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ब्लूटूथ का नाम क्यों रखा गया था ब्लूटूथ, क्या नीले रंग के दांत से है इसका कनेक्शन?

हम दिन में कई बार इसका यूज करते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि इसका नाम ब्लूटूथ क्यों रखा गया, क्या यह किसी तकनीकी शब्द का शॉर्ट फॉर्म है और इसका नीला-सफेद लोगो आखिर दिखाता क्या है.

आज के समय में अगर कोई तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है, तो वह ब्लूटूथ है. सुबह उठते ही वायरलेस ईयरफोन कान में लगाना हो, गाड़ी में मोबाइल को म्यूजिक सिस्टम से जोड़ना हो, या फिर एलेक्सा को आवाज देकर लाइट बंद करवानी हो, हर जगह ब्लूटूथ मौजूद है. हम दिन में कई बार इसका यूज करते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि इसका नाम ब्लूटूथ क्यों रखा गया?

क्या यह किसी तकनीकी शब्द का शॉर्ट फॉर्म है और इसका नीला-सफेद लोगो आखिर दिखाता क्या है. सुनने में ब्लूटूथ कोई वैज्ञानिक या इंजीनियरिंग टर्म नहीं लगता है. असल में यह नाम किसी मशीन, तरंग या फॉर्मूले से नहीं, बल्कि एक पुराने वाइकिंग राजा से जुड़ा हुआ है और उस राजा का एक दांत सच में नीला था. तो आइए जानते हैं कि ब्लूटूथ का नाम क्यों ब्लूटूथ रखा गया था और क्या इसका कनेक्शन नीले रंग के दांत से है. 

ब्लूटूथ का नाम क्यों ब्लूटूथ रखा गया था

आज से लगभग 1000 साल पहले, यानी वायरलेस तकनीक के जन्म से बहुत पहले, यूरोप के उत्तरी हिस्से में वाइकिंग्स नाम की योद्धा जाति रहती थी. इसी दौर में डेनमार्क पर एक राजा शासन करता था, जिसका नाम हैराल्ड गोर्मसन था. उनके पिता गोर्म द ओल्ड डेनमार्क के राजा थे, जिन्होंने डेनमार्क और नॉर्वे को जोड़ने की कोशिश शुरू की थी, लेकिन यह काम पूरा उनके बेटे हैराल्ड ने किया. नॉर्स भाषा में उनका नाम Harald Blatand था, जहां Bla का मतलब नीला और Tand का मतलब दांत होता है और यहीं से Bluetooth पैदा हुआ.

1990 के दशक के समय मोबाइल, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस तेजी से बढ़ रहे थे, लेकिन उन्हें आपस में जोड़ने के लिए तारों (केबल) पर निर्भर रहना पड़ता था. वैज्ञानिकों का सपना  बिना तार के कम दूरी में कम बिजली खर्च करके डिवाइस आपस में बात कर सकें इसी सोच पर काम कर रहे थे डॉ. जैप हार्टसेन, जो एरिक्सन कंपनी से जुड़े थे. 

ब्लूटूथ नाम किसने सुझाया?

1996 में Intel, Ericsson और Nokia जैसी बड़ी कंपनियां एक साथ बैठीं ताकि इस नई तकनीक को एक नाम दिया जा सके. इंटेल के इंजीनियर जिम कार्डाच उस समय वाइकिंग्स पर एक किताब पढ़ रहे थे. उन्हें अचानक विचार आया जिस तरह राजा हैराल्ड ब्लूटूथ ने अलग-अलग राज्यों को जोड़ा, उसी तरह यह तकनीक अलग-अलग डिवाइस को जोड़ेगी. बस, उन्होंने मजाक-मजाक में इसे Bluetooth कह दिया, सोचा गया कि यह बस एक अस्थायी नाम होगा. बाद में इसे बदलने की कोशिश हुई. कुछ नए नाम भी सोचे गए. जैसे PAN (Personal Area Network), Radio Wire. लेकिन PAIN नाम पहले से बहुत जगह इस्तेमाल हो चुका था और Radio Wire का ट्रेडमार्क समय पर नहीं मिल पाया और तब तक Bluetooth नाम इतना मशहूर हो चुका था कि उसे बदलने का कोई मतलब ही नहीं रह गया. 

ब्लूटूथ तकनीक की शुरुआत

शुरुआत में ब्लूटूथ को फोन कॉल के लिए, हैंड्स-फ्री हेडसेट के लिए और कम दूरी में डेटा भेजने के लिए बनाया गया था. पहले ब्लूटूथ डिवाइस की रेंज सिर्फ 10 मीटर थी और स्पीड भी बहुत कम थी.  आज हम Bluetooth 5.0 यूज कर रहे हैं. जिसकी रेंज 240 मीटर तक, बैटरी खपत बहुत कम, कनेक्शन ज्यादा स्थिर, साथ ही म्यूजिक और वीडियो स्ट्रीमिंग हाई क्वालिटी है. आज तो हाल यह है कि कई मोबाइल फोन में हेडफोन जैक तक हटा दिया गया है, और सब कुछ ब्लूटूथ पर ही निर्भर है. 

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मानसी उपाध्याय करीब दो साल से डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ी मानसी ने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी की. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की और वर्तमान में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म कर रही हैं. पत्रकारिता में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अक्टूबर 2024 में एबीपी नेटवर्क से की. अब वह डिजिटल कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें फीचर और इंफॉर्मेटिव स्टोरीज लिखने के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटिंग, सोशल मीडिया और रिसर्च आधारित कंटेंट तैयार करने में रुचि है. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली मानसी ऐसी स्टोरीज लिखना पसंद करती हैं, जो पाठकों को नई और जरूरी जानकारी आसान भाषा में दें. उनकी कोशिश रहती है कि कंटेंट सिर्फ जानकारी देने वाला ही नहीं, बल्कि पढ़ने में दिलचस्प और पाठकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ भी हो.

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