Ashadha Vinayak Chaturthi katha:आषाढ़ विनायक चतुर्थी व्रत से एक राजा ने पाई असंभव कार्य पर विजय, पूजा में पढ़ें ये कथा
Ashadha Vinayak Chaturthi 2026:आषाढ़ विनायक चतुर्थी व्रत धन, करियर और उन कार्यों पर विजय दिलाता है जिन पर कामयाबी पाना असंभव हो. यहां देखें इस व्रत की संपूर्ण कथा.

Ashadha Vinayak Chaturthi Katha: आज गणेश जी की प्रिय आषाढ़ अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी व्रत है. इस व्रत के प्रभाव से गणपति जी की कृपा प्राप्त होती है और असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. पूजा में कथा का श्रवण जरुर करेंं. इसके बिना पूजन अधूरा माना जाता है. यहां देखें आषाढ़ विनायक चतुर्थी व्रत की संपूर्ण कथा.
आषाढ़ विनायक चतुर्थी कथा
वशिष्ठ मुनि राजा दशरथ से बोले मैथिल प्रदेश में गण्डकी नामक एक महानगर था. उस नगर में भद्रसेन नाम के राजा राज्य करते थे. वे राजा समस्त प्रकार के आयुधों में कुशल एवं युद्ध विद्या में निपुण थे. वे अपनी वीरता एवं पराक्रम से अन्य राज्यों को जीत लेते थे, अतः सम्पूर्ण भूलोक पर उनका ही शासन था. राजा भद्रसेन सदैव जप, तप, दान, यज्ञादि धर्म-कर्मों में तत्पर रहते थे तथा देवताओं एवं ब्राह्मणों के प्रिय थे.
राजा भद्रसेन का शासन समस्त भूमण्डल पर होने के कारण अन्य सभी राजा उनके अधीन थे तथा समयानुसार उन्हें कर प्रदान करते थे. राजा भद्रसेन अनन्त सेना के स्वामी थे. परन्तु हे राजन्! एक समस्या ने राजा भद्रसेन को व्याकुल कर दिया था.
एक समय राजा भद्रसेन के राज्य में तोते, मूषक तथा विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगों ने विशाल सङ्ख्या में आक्रमण कर दिया. अपार सङ्ख्या में वे सभी जीव बलपूर्वक राज्य में अन्न एवं वस्त्र आदि वस्तुओं को नष्ट करने लगे. राजा ने उनसे मुक्ति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयास किये तथा अनेक कीट-पतंगों एवं चूहों आदि को अग्नि-शस्त्र से भस्म करवा दिया. किन्तु वह जीव इतनी अधिक सङ्ख्या में थे कि अत्यन्त शीघ्रता से पुनः अन्य जीव उत्पन्न हो जाते थे, यह देखकर राजा हतप्रभ रह गये.
सम्पूर्ण राज्य में प्रत्येक स्थान पर कीट-पतंगे, छिपकली आदि विषैले कीट विचर रहे थे. नाना प्रकार के प्रयास करने पर भी जब कीटों के प्रकोप से मुक्ति प्राप्त नहीं हुयी, तो व्याकुल होकर उसने वन जाने का निश्चय किया. राजा ने व्यथित मन से वन में अन्न का त्याग कर दिया. राजा निराहार होकर वन में तपस्या करने लगे तथा भगवान शिव के ध्यान में लीन होकर रौद्रभाव से उनका पूजन किया.
एक साल बीत जाने के बाद दैवयोग से महर्षि बकदाल्भ्य उस वन में उपस्थित हुये. वन में भ्रमण करते हुये महर्षि बकदाल्भ्य ने राजा भद्रसेन को तपस्या में लीन देखा. राजा ने मुनिवर से पूछा मेरे राज्य में मूषक, कीट-पतंगे तथा तोते आदि जीव अत्यन्त पीड़ित कर रहे हैं. वे मेरे राज्य के अन्न, वस्त्र तथा मनुष्यों का भक्षण कर रहे हैं. अनेक उपाय के बाद भी इस समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ. इसी दुख के कारण मैं राज्य त्यागकर वनवास कर रहा हूँ. आप मुझे इस सङ्कट का समाधान बताने की कृपा करें.
राजा भद्रसेन के वचन सुनकर महर्षि बकदाल्भ्य ने कहा मुझे भगवान शिव ने ही यहाँ तुम्हारे लिये भेजा है. वर्तमान में तुम्हारे राज्य से चतुर्थी नामक व्रत समाप्त हो गया है. चतुर्थी व्रत के लोप के कारण ही तुम इस विघ्न से ग्रसित हुये हो. इसीलिये तुम्हारी प्रजा में भय व्याप्त हो गया है, क्योंकि दुष्ट राजा के राज्य करने पर अवश्य ही प्रजा भय से व्याकुल हो जाती है.
चतुर्थी व्रत के लोप के कारण तुम नरक में जाओगे. इसीलिये तुम्हें सम्पूर्ण प्रजा सहित सदैव चतुर्थी व्रत का पालन करना चाहिये, क्योंकि यह व्रत चारों पुरुषार्थ प्रदान करता है तथा समस्त विघ्नों को नष्ट करता है. तुमने चतुर्थी व्रत का पालन नहीं किया तो तुम्हारे द्वारा किये हुये सभी कर्म निरर्थक हो जायेंगे तथा तुम चारों पुरुषार्थों, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष से हीन हो जाओगे.
राजा ने सम्पूर्ण प्रजा सहित भक्तिपूर्वक आषाढ़ शुक्लपक्ष में उस चतुर्थी के उत्तम व्रत को किया तो उसके राज्य में तोते, मूषक, छिपकली तथा कीट-पतंग आदि सब नष्ट होने लगे. कीट-पतंगों के नष्ट होते ही सम्पूर्ण प्रजा धन-धान्य से सम्पन्न हो गयी तथा सभी लोग स्वस्थ हो गये. समस्त कष्टों से मुक्त होकर सभी आनन्दपूर्वक स्वानन्दवासी एवं ब्रह्मभूत हो गये.
राजा भद्रसेन अपने राज्य का कार्यभार पुत्र को सौंपकर पत्नी सहित वन में चले गये तथा अनन्य रूप से भगवान गणेश का भजन करने लगे. हे राजन्! अन्त में राजा अपनी पत्नी सहित स्वानन्दवासी होकर ब्रह्म में लीन हो गये. इस प्रकार व्रत के प्रभाव से अनेकों मनुष्य ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म ही हो गये. इस व्रत के द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करने वाले मनुष्यों की गणना तो किसी योगी के लिये भी दश सहस्र वर्षों में भी करना असम्भव है.
ज्ञानपूर्वक श्रद्धापूर्वक चतुर्थी व्रत का अनुष्ठान करने से निःसन्देह मनुष्य ब्रह्ममय हो जाता है, अर्थात् उसे ब्रह्म की प्राप्ति होती है. इस आषाढ़ मास की वरदा चतुर्थी के माहात्म्य का श्रद्धापूर्वक पाठ एवं श्रवण करने से मनोवाञ्छित फल प्राप्त होता है.
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