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मेडिकल स्टूडेंट्स में बढ़ रहा स्ट्रेस, 5 साल में 358 विद्यार्थी कर चुके हैं सुसाइड

एक रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें यह खुलासा किया गया है कि मेडिकल स्टूडेंट्स काफी स्ट्रेस में रहते हैं. इस डेटा में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ सालों में 358 मेडिकल स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया है.

एक स्टडी में साल 2010 से 2019 के बीच का एक चौंकाने वाला डेटा सामने आया है. यह डेटा सुसाइड करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स की एक लिस्ट है. इस डेटा के हिसाब से इन सालों में के बीच 358 मेडिकल स्टूडेंट्स ने आत्महत्या की. इसके अलावा 1, 166 मेडिकल स्टूडेंट को कॉलेजों से बाहर निकाला गया . इस सुसाइड के लिस्ट में 125 मेडिकल स्टूडेंट, 105 रेसिंडेशियल, 128 डॉक्टर्स हैं. 'नैशनल मेडिकल कमिशन' ने मेडिकल स्टूडेंट को लेकर हाल ही में 'राइट यू इनफॉर्मेशन' से जवाब मांगा तो उसके जवाब में यह सामने आया कि पिछले 5 सालों में 64 एमबीबीएस और 55 पोस्टग्रेजुएट मेडिकल स्टूडेंट ने सुसाइ़ड किया है.

मेडिकल स्टूडेंट्स के बीच इतना ज्यादा स्ट्रेस है कि 1,166 मेडिकल स्टूडेंट ने कॉलेज बीच में ही ड्रॉप आउट कर दिया. जिसकी वजह से उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी. इन स्टूडेंट में 160 एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे और 1,006 ग्रेजुएशन कर रहे थे. यह डेटा के हिसाब से यह कहना गलता नहीं होगा कि मेडिकल स्टूडेंट्स के बीच स्ट्रेस दिन पर दिन काफी ज्यादा बढ़ रहा है. 

RTI के जरिए मांगा गया जवाब

मेडिकल स्टूडेंट्स के बीच सुसाइड और सुसाइडल टेंडेंसी कि घटनाओं से चिंतित होकर ही 'नैशनल मेडिकल कमिशन' ने भारत के नंबर वन कॉलेज के मेडिकल कॉलेजेज के 'एजुकेशन रेगुलेटरी ऑथरिटी' ने साल 2022 के अंत तक जितने भी मेडिकल कॉलेजों के स्टूडेंट ने सुसाइड किया है. चाहे वह ग्रेजुएशन में हो या पोस्ट ग्रेजुएशन या पढ़ाई को बीच में ही ड्रॉप कर दिया है. 5 सालों का सभी का एक डेटा एक्ट्ठा किया है. 'स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय' के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आयोग द्वारा इस जानकारी को मांगने का निर्णय इसलिए लिया गया. ताकि पता किया जा सके कि कहीं इन सालों में मेडिकल स्टूडेंट ने जो सुसाइड किए हैं वह कहीं रैगिंग या कॉलेज में पढ़ाई के प्रेशर या ज्यादा वर्क लोड के कारण तो नहीं किया है. बहुत सारे पैरेंट्स और बच्चे चाहते थे इसलिए आरटीआई की अपील की गई. हालांकि,मेडिकल स्टूडेंट के पीछे के क्या कारण है इसके पीछे का कुछ पुख्ता सबूत नहीं मिल पाया है. 

इन बच्चों ने कर लिया सुसाइड

जिन बच्चों ने खुद का जीवन समाप्त कर लिया उन्होंने अपने माता-पिता को एक तरीके से मौत की सजा देकर चले गए. डी. नरेंद्र, साउथ मध्य रेलवे के रेलवे सुरक्षा बल के एक सहायक उप-निरीक्षक, जिन्होंने एक महीने पहले अपनी 26साल की बेटी प्रीति धारावत को खो दिया. तेलंगाना के वारंगल में 'काकतीय मेडिकल कॉलेज' (केएमसी) के ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट  डॉ. धारावथ के फैमिली का आरोप है कि एक सीनियर स्टूडेंट के काम से परेशान उन्होंने अपनी जान ले ली. मामले की जांच की जारी है. डॉ. धारावत के माता-पिता अकेले नहीं हैं जो अपने बच्चे को इस दुखद तरीके से खोने के सदमे से जूझ रहे हैं. वहीं ऐसे दुखद घटना के बारे में बात करते हुए श्री नरेंद्र ने कहा,'काश उसे मेडिकल में पोस्ट ग्रेजुएशन की सीट कभी नहीं मिली होती. वह शायद आज जिंदा होती. हमारा परिवार को अभी तक समझ नहीं पा रहा है आखिर ऐसा क्या हो गया है. 

