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Naxal Movement: नक्सल आंदोलन में क्यों हुई थी मर्दों की नसबंदी, जानें क्या थी इसकी वजह?

Naxal Movement: नक्सली आंदोलन के दौरान पुरुषों की नसबंदी कर दी जाती थी. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

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  • नक्सली पुरुषों की नसबंदी करते, ताकि पारिवारिक बाधा ना बने।
  • नेतृत्व मानता था बच्चे क्रांतिकारी भावना को कमज़ोर करते।
  • संगठन में शादी से पूर्व नसबंदी एक शर्त होती थी।
  • आत्मसमर्पण के बाद सरकार नसबंदी रिवर्सल में मदद करती है।

Naxal Movement: नक्सली आंदोलन दशकों से मध्य और पूर्वी भारत के दूर दराज के जंगली इलाकों में सक्रिय रहा है. यह आंदोलन अपने सदस्यों को सशस्त्र संघर्ष के प्रति पूरी तरह से समर्पित रखने के लिए काफी ज्यादा कड़े नियमों का पालन करता था. कुछ माओवादी समूहों से जुड़ी सबसे विवादित प्रथाओं में से एक पुरुष सदस्यों की नसबंदी का मामला था.  इसका मकसद इस बात को पक्का करना था कि पारिवारिक जिम्मेदारियां आंदोलन की भागीदारी में बाधा ना बनें.

पुरुष सदस्यों की नसबंदी क्यों की जाती थी? 

माओवादी नेताओं का यह मानना था कि अगर लड़ाके माता-पिता बन गए तो उनका ध्यान बच्चों की देखरेख में भटकेगा.  संगठन को इस बात का डर था कि पिता बनने के बाद नक्सली कमांडर या फिर लड़ाके पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझ जाएंगे और उनकी क्रांतिकारी भावना कमजोर पड़ जाएगी. 

वरिष्ठ नेता माता-पिता बनने को क्रांतिकारी गतिविधियों से ध्यान भटकाने वाली चीज मानते थे. उन्हें डर था कि जिन लड़ाकों के बच्चे होंगे वे संगठन के लक्ष्यों के बजाय अपने परिवारों की सुरक्षा और भविष्य को प्राथमिकता देंगे. शायद वे आंदोलन भी छोड़ सकते हैं.

बच्चों की परवरिश की चुनौती

नक्सली कैडर अक्सर दूर दराज के जंगलों में रहते थे और सुरक्षा बलों से बचने के लिए लगातार अपनी जगह बदलते रहते थे. ऐसी स्थितियों में जीवन में बार-बार जगह बदलना, सीमित चिकित्सा सुविधा और मुठभेड़ का लगातार खतरा शामिल था. इन हालात में शिशुओं और छोटे बच्चों की परवरिश करना काफी मुश्किल माना जाता था. 

शादी और नसबंदी का संबंध 

पूर्व कैडरों की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि कभी-कभी संगठन के अंदर शादी के लिए नसबंदी को एक शर्त बना दिया जाता था. कुछ मामलों में पुरुष सदस्यों से शादी की मंजूरी मिलने से पहले यह प्रक्रिया करवाने की उम्मीद की जाती थी. कुछ दावों के मुताबिक संगठन की नीतियों के तहत अविवाहित नए सदस्यों की भी नसबंदी की जाती थी.

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जंगल के इलाकों में चिकित्सा प्रक्रिया 

ऐसी नीतियों को लागू करने के लिए माओवादी समूहों ने कथित तौर पर जंगली इलाकों में बुनियादी चिकित्सा नेटवर्क विकसित किए थे. सीमित चिकित्सा प्रशिक्षण वाले लोगों को काम चलाऊ सुविधाओं में नसबंदी सहित छोटी सर्जिकल प्रक्रिया करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था.

आत्मसमर्पण के बाद का जीवन 

क्योंकि कई पूर्व नक्सलियों ने आत्म समर्पण कर दिया है और मुख्यधारा के समाज में शामिल हो गए हैं इस वजह से पारिवारिक जीवन कई पूर्व कैडरों के लिए प्राथमिकता बन गया है. छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सरकार समर्थित पुनर्वास कार्यक्रमों ने पात्र व्यक्तियों के लिए नसबंदी रिवर्सल की प्रक्रिया में सहायता की है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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