाउस' कहा जाता था. लेकिन बोलचाल और आधिकारिक कागजों में इन्हें राजभवन भी लिखा जाने लगा क्योंकि पूरा भारत उस समय ब्रिटिश राज कहलाता था.

1947 में आजादी के बाद प्रांतों को राज्य बना दिया गया. ब्रिटिश गवर्नर की जगह भारतीय गवर्नर आ गए. लेकिन वो भव्य ब्रिटिश कालीन महल तो पहले से बने हुए थे, उन्हें तोड़ना या नया बनाना बहुत महंगा और बेकार था. इसलिए उन्हें पुराने गवर्नमेंट हाउस को ही राज्यपाल का आधिकारिक निवास बना दिया और नाम भी वही रखा गया 'राजभवन'. हालांकि, 'राज' शब्द का इस्तेमाल 'राज्य का भवन' कर दिया, जिसका मतलब उस राज्य सरकार का सबसे ऊंचा सरकारी भवन. 1950 के संविधान में भी इसे राजभवन ही लिखा गया. तब से आज तक इसे राजभवन ही कहा जाता रहा है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर (एबीपी लाइव- हिंदी) अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इससे पहले दो अलग-अलग संस्थानों में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी. जहां वे 5 साल से ज्यादा वक्त तक एजुकेशन डेस्क और ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. वे बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को भी लीड कर चुके हैं. ज़ाहिद देश-विदेश, राजनीति, भेदभाव, एंटरटेनमेंट, बिजनेस, एजुकेशन और चुनाव जैसे सभी मुद्दों को हल करने में रूचि रखते हैं.

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