इन डेटा के आधार पर यह स्टडी तैयार किया गया है

एक स्टडी के मुताबिक साल 2010 से 2019 के बीच मेडिकल छात्रों (125), निवासियों (105) और फिजिशियन (128) को मिलाकर कुल 358 स्टूडेंट ने सुसाइड किया. एक दशक (2010-2019) में फैले भारत में मेडिकल छात्रों, निवासियों और चिकित्सकों के बीच आत्महत्या से होने वाली मौतें: ऑनलाइन समाचार पोर्टल और Google डेटाबेस के आधार पर यह पूरी स्टडी तैयार की गई है. 

सुसाइड करने वाली लड़कियों की उम्र काफी कम थी

सुसाइड करने वाली लड़कियों की उम्र काफी कम थी. वहीं जिन लड़कों ने सुसाइड किया है उनकी उम्र लड़कियों से ज्यादा थी. एनेस्थिसियोलॉजी (22.4%) के बाद ओबेस्ट्रिक- गाइनोकॉलेजी (16.0%) में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं हुईं. मेडिकल छात्रों (45.2%) और निवासियों (23.1%) के बीच पढ़ाई को लेकर प्रेशर, और चिकित्सकों के बीच वैवाहिक कलह (26.7%) आत्महत्या के सबसे बड़े कारण थे. मेडिकल छात्रों (24%) और चिकित्सकों (20%) में मानसिक उतल-पुथल से जूझ रहे थे, जबकि उत्पीड़न (20.5%) निवासियों के लिए एक कारण था. 26% तक ने आत्महत्या का साइन देखे गए थे. वहीं 13 प्रतिशत लोगों ने अपनी लाइफ खत्म करने से पहले साइकोलॉजिस्ट का सहारा लिया था.

जूनियर डॉक्टर्स ने बताया सुसाइड के पीछे का यह कारण

रिमी डे, कमेटी हेड, पोस्टग्रेजुएट स्टडीज, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन-जूनियर डॉक्टर्स नेटवर्क आत्महत्या के कई कारण हो सकते हैं जैसे- 24x7 शिफ्ट, कई घंटे तक काम करना, परिवार से दूरी, टॉक्सिक माहौल में असहयोगी प्रशासन, नींद की कमी,पैसे की कमी, एग्जाम का टेंशन, कभी-कभी अमानवीय रैगिंग, जाति-आधारित भेदभाव और क्षेत्रवाद से जुड़ी कठिनाईयां. छात्र डॉक्टरों को सामना करना पड़ता है. कई संस्थानों के जुनियर डॉक्टर्स ने कहा कि डॉक्टरों के बीच आत्महत्या का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में लगभग 2.5 गुना अधिक है.लेकिन सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि बहुत कुछ नहीं किया गया है या इसके बारे में बात नहीं की गई है.

'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)' के एक वरिष्ठ अधिकारी जिन्होंने अपना नाम नहीं बताया उन्होंने कहा कि लगभग सभी मेडिकल कॉलेजों में नियम, सुरक्षा उपाय और सहायता प्रणाली प्रदान की जाती है, लेकिन कठोर कार्यान्वयन की कमी है. उदाहरण के लिए, एनएमसी में एक एंटी-रैगिंग कमेटी है जो शिकायतों की निगरानी करती है. हमने हाल ही में देखा कि काम का माहौल कितना टॉक्सिक होता जा रहा है, जब एक वरिष्ठ डॉक्टर सुसाइड के केस देखकर सीनियर डॉक्टर को अपने जूनियर से प्यार और गरिमा से बात करने की अपील की. 

Disclaimer: इस आर्टिकल में बताई विधि, तरीक़ों और सुझाव पर अमल करने से पहले डॉक्टर या संबंधित एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें.

ये भी पढ़ें: World Homeopathy Day: होम्योपैथी में हर मरीज को दी जाती है अलग-अलग दवा... चाहे एक ही बीमारी हो! ऐसे करते हैं इलाज

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