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Digital Retail Therapy: तनाव कम करने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग? जानिए क्या है डिजिटल रिटेल थेरेपी

Digital Retail Therapy: ऑनलाइन शॉपिंग अब सिर्फ सहूलियत नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए एक इमोशनल एस्केप और स्ट्रेस से राहत का तरीका बनती जा रही है. चलिए जानते हैं इसको लेकर क्या कहते हैं एस्क्पर्ट्स...

कुछ साल पहले मॉल में घूमना, दुकानों में जा जाकर चीजें छांटना और हाथों में सामान लेकर खरीदारी करना आम बात थी. अब बस एक क्लिक पर एड टू कार्ट का बटन दबाना ही कई लोगों के लिए रिटेल थेरेपी बन चुका है. सवाल यह है कि क्या यह सुविधा केवल सहूलियत की वजह से है या फिर उसके पीछे मेंटल हेल्थ से जुड़ी गहराई भी है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ऑनलाइन शॉपिंग केवल टाइम पास या लग्जरी नहीं रह गई है, आज के तनावपूर्ण जीवन में यह ऐसी थेरेपी बनती जा रही है जो लोगों को असली जीवन के दबाव, भीड़, सामाजिक संपर्क और जजमेंट से बचने का तरीका देती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताएंगे कि कैसे ऑनलाइन शॉपिंग तनाव से बचने का तरीका बनती जा रही है.

डोपामिन का डोज बिना ज्यादा मेहनत के

कुछ एक्सपर्ट्स के अनुसार, जब हम कुछ खरीदते हैं तो हमारे दिमाग को एक डोपामिन हिट मिलता है. यानी खुशी का एहसास होता है, लेकिन जब इसके लिए बाहर निकलना, ट्रैफिक जेलना, दुकानों में जाना और लोगों से बात करनी पड़े तो दिमाग उस मेहनत को उस खुशी के मुकाबले तौलता है. वहीं ऑनलाइन शॉपिंग उसी खुशी को कम मेहनत में दे देती है. इसलिए दिमाग इसे लेकर न बाहर निकलने, न किसी से बात करने और न ही भीड़ भाड़ में फंसने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग जैसा आसान रास्ता चुन रहा है.  

मेंटल हेल्थ से जुड़ता है ऑनलाइन शॉपिंग का झुकाव

कुछ एक्सपर्ट बताते हैं कि बहुत सारे लोग ऑनलाइन शॉपिंग को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसमें उन्हें नियंत्रण, प्राइवेसी और समय की आजादी मिलती है. उन्हें यह महसूस होता है कि वह बिना किसी दबाव या  सामाजिक निगाहों के खरीददारी कर सकते हैं. यह आदत खासकर उन लोगों में देखने को मिलती है जो सोशल एंग्जायटी से जूझ रहे होते हैं या जिन्हें पब्लिक में निर्णय लेने में घबराहट महसूस होती है.

जब खरीदारी भावनाओं से भागने का जरिया बन जाए

कई बार ऐसा भी होता है कि लोग ऑनलाइन शॉपिंग को अपने तनाव अकेलेपन या दबी हुई भावना से बचने के लिए एक तरीके के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इसे लेकर एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि कुछ लोग खरीदारी के जरिए अपनी भावनाओं से बचना चाहते हैं. जब यह सेम चीज लगातार दोहराई जाएं खासकर बिना जरुरत के तो यह कंपल्सिव स्पेंडिंग डिसऑर्डर की ओर इशारा कर सकता है.

गिल्ट फ्री खर्च लेकिन लंबे समय में असर

फिजिकल स्टोर में जाकर सामान खरीदने में एक वास्तविकता होती है जैसे पैसे हाथ से देना, सेल्स पर्सन से बात करना या सामने वाले की नजरों का सामना करना. लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग इन सबसे मुक्ति देती है. इसे लेकर भी एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ऑनलाइन शॉपिंग एक प्राइवेसी एक्सपीरियंस है यह लोगों को तुरंत खर्च करने की गिल्टी फीलिंग से बचाता है. हालांकि बार-बार ऐसा करने से अनजाने में आर्थिक तनाव निर्भरता बढ़ सकती है.

जजमेंट का डर और डिजिटली सिक्योर स्पेस

कई लोग ऑनलाइन खरीदारी इसीलिए करते हैं क्योंकि वह स्टोर में जज किए जाने से बचना चाहते हैं. चाहे वह कपड़े हो, बजट हो या पर्सनल चॉइस हो डिजिटल प्लेटफॉर्म इस डर को हटा देता है. वहीं अगर व्यक्ति को पहले ही इस आदत का पर गिल्टी फीलिंग है तो ऑनलाइन शॉपिंग उनके लिए एक निजी स्पेस बन जाता है. जहां कोई हमें देख नहीं सकता और नहीं आपकी पसंद पर सवाल उठा सकता है.

तो क्या यह सामान्य है या चेतावनी

ऑनलाइन शॉपिंग हर किसी के लिए मेंटल हेल्थ का संकेत नहीं है. कई बार यह केवल सुविधा, समय बचाने या डिजिटल फायदे का इस्तेमाल होता है. लेकिन जब यह व्यवहार रोज का हिस्सा बन जाए, बिना जरुरत के खर्च हो और इमोशनल एस्केप का तरीका बन जाए तब जरूरी है खुद से सवाल करना कि क्या में कुछ महसूस करने से बच रहा हूं या नहीं. ऑनलाइन शॉपिंग न तो गलत है और नहीं खतरनाक जब तक कि वह संतुलित हो. यह एक बदलती जीवन शैली का हिस्सा है लेकिन जब यह जरूरत के बजाय इमोशनल क्रच बन जाए तो इसे लेकर आपको सोचने की जरूरत होती है. इस डिजिटल युग में असली कनेक्शन चलना फिरना और लोगों से बातचीत करना उतना ही जरूरी है जितना कि सामान खरीदना. क्योंकि हर वह चीज जो आपको अच्छा महसूस कराएं जरूरी नहीं है कि वह आपको सही दिशा में लेकर जा रही है.

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