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सूरह यासीन को बरकत की चाबी क्यों कहा गया है, जानें इसका रहस्य

Surah Yaseen Benefits: सूरह यासीन, जिसे "कुरआन का दिल" और "बरकत की चाबी" कहा जाता है. वह दिल और रूह को सुकून देती है, घर-परिवार में बरकत लाती है और आखिरत के सफर को भी आसान बनाती है.

Surah Yaseen Benefits: इंसानी जिंदगी हमेशा आसान नहीं होता. कभी पैसों की कमी, कभी बीमारी, कभी घर की टेंशन तो कभी रोजगार की मुश्किलें इंसान को थका देती हैं. ऐसे वक्त में लोग अलग-अलग जगह सहारा ढूंढते हैं, लेकिन असली सुकून और राहत कुरआन की तालीमात में मिलती है.

इन्हीं तालीमात में एक खास सूरह है–सूरह यासीन, जिसे "कुरआन का दिल" कहा जाता है. कहा जाता है कि यह सूरह सिर्फ तिलावत का सवाब ही नहीं देती बल्कि इंसान की परेशानियों को आसान करने का जरिया भी बनती है. यही वजह है कि इसे "बरकत की चाबी" कहा जाता है. आइए जानते हैं वो छुपा सच जिसने लाखों लोगों की सोच बदल दी.

"कुरआन का दिल" क्यों है खास?
उलमा का कहना है कि कुरआन की हर सूरह अपनी जगह पर अहमियत रखती है, लेकिन सूरह यासीन का मुकाम सबसे अलग है. हादीसों में भी इसे "कुरआन का दिल" कहा गया है. जैसे इंसान के जिस्म से दिल निकाल दिया जाए तो वह जिंदा नहीं रह सकता, उसी तरह कुरआन की तालीमात से सूरह यासीन की अहमियत सबसे ज्यादा है.

इस सूरह में ऐसे पैगाम हैं जो सीधे दिल तक असर करते हैं और इंसान की सोच और ईमान को मजबूत बनाते हैं. उलमा बताते हैं कि खासकर इस सूरह की शुरूआती तीन आयतें बेहद अनोखी हैं. इन तीन आयतों का जो मजमून (मतलब) है, वह पूरे कुरआन में कहीं और नहीं मिलता.

बाकी की आयतें कुरआन की दूसरी सूरहों की तरह ही हैं, जिसमें अहकाम (कायदे-कानून), हलाल-हराम और जिंदगी के उसूल बताए गए हैं. लेकिन शुरू की तीन आयतें इतनी खास और अलग हैं कि उन्होंने सूरह यासीन को यह ऊंचा मुकाम दिलाया. यही वजह है कि  इसे "कुरआन का दिल" कहा जाता है.

सूरह यासीन पढ़ने के फायदे 
सूरह यासीन पढ़ने के बेशुमार फायदे बताए गए हैं. इसलिए कहा गया है कि इंसान को कोशिश करनी चाहिए कि वह रोजाना इसे तिलावत करे. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हर चीज का एक दिल होता है, और सूरह यासीन कुरआन का दिल है.

हदीस में आता है कि जो शख्स एक मर्तबा यासीन शरीफ पढ़ेगा, अल्लाह तआला उसे ऐसा सवाब देंगे जैसे उसने दस बार पूरा कुरआन शरीफ पढ़ा हो. यानी इस सूरह की तिलावत न सिर्फ बरकत और रहमत का जरिया है बल्कि बहुत बड़ा अज्र भी दिलाने वाली है.

मुसीबतों से निकलने का रास्ता 
जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब हालात हमारे हाथ से निकल जाते हैं. इंसान दावा करता है, मेहनत करता है, कोशिश भी करता है, लेकिन नतीजा उम्मीद के मुताबिक नहीं  मिलता. ऐसे में अक्सर इंसान टूट जाता है.

इस्लाम की तालीमात कहती हैं कि सूरह यासीन पढ़ने से मुश्किलें आसान होने लगती हैं. बहुत से लोग बताते हैं कि इस सूरह की तिलावत ने उनकी ऐसी परेशानियां हल कर दीं जिन्हें वो पहले नामुमकिन समझते थे.

