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पेरेंट्स के झगड़े और मनमुटाव से बच्चा हो सकता है डिप्रेशन का शिकार और...

नयी दिल्ली: हाल ही में बच्चों की कस्टडी को लेकर 2 मामले सामने आए हैं जिसमें बच्चों की कस्टडी के साथ ही कस्टडी बदलने तक को लेकर झगड़े सामने आएं. इन सबको लेकर एबीपी न्यूज़ ने कई साइकैट्रिक्स‍ से बात करके जाना कि आखिर बच्चों पर इन सब का क्या असर हो सकता है. पहला मामला- पहले मामले में 8 साल की बच्ची की कस्टडी 6 साल बाद मां को दे दी गई. इससे पहले बच्ची पिछले 6 साल से अपने पिता और ग्रांडपेरेंट्स के साथ रह रही थी. बच्ची जब 21 माह की थी तब बच्ची के पेरेंट्स के आपसी झगड़े में बच्ची की कस्टडी पिता को दी गई थी. हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पिता के पास रहते हुये बच्चा मां के सुख की अनुभूति नहीं कर सकता. साथ ही ये भी कहा कि जब वह अपनी मां के साथ रहने का अनुभव महसूस करेगी, तभी वह स्थिति का सही तरीके से आकलन करने की स्थिति में होगी कि क्या उसकी भलाई मां के साथ रहने में अधिक है या फिर पिता के साये में रहने पर. कोर्ट ने इस बच्ची को एक साल के लिये मां को सौंपते हुये मां कहा है कि उसे दिल्ली में ही उस स्कूल में भर्ती कराएं जहां वह पढ़ाती है. सालभर बाद बच्ची से पूछताछ के बाद कस्टडी बदली जा सकती है. क्या कहती है बच्ची- इस मामले की कार्यवाही के दौरान जब बच्ची से काउंसलर द्वारा पूछा गया कि वे किसने साथ रहना चाहती है तो बच्ची का कहना था कि वह अपने पिता के साथ रहना चाहती है और वर्तमान माहौल में बदलाव नहीं चाहती. बच्ची के पिता ने भी दलील दी कि उनकी बेटी उसके साथ आराम से है और वह मां के जाने के बाद से उसकी परवरिश कर रहे हैं. दूसरा मामला- केन्या में रह रहे एक शख्स ने कोर्ट में अपने नाबालिग बेटे से मिलने की परमिशन मांगी थी. कोर्ट ने कहा ये शख्स यहां रह रहे अपने बेटे से इंडिया आने पर कभी भी मिल सकता है. कोर्ट ने कहा कि जिस पैरंट को बच्चे की कस्टडी मिली हुई है अगर वो दूसरे पैरंट को बच्चे के दूर करने की कोशिश करता है तो उसे बच्चे की आगे की जिंदगी पर पड़ने वाले गंभीर परिणामों का अंदाजा नहीं होता. यह फैसला देते हुए कोर्ट ने इस बात को भी नोटिस में लिया कि इस फैसले से बच्चे को कोई आपत्ति नहीं और वह अपने पिता और दादा-दादी से मिलने के लिए खुश है. क्या कहते हैं एक्सपर्ट- मैक्स वैशाली हॉस्पिटल के साइकैट्रिक्स डॉ. अमिताभ शाह का इस मामले में कहना है कि कोर्ट ने जो फैसले लिए हैं मैं उसके बारे में तो कुछ नहीं कहूंगा लेकिन बच्चा बचपन में मां-बाप के पास सिक्योर महसूस करता है. खुद को प्रोटेक्ट करता है. इसी प्रोटेक्शन से वो आगे बढ़ता है. उसका दुनिया में कॉन्फिडेंस बढ़ता है. यदि इस स्टेज में बच्चे के साथ इस तरह के बदलाव आते हैं तो उनको पर्सनेलिटी प्रॉब्लम्स हो सकती है. ऐसे में बच्चे को दुनिया को फेज़ करने के लिए भी बहुत सारे इश्यूज आ जाते हैं.
