Internet Shutdown: प्रदर्शन रोकने के लिए इंटरनेट बंद करना कितना कानूनी? हर बार क्यों बैन कर देती है सरकार
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इंटरनेट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है. इंटरनेट पर प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं.

दिल्ली के कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास CJP आंदोलन के चलते गुरुवार शाम सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए. जंतर-मंतर के 1.5 किलोमीटर दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, जबकि व्यापारियों ने एहतियातन शाम 6:30 बजे ही बाजार बंद कर दिया. इंटरनेट बंद होने से सबसे ज्यादा असर डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर पड़ा. पार्किंग स्थलों पर UPI और कार्ड से भुगतान ठप हो गया, जिससे लोगों को नकद भुगतान करना पड़ा. कई वाहन चालकों को पार्किंग में प्रवेश से पहले पूछा गया कि उनके पास नकदी है या नहीं.
कैब और ऑटो सेवाएं भी प्रभावित रहीं क्योंकि ऐप आधारित बुकिंग और ऑनलाइन भुगतान संभव नहीं हो सके. मेट्रो स्टेशनों के बंद होने और इंटरनेट ठप रहने से अस्पताल, दफ्तर और अन्य जरूरी स्थानों तक पहुंचने में लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा. यात्रियों को एटीएम तलाशने और नकदी निकालने के लिए भटकना पड़ा.
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के बीच कई इलाकों में मोबाइल डेटा सेवाएं बंद किए जाने के बाद एक बार फिर पुराना सवाल उठ खड़ा हुआ है—क्या किसी प्रदर्शन या कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए सरकार इंटरनेट बंद कर सकती है? अगर हां, तो इसकी सीमा क्या है? और क्या हर इंटरनेट शटडाउन कानूनी माना जाएगा?
भारत दुनिया में सबसे अधिक इंटरनेट शटडाउन करने वाले देशों में गिना जाता है. जम्मू-कश्मीर से लेकर मणिपुर और अब दिल्ली तक, प्रशासन ने सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का हवाला देते हुए कई बार मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद की हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि इंटरनेट बंद करना सरकार का असीमित अधिकार नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
जनवरी 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट शटडाउन पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया. यह मामला जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहने से जुड़ा था.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इंटरनेट आज केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है. इसलिए इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार इंटरनेट बंद कर सकती है, लेकिन ऐसा केवल कानून के तहत, उचित कारणों से और सीमित अवधि के लिए ही किया जा सकता है. अनिश्चितकाल तक इंटरनेट बंद रखना स्वीकार्य नहीं है.
हर आदेश सार्वजनिक करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इंटरनेट बंद करने या संचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने वाले सभी सरकारी आदेश सार्वजनिक होने चाहिए. नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि इंटरनेट क्यों बंद किया गया और उसके पीछे क्या कारण हैं। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में ऐसे आदेश गोपनीय नहीं रखे जा सकते.
'सबसे कम प्रतिबंध' का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह भी याद दिलाया कि यदि किसी समस्या का समाधान कम कठोर उपायों से हो सकता है, तो इंटरनेट बंद करना पहला विकल्प नहीं होना चाहिए. अदालत ने 'प्रोपोर्शनैलिटी टेस्ट' यानी अनुपातिकता के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि प्रशासन को यह साबित करना होगा कि इंटरनेट बंद करना वास्तव में आवश्यक था और उससे कम कठोर विकल्प उपलब्ध नहीं थे. यानी यदि केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोक लगाकर स्थिति संभाली जा सकती है, तो पूरे मोबाइल इंटरनेट नेटवर्क को बंद करना उचित नहीं माना जाएगा.
दिल्ली से मणिपुर तक यही मॉडल
पिछले कुछ सालों में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मणिपुर, पंजाब और जम्मू-कश्मीर समेत कई राज्यों में विरोध प्रदर्शनों या हिंसा के दौरान मोबाइल डेटा सेवाएं बंद की गईं. लगभग हर आदेश में सरकार ने "सार्वजनिक व्यवस्था", "हिंसा रोकने" और "अफवाहों पर नियंत्रण" का हवाला दिया. हालांकि हर बार यह सवाल उठा कि क्या इंटरनेट बंद करने से वास्तव में हिंसा रुकती है या इसका असर आम नागरिकों और कारोबार पर अधिक पड़ता है.
डिजिटल अर्थव्यवस्था पर सीधा असर
आज भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से डिजिटल हो चुकी है. मोबाइल इंटरनेट बंद होने का सबसे पहला असर UPI भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग, ई-कॉमर्स, कैब सेवाओं, फूड डिलीवरी, अस्पतालों, छात्रों और छोटे कारोबारियों पर पड़ता है. कई छोटे दुकानदार अब पूरी तरह डिजिटल भुगतान पर निर्भर हैं. इंटरनेट बंद होते ही उनका कारोबार प्रभावित होता है. ऑनलाइन पढ़ाई, सरकारी सेवाएं और आपातकालीन संचार भी बाधित हो जाते हैं. विभिन्न आर्थिक स्टडी में यह सामने आया है कि बार-बार होने वाले इंटरनेट शटडाउन से करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान होता है और निवेशकों के बीच भी नकारात्मक संदेश जाता है.
सुरक्षा बनाम नागरिक अधिकार
सरकार का तर्क है कि इंटरनेट के जरिए अफवाहें, भड़काऊ संदेश और हिंसा तेजी से फैल सकती है. इसलिए संवेदनशील परिस्थितियों में अस्थायी प्रतिबंध जरूरी हो सकते हैं. वहीं नागरिक अधिकार संगठनों और डिजिटल अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे क्षेत्र की इंटरनेट सेवा बंद करना अक्सर लाखों निर्दोष लोगों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है.
इसी संतुलन पर सुप्रीम कोर्ट ने भी जोर दिया था. अदालत ने साफ कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर असीमित और अनिश्चितकालीन प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता. हर इंटरनेट शटडाउन को कानूनी कसौटी, आवश्यकता, अनुपातिकता और पारदर्शिता की परीक्षा पर खरा उतरना होगा.
ये भी पढ़ें: 10 साल की कैद और 1 करोड़ तक का जुर्माना... पेपरलीक के खिलाफ बिल लाने की तैयारी में सरकार, समझें पूरा प्लान
