दिल और रूह को सुकून 
सूरह यासीन का फायदा सिर्फ परेशानियां आसान करना ही नहीं है, बल्कि इसका सबसे बड़ा असर दिल को सुकून और चैन देना है. जब इंसान मायूस और बेचैन होता है तो उसका दिमाग उलझ जाता है, सही फैसले लेना मुश्किल हो जाता है और वह दिक्कतों में फंस भी जाता है. लेकिन कुरआन की तिलावत, खासकर सूरह यासीन पढ़ने से इंसान के दिल को तसल्ली के साथ नई उम्मीद और हिम्मत भी मितली है. यही सुकून उसे हर मुश्किल का सामना करने की ताकत देता है.

"बरकत की चाबी" क्यों कहा जाता है?
सूरह यासीन की तिलावत को घर और कारोबार में बरकत लाने का जरिया भी माना जाता है. बहुत से लोग इसे सुबह-सुबह पढ़ना अपनी आदत बना लेते हैं, ताकि पूरे दिन अल्लाह की रहमत उन पर बनी रहे.

लोगों का कहना है कि जहां सूरह यासीन पढ़ी जाती है, वहां सुकून भी मिलती है और घर-परिवार में मोहब्बत और बरकत भी बढ़ती है. यही वजह है कि इसे "बरकत की चाबी" कहा जाता है– जैसे चाभी ताला खोल देती है, वैसे ही यह सूरह परेशानियों के ताले खोल देती है.

दुनिया से आखिरत तक रहमत 
सूरह यासीन का फायदा सिर्फ दुनिया की परेशानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान के आखिरत के सफर में भी मददगार साबित होती है. हदीसों में आता है कि अगर मरते वक्त किसी शख्स के पास सूरह यासीन पढ़ी जाए तो उसकी मौत का सफर आसान हो जाता है.

यानी यह सूरह इंसान का साथ सिर्फ जिंदगी में ही नहीं देती, बल्कि मौत और उसके बाद के सफर में भी रहमत बनकर काम आती है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में छोटा-सा गांव है तिलबिहता, जहां 22 साल की कहकशां परवीन रहती हैं. पढ़ाई की शौक कहकशां अपने सपने पूरे करने के लिए लगातार मेहनत कर रही हैं. 25 मार्च 2003 के दिन तिलबिहता गांव में अपनी जिंदगी का सफर शुरू करने वाली कहकशां के पिता मोहम्मद जिकरुल्लाह बिजनेसमैन हैं तो मां नजदा खातून हाउसवाइफ हैं. भाई आमिर आजम, बहन उजमा परवीन, जेबा परवीन, सदफ परवीन और दरख्शां परवीन को वह अपनी ताकत मानती हैं. वहीं, उनकी सबसे अच्छी दोस्त सान्या कुमारी हैं. 

तिलबिहता के ओरेकल पब्लिश स्कूल से स्कूलिंग करने के बाद कहकशां ने हरदी के आरकेएसपी अकैडमी हाई स्कूल से मैट्रिक किया तो जैतपुर स्थित एसआरपीएस कॉलेज से इंटर पास किया. मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन (BMC) करने वाली कहकशां को अब अपने फाइनल रिजल्ट का इंतजार है. 

कहकशां की जिंदगी में पढ़ाई के साथ-साथ कई शौक हैं, जो उनकी दिनचर्या को रोचक बनाते हैं. अपने आसपास की खूबसूरत चीजों को कैमरे में कैद करने में माहिर कहकशां को खबरें पढ़ना और पेंटिंग बनाना बेहद पसंद है. इसके अलावा वह खाना बनाना, नमाज पढ़ना, रील्स देखना, गाना सुनना और कॉमेडी वीडियो देखना भी पसंद करती हैं. 

फिल्म संजू का 'कर हर मैदान फतेह' गाना हर मुश्किल वक्त में उन्हें हिम्मत देता है तो आमिर खान, शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय बच्चन उनके पसंदीदा सेलेब्स हैं. वहीं, फिल्म चक दे इंडिया से उन्हें कुछ कर दिखाने की प्रेरणा मिलती है. एमएस धोनी, विराट कोहली और सचिन तेंदुलकर उनके फेवरेट क्रिकेटर्स हैं. वहीं, सुबह का वक्त और सर्दी का मौसम उन्हें बेहद पसंद है. कहकशां फोटोग्राफी के जरिए लोगों की कहानियां बयां करना चाहती हैं, जिसके लिए वह लगातार मेहनत कर रही हैं.

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