क्या होते हैं म्यूल अकाउंट, जिन्हें साइबर ठग करते हैं इस्तेमाल? नॉर्मल बैंक अकाउंट से कितने अलग
म्यूल अकाउंट का इस्तेमाल साइबर अपराधी ठगी का पैसा छुपाने के लिए करते हैं, जबकि नॉर्मल अकाउंट का उपयोग मालिक खुद करता है. आइए इसके बारे में विस्तार से जानें.

डिजिटल दौर में इंटरनेट के माध्यम से होने वाली वित्तीय धोखाधड़ी और ऑनलाइन फ्रॉड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. फर्जी अकाउंट्स और डिजिटल नेटवर्क के जरिए साइबर ठग देश भर में लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं. ठगी की इस काली कमाई को कानून की नजर के छिपाने और सुरक्षित जगहों पर भेजने के लिए शातिर अपराधी एक खास तरह के बैंक खातों का जाल बिछाते हैं. जांच एजेंसियों और पुलिस की पकड़ से बचने के लिए ठगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इन खातों को म्यूल अकाउंट कहा जाता है. आइए जानें कि ये नॉर्मल अकाउंट से कितने अलग हैं.
क्या है म्यूल अकाउंट और उसका असली काम?
म्यूल अकाउंट असल में आम नागरिक के नाम पर खुला हुआ वैध बैंक खाता ही होता है, जिसका गलत इस्तेमाल साइबर अपराधी करते हैं. ऑनलाइन फ्रॉड, स्कैम या फिर साइबर अपराध से जुटाई गई अवैध रकम को पुलिस की पहुंच से दूर करने के लिए इन खातों में डाला जाता है. अपराधी पैसों की हेराफेली यानी मनी लॉन्ड्रिंग के लिए इन खातों का सहारा लेते हैं, ताकि मुख्य आरोपी तक जांच एजेंसियां न पहुंच सकें. ठग अक्सर कम पढ़े-लिखे लोगों, छात्रों, बेजोजगारों या जरूरतमंदों को पैसों का लालच देकर धोखे में रखकर उनके खातों का इस्तेमाल इस गैर-कानूनी काम के लिए करते हैं.
साइबर अपराधी कैसे आम लोगों को फंसाते हैं?
साइबर ठग लोगों को अपने जाल में फंसाने के लिए कई तरह के लालच और पैंतरे अपनाते हैं. वे अक्सर लोगों को खाते में आने वाली रकम का 5 से 10 फीसदी हिस्सा कमीशन के रूप में देने के लिए कहते हैं. इसके अलावा इंटरनेट पर फर्जी वर्क फ्रॉम होम या डाटा एंट्री की नौकरी का झांसा देकर वेतन देने के बहाने आम लोगों से उनके केवाईसी डॉक्यूमेंट और बैंक की जानकारी हासिल कर लेते हैं. कई शहरों में साइबर अपराधी कॉलेजों या कैफे के बाहर युवाओं को थोड़ा सा पैसा देकर उनके बैंक खाते, पासबुक और एटीएम कार्ड किराए पर ले लेते हैं.
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नॉर्मल अकाउंट और म्यूल अकाउंट का फर्क
एक नॉर्मल अकाउंट का पूरा नियंत्रण और संचालन उसके असली मालिक के पास में होता है, जो कि अपनी मेहनत की कमाई और वैध पैसों का लेन देने करता है. इसके विपरीत म्यूल अकाउंट भले ही किसी व्यक्ति के नाम पर दर्ज हो, लेकिन उसका वास्तविक नियंत्रण और पासवर्ड साइबर अपराधियों के पास रहता है. कई मामलों में खाताधारक खुद थोड़े से कमीशन के चक्कर में ठगों की बातों में आकर फ्रॉड के पैसों का लेन-देन अपने खाते से करते रहते हैं. यही बात एक साधारण खाते को अपराधियों के म्यूल खाते से बिल्कुल अलग बनाती है.
पैसों के लेन-देन और पैटर्न का फर्क
नॉर्मल बैंक अकाउंट में पैसों की आवाजाही खाताधारक की नियमित आय, खर्चों और बचत के हिसाब से सामान्य तरीके से होती है. दूसरी ओर, म्यूल अकाउंट का लेन-देन का तरीका बहुत ही संदिग्ध और असामान्य होता है. इस तरह के खाते में अचानक से लाखों रुपये की भारी भरकम रकम जमा होती है और महज कुछ ही मिनटों के अंदर उस राशि को कई छोटे-छोटे अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता है या तुरंत निकाल लिया जाता है. बैंक और वित्तीय संस्थाएं खातों के इसी असामान्य पैटर्न से म्यूल अकाउंट्स की पहचान करती हैं.
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