  • बच्चों को दुनिया में एडॉप्ट करने में दिक्कत आ सकती है. ये कई तरह से हो सकता है. चाहे वो स्टडी में वीक हो जाए. इंटर पर्सनल रिलेशन में इश्यूज आने लगते हैं. बच्चे की बात-बात पर लड़ाई हो सकती है. बच्चावडिप्रेस फील कर सकता है.
  • बच्चे को अलग-अलग तरह के बिहेवियर इश्यूज हो सकते हैं. ऐसे में कोशिश की जानी चाहिए कि जो जिस चीज में कंफर्टेबल है उसे कम से कम छेड़ा जाए. इतना बड़ा ट्रांजेशन बहुत ड्रास्टिक हो सकता है. जब आप एक नए शहर में जाते हैं तो आपको खुद को एडजेस्ट करने में दिक्कत आती है. ऐसे में आप एक साल बाद बच्चे से क्या पूछ लोगे. एक साल में तो बच्चा मदर के साथ ठीक से एडजेस्ट भी नहीं हो पाएगा. वो तो वहीं कहेगा कि मैं तो फादर के साथ ही बेहतर था.
सोशलॉजिस्ट एंड रिलेशनशिप काउंसलर डॉ. नीलम सक्सेना का कहना है कि आठ साल की बच्ची इतनी मैच्योर नहीं होती कि ये डिसाइड कर लें कि उसे किसके पास रहना है. एक साल में तो बच्ची ये फील करना शुरू ही करेगी कि उसे किसके पास रहना है.
  • सबसे जरूरी बात तो जानना है कि बच्ची के पिता और ग्रांड पेरेंट्स ने उसकी मां के बारे में किस तरह का फीडबैक बच्ची को दिया है. हो सकता है कि बच्ची को उसकी मां के लिए नेगेटिव फीडबैक दिया गया हो. इससे बच्ची की साइक्लोजी बहुत इफेक्ट करेगी. बच्ची के लिए ऐसे में मां के साथ रहना एक बुरे सपने से कम नहीं होगा. बच्ची की रातों की नींद उड़ सकती है. यहां तक कि बच्ची‍ ये भी सोच सकती है कि वो हैल में रहने जा रही है.
  • बच्ची से ये जानना जरूरी है कि वो अपनी मां के बारे में क्या सोचती है. या फिर उसे अब तक क्या बताया गया है. इससे बच्ची की साइक्लोजी का पता चलेगा कि वो मां के पास कितना हेल्दी फील करेगी. जैसा की दूसरे मामले में बच्चे की बात को नोटिस करके फैसला दिया गया कि बच्चा अपने फादर और ग्रांड पेरेंट्स से मिल सकता है.
  • मेडिकल साइंस में भी प्रूफ हो चुका है कि बच्चे को जन्म देने के कारण मां बच्चे‍ को काफी समझती है फिर वो उसके पास रहे या दूर. लेकिन बच्चे के दिमाग में नेगेटिव चीजें होंगी तो उसे मां के द्वारा की गई हर चीज गलत लगेगी.
  • नए माहौल में बच्चे की ईटिंग हैबिट्स तक चेंज हो जाएंगी. ऐसे में बच्चे की साइक्लोजी बहुत इफेक्ट होगी. एक साल बाद फिर से बच्चे‍ से पूछा जाएगा कि किसके साथ रहना है तो ये बच्चे के साथ टॉर्चर है. कम से कम बच्ची को दो साल तक तो मां के पास रहना चाहिए ताकि वो मां को समझ पाएं. मां से वो अटैच होना शुरू करेगी.
  • रही बात बच्ची की स्कूलिंग चेंज होने की तो हो सकता है बच्ची को पीयर प्रेशर हो स्कूल बदलने का. ऐसे में बच्चों को आमतौर पर फोबिया हो जाता है क्योंकि इस उम्र के बच्चे स्कूल में एक-दूसरे को चिढ़ाते हैं. बच्चे उल्टे-सीधे कमेंट करते हैं.ऐसे में बच्ची को फीलिंग आ सकती है कि 'व्हाट एम आई?' मैं क्या हूं? कभी मुझे पापा मिलते हैं तो कभी मम्मी. इससे बच्ची की भी साइक्लोजी पर नेगेटिव इफेक्ट पड़ेगा.
