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प्राचीन भारत की वो यूनिवर्सिटी, जहां एक साथ पढ़ते थे 10 हजार से ज्यादा छात्र

आज से करीब 1600 साल पहले भारत में ऐसा विशाल शिक्षा केंद्र था, जहां 10 हजार से ज्यादा छात्र एक साथ पढ़ाई करते थे. नालंदा सिर्फ यूनिवर्सिटी नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और मानवता की मिसाल थी.जानें क्या है पूरा इतिहास?

सोचिए… न इंटरनेट था, न आधुनिक इमारतें, न टेक्नोलॉजी. फिर भी भारत की धरती पर एक ऐसी भव्य यूनिवर्सिटी थी, जहां दुनिया के कोने-कोने से छात्र ज्ञान पाने के लिए आते थे. बिहार की पावन भूमि पर बसे नालंदा की एक ऐसा शिक्षा केंद्र, जिसने भारत को “विश्व गुरु” की पहचान दिलाई.नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त काल में लगभग 5वीं शताब्दी में मानी जाती है. कहा जाता है कि इसे कुमारगुप्त प्रथम के समय स्थापित किया गया था. उस दौर में भारत शिक्षा, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में विश्व गुरु माना जाता था. नालंदा उसी गौरव का प्रतीक थी.

आज के समय में बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों में हजारों छात्र पढ़ते हैं, भारत में लगभग 5वीं सदी में ही ऐसी विशाल यूनिवर्सिटी मौजूद थी, जहां एक साथ 10 हजार से ज्यादा विद्यार्थी शिक्षा हासिल करते थे. यह कोई साधारण शिक्षण संस्थान नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध ज्ञान का केंद्र था. 


जब 10 हजार छात्र एक साथ सीखते थे

नालंदा में करीब 10,000 छात्र और 1,500 से ज्यादा आचार्य एक साथ अध्ययन और अध्यापन करते थे. कल्पना कीजिए उस दृश्य की लंबी-लंबी गलियों में ज्ञान पर चर्चा करते विद्यार्थी, पेड़ों की छांव में बैठकर शास्त्रों पर वाद-विवाद करते गुरु और शिष्य.यहां भारत के अलावा चीन, तिब्बत, कोरिया, जापान और इंडोनेशिया जैसे देशों से छात्र आते थे. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां कई वर्षों तक अध्ययन किया और अपने लेखों में नालंदा की भव्यता और अनुशासन का भावुक वर्णन किया. उन्होंने लिखा कि यहां के आचार्य विद्वान ही नहीं, बल्कि चरित्रवान और अनुशासित भी थे.

क्या-क्या पढ़ाया जाता था?

नालंदा में बौद्ध धर्म के साथ-साथ वेद, व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र और साहित्य जैसे अनेक विषय पढ़ाए जाते थे.यहां शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ डिग्री पाना नहीं था, बल्कि इंसान को बेहतर और जागरूक बनाना था. विद्यार्थियों को नैतिक मूल्यों, अनुशासन और समाज सेवा की भी शिक्षा दी जाती थी.

विशाल पुस्तकालय था सबसे बड़ी पहचान

नालंदा का पुस्तकालय उस समय दुनिया के सबसे बड़े पुस्तकालयों में गिना जाता था.कहा जाता है कि इसमें लाखों पांडुलिपियां और किताबें मौजूद थीं. यह पुस्तकालय कई मंजिलों में फैला हुआ था और ज्ञान का खजाना माना जाता था.


आज भी जिंदा है विरासत

आज नालंदा के खंडहर बिहार में मौजूद हैं, जो इसकी महानता की कहानी बयां करते हैं. यह स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है. हाल के वर्षों में यहां नए रूप में नालंदा विश्वविद्यालय की फिर से स्थापना की गई है, ताकि प्राचीन भारत की शिक्षा परंपरा को दोबारा जीवित किया जा सके.12वीं सदी में आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर हमला किया. विश्वविद्यालय को आग के हवाले कर दिया गया. कहा जाता है कि पुस्तकालय में लगी आग कई महीनों तक जलती रही.वह सिर्फ एक इमारत का जलना नहीं था, बल्कि सदियों के ज्ञान, शोध और संस्कृति का नष्ट होना था.उस दिन भारत ने अपने इतिहास का एक अनमोल अध्याय खो दिया.

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रजनी उपाध्याय बीते करीब छह वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली रजनी ने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और यही रुचि उन्हें मीडिया की दुनिया तक ले आई.

अपने छह साल के पत्रकारिता सफर में रजनी ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया. उन्होंने न्यूज, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे प्रमुख वर्टिकल्स में अपनी पहचान बनाई. हर विषय में गहराई से उतरना और तथ्यों के साथ-साथ भावनाओं को भी समझना, उनकी पत्रकारिता की खासियत रही है. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज की धड़कन को शब्दों में ढालने की एक कला है.

रजनी का मानना है कि एक अच्छी स्टोरी सिर्फ हेडलाइन नहीं बनाती, बल्कि पाठकों के दिलों को छूती है. वर्तमान में वे एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां वे एजुकेशन और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर्स को कवर कर रही हैं.

दोनों ही क्षेत्र समाज की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रजनी इन्हें बेहद संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालती हैं. खाली समय में रजनी को संगीत सुनना और किताबें पढ़ना पसंद है. ये न केवल उन्हें मानसिक सुकून देते हैं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं.

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