  • बच्चा इंसिक्योर महसूस करने लगता है. ऐसे से मदर और फादर को बच्ची की परवरिश के लिए एक पॉजिटिव तरीका निकालना चाहिए जिससे बच्ची की साइक्लोजी और लाइफ पर कोई नेगेटिव असर ना पड़े.
  • पेरेंट्स के झगड़ें में अक्सर देखा गया है कि बच्चों की ओवरऑल पर्सनेलिटी भी नेगेटिव होने लगती है. ऐसे में पेरेंट्स को अपनी ईगो छोड़कर कोई पॉजिटिव सॉल्यूशन निकालना चाहिए. फिर चाहे पहले मामले में 8 साल की बच्ची हो या फिर दूसरे मामले में नाबालिग बेटा. ऐसे बच्चों का एग्रेसिव बिहेवियर बहुत ज्यादा होता है जो किसी भी एक पैरंट से दूर रहते हैं. बच्चे स्ट्रेस में बिस्तर तक गीला करने लगते हैं. कभी-कभी बैठे-बैठे चिल्लाना शुरू कर देते हैं. ट्वॉयज फेंकने लगते हैं. ये सब बच्चे की साइक्लोजी और पर्सनेलिटी के नेगेटिव सिम्टम्स होते हैं.
गंगाराम हॉस्पिटल की चाइल्ड केयर एक्सपर्ट डॉ. आरती आनंद का कहना है कि ऐसे बच्चे जो माता-पिता दोनों के पास एक साथ नहीं रह पाते और खासतौर पर जिनकी कस्टडी बदलती रहती है. ऐसे बच्चों की लाइफ काफी कॉम्पलिकेटिड होती है. वे कहती हैं कि पहले मामले में बच्ची अगर पिता के साथ हैप्पी है और उनके साथ एडजेस्ट कर रही है. उसे कोई प्रॉब्लम नहीं हो रही और फादर ने दूसरी शादी नहीं की है तो बच्ची को अचानक नया माहौल 8 साल की उम्र में देना ठीक नहीं.
  • बच्ची का स्कूल भी बदलवा दिया जाएगा तो वो बच्ची के लिए एडजेस्ट कर पाना काफी डिफिकल्ट हो सकता है. उसकी पर्सनेलिटी में कॉन्फिलक्स आ सकते हैं. वो चीजों के खिलाफ जाना शुरू कर सकती है यानि विद्रोही स्वभाव की हो सकती है.
  • बच्ची को मदर के साथ एडजेस्ट‍ करने में काफी दिक्कतें आ सकती हैं. मॉम बेशक कितना भी प्यार कर लें लेकिन वो फादर को मिस करेगी.
  • वो मदर को ब्लेम कर सकती है कि मॉम ने उसे फादर से अलग कर दिया. बच्ची के मन में मदर के लिए नेगेटिव फीलिंग आ सकती है.
  • नए स्कूल में बच्ची को न्यू फ्रेंड्स बनाने होंगे. उसे एकदम नया माहौल मिलेगा. वहां उसे फ्रेंड्स बनाने में एडजेस्ट करने में दिक्कत आ सकती है. बच्ची को फिर से न्यू लाइफ स्टार्ट करनी होगी.
  • वो अपने ग्रांड पेरेंट्स, फादर सबको बहुत मिस करेगी. ऐसे में बच्ची डिप्रेशन में भी जा सकती है. हो सकता है इन सब सिचुएशंस के कारण बच्ची स्टडी पर फोकस ना कर पाएं.
  • हर बच्चे को पेरेंट्स की जरूरत होती है. लेकिन 2 साल से 6 साल तक बच्ची की बॉन्डिंग फादर के साथ हो गई है तो ऐसे में उसे मां के बारे में कुछ नहीं पता.
  • हो सकता है कि बच्ची अपनी बात मनवाने के लिए जिद्दी हो जाए या फिर टैन्ट्रम्स दिखाएं.(पीटीआई इनपुट)
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